क्या है ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच चल रहा पानी को लेकर विवाद

हेलमंद नदी

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    • Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
    • पदनाम, ख़बरों की रिपोर्टिंग और विश्लेषण

हाल ही में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने ईरान पर जो टिप्पणियाँ की हैं, वो क्षेत्र में पानी को लेकर पैदा हो रहे संकट के संकेत हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंद प्रांत में बने कमाल ख़ान बांध के उद्घाटन के मौक़े पर ग़नी ने कहा था कि उनका देश ईरान के पानी को लेकर अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध है.

लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि अतिरिक्त पानी तेल के बदले ही दिया जाएगा.

ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच 70 के दशक में जलसंधि हुई थी. अफ़ग़ान सरकार उसी के तहत बांध बनाने पर ज़ोर देती रही है. लेकिन ईरान ये कहते हुए पीछे हट रहा है कि इस तरह के बांध बनने से झीलों और दूसरे क्षेत्रों में पारिस्थितिक तंत्र को नुक़सान पहुँच सकता है.

हेलमंदः पुराना विवाद

अफ़ग़ानिस्तान से दो बड़ी नदियाँ पूर्व की दिशा में ईरान जाती हैं. हेलमंद (जिसे हीरमंद भी कहा जाता है) और हारी रूद.

दोनों देशों की सीमा पर बसे झीलक्षेत्र हामुन के लिए हेलमंद नदी जीवनदायिनी है. जलवायु परिवर्तन की वजह से यहाँ इस नदी का क्षेत्र सिमट रहा है जिससे ईरान के सिस्तान-बलोचिस्तान प्रांत में जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है.

हेलमंद नदी ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद के केंद्र में भी है. 1973 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत अफ़ग़ानिस्तान को हर साल ईरान को 820 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी देना है.

अफ़ग़ानिस्तान बांध

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ये पानी हामुन झील क्षेत्र के अलावा दोनों देशों के बीच साझा सीमा से भी होकर गुज़रता है.

साल 2018 में ईरान के विदेश मंत्री ज़वाद जरीफ़ ने कहा था कि ईरान अफ़ग़ानिस्तान के साथ विवाद को समाप्त करने की कोशिस करेगा और इसमें 'अफ़ग़ान शरणार्थियों, अवैध अफ़ग़ान नागरिकों, नशे के कारोबार और तस्करी' को भी अफ़ग़ानिस्तान के साथ बातचीत में शामिल करेगा. अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने जरीफ़ की इस टिप्पणी की आलोचना की थी.

हारी रूदः ईरान, तुर्केमेनिस्तान बनाम अफ़ग़ानिस्तान

हारी रूद नदी के पानी पर दावों को लेकर 50 साल से चले आ रहे विवाद को समाप्त करते हुए इस साल फ़रवरी में ईरान और अफ़ग़ानिस्तान ने समझौता कर लिया है. ये नदी अफ़ग़ानिस्तान के केंद्रीय इलाक़े से ईरान की सीमा तक बहती है.

ईरान से आने वाली छोटी नदियाँ हारी रूद में मिलती हैं और यहीं ईरान और तुर्कमेनिस्तान के बीच सीमा भी बनती है.

ईरान और तुर्कमेनिस्तान ने मिलकर हारी रूद नदी पर फ्रैंडशिप बांध बनाया था और यही मशहद क्षेत्र के लिए जल का मुख्य स्रोत भी है.

भारत-अफ़ग़ानिस्तान फ्रैंडशिप बांध

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मशहद ईरान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और ख़ोरासान रज़ावी प्रांत की राजधानी भी है. अफ़ग़ानिस्तान ने भारत के साथ मिलकर साल 2006 में इसी नदी पर सालमा बांध बनाया था, जो नदी पर फ्रैंडशिप बांध के ऊपर है.

साल 2018 में ईरान की संसद (मजलिस) की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के एक सदस्य ने कहा था कि हारी रूद नदी पर फ्रैंडशिप बांध के ऊपर बना बांध मशहद के लिए जल संकट पैदा कर सकता है

अबुल फ़ज़ल हसन बीकी ने समाचार एजेंसी आईसीएनए से कहा था, "अफ़ग़ानिस्तान हेलमंद नदी को लेकर हुए जल समझौते के लिए तो प्रतिबद्ध है लेकिन हारी रूद नदी पर उसका रुख़ ऐसा नहीं है."

बुरा सपना

अफ़ग़ानिस्तान के बांध बनाने और इससे ईरान के लिए जल आपूर्ति प्रभावित होने को लेकर हाल के दिनों में ईरान के मीडिया में ख़ूब बहस हो रही है.

सरकार के करीब माने जाने वाले मीडिया में तो सिर्फ़ राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और ईरानी विदेश मंत्री ज़वाद जरीफ़ के बयानों पर हल्की प्रतिक्रिया ही आई, लेकिन ईरान के शक्तिशाली रिवोल्यूशनरी गार्ड के क़रीब मानी जाने वाली न्यूज़ एजेंसी फ़ार्स और तसनीम ने अफ़ग़ानिस्तान की जमकर आलोचना की है

वहीं कट्टरपंथी न्यायपालिका की तरफ़ झुकाव रखने वाली मीज़ान समाचार एजेंसी ने अफ़ग़ानिस्तान के बांध बनाने को ईरान के लिए दुस्वपन बताया है.

