कोरोना के मरीज़ों को ब्लैक में दवाएं कितने की मिल रही हैं?

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- Author, विकास पांडे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अखिलेश मिश्रा को पिछले गुरुवार बुख़ार आना शुरू हुआ था. तब उन्हें हल्का कफ़ भी था, जिसके बारे में वे सोच रहे थे कि यह सामान्य मौसमी फ़्लू है.
लेकिन अखिलेश की चिंता तब बढ़ गई, जब उनके पिता योगेंद्र मिश्रा में भी वही लक्षण दिखाई देने लगे.
दोनों ने कोविड की आरटी-पीसीआर जाँच कराने का निर्णय लिया और डॉक्टरी सहायता हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दीं.
उन्हें कहीं भी तीन दिन से पहले की अपॉइंटमेंट नहीं मिल रही थी. लेकिन रविवार को जाकर उन्हें अस्पताल में एक स्लॉट मिला.
इस बीच योगेंद्र मिश्रा की तबीयत थोड़ी बिगड़ चुकी थी. उनका बुख़ार पहले से औसतन बढ़ गया था और डॉक्टर ने सलाह दी कि उन्हें जल्द से जल्द किसी अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए. लेकिन यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी.
राजधानी दिल्ली समेत नोएडा के कई अस्पतालों ने उन्हें वापस लौटा दिया. मगर अंतत: दिल्ली के एक निजी अस्पताल में उन्हें बेड मिल गया.
अखिलेश के अनुसार, उनके पिता की तबीयत अब पहले से ठीक है.
लेकिन एक समय में अखिलेश को लगा था कि वो अपने पिता को खो देंगे.
उन्होंने कहा, "मैं डिप्रेस हो रहा था. मुझे लग रहा था कि बिना उपचार के ही उनका निधन हो जायेगा. मैं नहीं चाहूँगा कि कोई भी व्यक्ति उस स्थिति से गुज़रे जिससे मुझे गुज़रना पड़ा. सभी को इलाज मिलना चाहिए."
लेकिन इस परिवार की कहानी अनोखी नहीं है. भारत में फ़िलहाल ऐसे तमाम परिवार हैं, जो अस्पताल में बेड, किसी जीवनरक्षक दवा या ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए संघर्ष कर रहे हैं. भारत के कुछ शहरों में तो शवदाहगृहों के बाहर वोटिंग की ख़बरें भी हैं.
कोविड की रिपोर्ट के लिए भी लोगों को घंटों इंतज़ार करना पड़ा रहा है. कई लैब 48 से 72 घंटे में कोविड की रिपोर्ट दे रही हैं.
नोएडा की एक प्राइवेट लैब के बाहर मिले 35 वर्षीय युवक ने कहा, "मुझे ख़ुद में पिछले तीन दिन से कोविड के लक्षण लग रहे हैं, जिसे लेकर मैं चिंतित हूँ. ऐसे में रिपोर्ट के लिए 2-3 दिन का इंतज़ार करना पड़ रहा है."
दवाओं की काला-बाज़ारी
पिछले कुछ दिनों में, भारतीय सोशल मीडिया ऐसी गुज़ारिशों से भर गया है जिनमें लोग कुछ जीवनरक्षक दवाओं के बंदोबस्त में सहायता माँग रहे हैं.
इन लोगों का कहना है कि रेमडेसिवीर और टोसिलिज़ुमैब जैसी दवाएं उन्हें कहीं नहीं मिल रही हैं.
कोविड-19 के उपचार में इन दोनों दवाओं के इस्तेमाल को लेकर हालांकि दुनिया भर में बहस है, लेकिन भारत समेत कुछ अन्य देशों ने आपातकालीन स्थिति में इन दोनों दवाओं के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी हुई है.
भारत में कोविड-19 के उपचार के रूप में अधिकांश डॉक्टर फ़िलहाल मरीज़ों को एंटी-वायरल दवा रेमडेसिवीर लेने की सलाह दे रहे हैं. इस वजह से रेमडेसिवीर की माँग इन दिनों बहुत ज़्यादा है.
भारत ने इस दवा के निर्यात पर रोक लगा दी है, फिर भी भारतीय दवा निर्माता माँग के अनुसार इसकी आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं.
पिछले दो दिनों से भारत में प्रतिदिन कोरोना के दो लाख से अधिक मामले सामने आये हैं. इससे पहले भी क़रीब एक सप्ताह से हर रोज़ कोरोना के औसतन एक-सवा लाख केस दर्ज किये जा रहे थे.
हेटेरो फ़ार्मा भारत की उन सात कंपनियों में से एक है, जो रेमडेसिवीर का उत्पादन करती है. कंपनी का कहना है कि वो इस दवा का उत्पादन बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है.
लेकिन बीबीसी ने अपनी पड़ताल में पाया कि इस दवा की क़िल्लत के कारण दिल्ली समेत कई अन्य शहरों में रेमडेसिवीर की काला-बाज़ारी हो रही है.
तीन मार्केटिंग एजेंटों ने, जिनसे बीबीसी ने बात की, 100 ग्राम रेमडेसिवीर की शीशी 24,000 हज़ार रुपये में उपलब्ध कराने की पेशकश की. यह क़ीमत इस दवा की आधिकारिक क़ीमत से पाँच गुना ज़्यादा है.
भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, कोरोना के मरीज़ को इस दवा की छह डोज़ दी जानी चाहिए, तभी इसका कोर्स पूरा समझा जाता है.
लेकिन कई डॉक्टर कहते हैं कि कुछ मामलों में मरीज़ों को आठ डोज़ भी देनी पड़ती हैं, और एक मध्यम-वर्गीय परिवार के लिए अचानक दवा पर ख़र्च करने के लिए यह अच्छी ख़ासी रकम है.
अतुल गर्ग जिनकी माँ को दिल्ली के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, वे कहते हैं, "मुझे वो दवा हासिल करने के लिए बहुत ज़्यादा पैसे ख़र्च करने पड़े. सैकड़ों लोगों से संपर्क किया और कई घंटों की परेशानी के बाद जाकर वो दवा मिली."

वहीं टोसिलिज़ुमैब, जिसे अर्थराइटिस यानी गठिया के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है, उसे भी क्लीनिकल ट्रायल में कोविड के इलाज के लिए सही पाया गया है.
लेकिन यह दवा भी भारतीय बाज़ार से लगभग ग़ायब है.
ऑल इंडिया कैमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसियेशन के महासचिव राजीव सिंघल कहते हैं, "मेरा फ़ोन दिन भर बजता रहता है और लोग मदद माँगते हैं कि मैं उनके लिए इन दवाओं का बंदोबस्त कर दूं. पर स्थिति वाक़ई इतनी ख़राब है कि मैं अपने परिवार वालों के लिए भी इन दवाओं का बंदोबस्त नहीं कर पा रहा. हम कोशिश कर रहे हैं कि उन लोगों के ख़िलाफ़ कुछ कार्रवाई करवायी जाये, जो इन दवाओं को ब्लैक कर रहे हैं. हालांकि इस बात को मानना होगा कि सिस्टम में लीक है. "
ऑक्सीजन, एक्स-रे और कोविड टेस्ट
भारत के कई राज्यों में मेडिकल ऑक्सीजन की माँग बढ़ी है. कई अस्पताल मरीज़ों को लौटा रहे हैं क्योंकि उनके पास ज़रूरी आपूर्ति नहीं है. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने केंद्र सरकार से सेना के विमान के ज़रिए ऑक्सीसन की सप्लाई भेजने के लिए कहा क्योंकि सड़क के रास्ते अस्पतालों तक आपूर्ति भेजने में बहुत समय लग रहा है.
छोटे शहरों और कस्बों में हालात और भी बदतर हैं. जब मरीज़ों को अस्पताल में जगह नहीं मिलती तो डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि घर पर ही ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कर लें.
उत्तर भारत के एक छोटे से क़स्बे में रहने वाले नबील अहमद के पिता को कोरोना संक्रमण का पता चलने के पाँच दिन बाद सांस लेने में बहुत दिक़्क़त हुई.
डॉक्टर ने घर पर ही ऑक्सीजन सिलेंडर लगाने की सलाह दी, जिसका इंतज़ाम करने के लिए उन्हें चार घंटे की दूरी पर दूसरे शहर जाना पड़ा. नबील बताते हैं कि आठ घंटे की मशक़्क़त के बाद वो किसी तरह अपने पिता के लिए घर पर ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतज़ाम कर पाए.
छोटे शहरों में मरीज़ों के सामने दूसरी बड़ी दिक़्क़त ये आ रही है कि प्राइवेट लैब्स सीने का एक्सरे और सीटी-स्कैन करने से मना कर रहे हैं. जबकि कोरोना का पता लगाने के लिए डॉक्टर अक्सर इसके लिए लिख रहे हैं.
इलाहाबाद में रहने वाले योगेश कुमार कहते हैं कि उनके लिए एक्सरे कराना तभी संभव होता जब वो किसी भी अस्पताल में भर्ती हो जाते. दूसरा तरीक़ा ये होता कि सरकारी अस्पताल में जाते, लेकिन वहां वेटिंग लिस्ट बहुत लंबी है.
इलाहाबाद के एक डॉक्टर ने बीबीसी को बताया, ''मैं अपने मरीज़ों का एक्सरे तक नहीं करा पा रहा हूं. कुछ मामलों में तो हम ब्लड रिपोर्ट पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं जो सही तरीक़ा नहीं है.''

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श्मशानों का बुरा हाल
कोरोना वायरस से बुरी तरह प्रभावित कई शहरों में श्मशानों में दिन-रात हर समय चिताएं जल रही हैं. लोगों को अपने मृत परिजन के अंतिम संस्कार के लिए घंटों इंतज़ार करना पड़ रहा है.
हाल में ही एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें दिखाया गया है कि लखनऊ के एक श्मशान में रात के वक़्त कई चिताएं जल रही थीं.
श्मशानों के कर्मचारी बिना आराम के लगातार काम कर रहे हैं. कई लोग ये सवाल भी पूछ रहे हैं कि क्या इस नौबत को आने से रोका जा सकता था.
महामारी विशेषज्ञ डॉक्टर ललित कांत कहते हैं, ''हमने कोरोना संक्रमण के पहले दौर से सबक़ नहीं सीखा. हमें पता था कि संक्रमण का दूसरा दौर भी आएगा. लेकिन हम दवाओं, अस्पतालों में जगह और ऑक्सीजन की कमी जैसी ख़ामियों को दूर नहीं कर सके. यहां तक कि हमने उन देशों से भी सबक़ नहीं सीखा जो बिल्कुल ऐसे हालात देख चुके थे.''
(लोगों की गोपनीयता का ध्यान रखते हुए कुछ नाम बदले गये हैं.)
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