अफ़ग़ानिस्तान के कमाल ख़ान बांध को चालू करने के कुछ दिन बाद ही फार्स समाचार एजेंसी ने एक लेख में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में नदी में पानी का स्तर कम नहीं हुआ है, बावजूद इसके अफ़ग़ानिस्तान ने उतना पानी नहीं छोड़ा है, जितना उसने वादा किया था.

फ़ार्स ने कहा कि 1973 के समझौते का उल्लंघन करने और ईरान के हिस्से का पानी कम करने से हामुन जलक्षेत्र पर ख़तरा मँडराने लगा है. समाचार एजेंसी ने कहा है कि कमाल ख़ान बांध ने ईरान की जलवायु चिंता को बढ़ा दिया है.

ईरान के जल अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं: अफ़ग़ानिस्तान

नदी

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अफ़ग़ानिस्तान में आपदा प्रबंधन के पूर्व मंत्री और यूनिवर्सिटी में लेक्चरर नाजिब आक़ा फ़हीम ने बीबीसी से कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान ईरान के जल अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि कमाल ख़ान बांध को लेकर जाहिर की जा रही चिंताएं आधारहीन हैं.

फ़हीम कहते हैं, "ईरान को हर साल क़रीब दो अरब क्यूबिक मीटर पानी मिलता है. ये 1973 के समझौते के तहत ईरान के हिस्से के 82 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी से कहीं ज़्यादा है. इसकी वजह ये है कि क़रीब 40 सालों से चले आ रहे युद्धों की वजह से अफ़ग़ानिस्तान अपने जल संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाया है. क़रीब 5 करोड़ क्यूबिक मीटर जल क्षमता वाला ये बांध ही अफ़ग़ानिस्तान का प्रमुख प्रोजेक्ट है जो उसने अभी तक पूरा किया है. जबकि ईरान ने अपनी तरफ़ दर्जनों बांध बनाए हैं. इसके बारे में ईरान ने अफ़ग़ानिस्तान को जानकारी तक नहीं दी है."

फ़हीम कहते हैं कि ईरान की शिकायत रहती है कि अफ़ग़ानिस्तान के पास बाढ़ को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं है और वो बाढ़ के पानी को ईरान के हिस्से में गिन लेता है.

वो कहते हैं कि एक बार बांध से जुड़ी नहरें पूरी हो जाएँगी, तो बाढ़ की वजह से बर्बाद होने वाले पानी को कुछ हद तक संभाला जा सकेगा और इससे दोनों देशों के बीच जल स्रोतों का इस्तेमाल भी बेहतर होगा.

ईरान का रवैया

ईरान का कहना है कि वह अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया के अनिश्चित नतीजे और अप्रत्याशित जलवायु परिवर्तन के मद्देनज़र दोनों नदियों से मिलने वाले अपने हिस्से के पानी का प्रबंधन करने की कोशिश कर रहा है.

जब फ़ार्स न्यूज़ ने ऊर्जा मंत्री रेज़ा अर्दाकानियान से पूछा कि क्या ईरान अफ़ग़ानिस्तान से अपने हिस्से के पानी को सुरक्षित करने की उम्मीदें छोड़ चुका है, तो उनका कहना था कि ऐसा नहीं है.

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि ईरान की प्राथमिकता समुद्री पानी को ठीक करने की है. ऊर्जा मंत्री दरअसल ईरान की फ़ारस और ओमान की खाड़ियों से घरेलू और ओद्योगिक इस्तेमाल के लिए पानी को भीतर देश में लाने की महायोजना की तरफ़ इशारा कर रहे थे.

ईरान के पास सीमित हैं जल संसाधन

मध्य पूर्व के गर्म और रूखे क्षेत्र में बसे ईरान में हर साल 240 से 280 मिलीमीटर ही बरसात हो पाती है. ये वैश्विक औसत 990 मिलीलीटर से काफ़ी नीचे है.

देश के पूर्वी हिस्से में तो सालाना 115 मिलीमीटर बारिश ही हो पाती हैं. ये इलाक़ा गंभीर जल संकट का सामना करता है.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: फिर होगी अमरीका-ईरान डील?

ईरान में दुनिया की क़रीब एक फ़ीसद आबादी रहती है, लेकिन यहाँ दुनिया के ताज़ा पानी का सिर्फ़ 0.3 प्रतिशत ही है. वहीं बारिश से मिलने वाला 66 प्रतिशत पानी भी नदियों में शामिल होने से पहले ही भाप बनकर उड़ जाता है.

लेकिन पड़ोसी देशों से बहकर आने वाली नदियों से ईरान को क़रीब नौ अरब क्यूबिक मीटर पानी मिलता है. ऐसे में देश की बढ़ती पानी की ज़रूरतों को देखते हुए ईरान के लिए पूर्वी पड़ोसी देशों से आने वाली नदियों से मिलने वाले पानी को सुरक्षित करना ज़रूरी है.

ईरान के अपने पूर्वी और पश्चिमी पड़ोसी देशों से पानी के बँटवारे को लेकर अलग-अलग विवाद हैं. ईरान के दो बड़े पूर्वी प्रांतों के लिए अफ़ग़ानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से आने वाली नदियों से मिलने वाला पानी बहुत ज़रूरी है.

वहीं इराक़ के साथ पानी को लेकर विवाद का आर्थिक और रणनीतिक महत्व भी है. शत अल-अरब नदी ईरान और इराक़ को विभाजित करती है. ये जहाज़रानी और उत्पादन के लिए दोनों देशों के लिए बेहद अहम है.

ईरान तुर्की के दजला और फ़रात नदियों पर बांध बनाने को लेकर भी नाख़ुश है, क्योंकि इससे ईरान के पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

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