एस्ट्राज़ेनेका की कोविड वैक्सीन पर उठे सवाल, डब्लूएचओ ने बताया सुरक्षित

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    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले साल लगभग इसी समय कोरोना संक्रमण ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया था. दुनिया के ज़्यादातर देशों में लॉकडाउन लागू किया गया और इंतज़ार शुरू हुआ कोविड-19 की रोकथाम के लिए वैक्सीन का.

वैश्विक महामारी के दौर में एक अच्छी बात ये हुई कि इस महामारी से निपटने के लिए एक साल के भीतर ही वैक्सीन तैयार कर ली गई.

भारत समेत दुनियाभर के देशों में कोविशील्ड जिसे एस्ट्राज़ेनेका और ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है, का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस वैक्सीन का उत्पादन भारत स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया ने किया है. लेकिन अब इस वैक्सीन के सुरक्षित होने को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं. कई देशों में टीकाकरण को अस्थायी तौर पर रोक दिया गया है.

टीकाकरण को रोकने वाले देशों में सबसे नया नाम बुल्गारिया का है.

थाईलैंड में ख़ून का थक्का जमने की शिकायत के बाद एस्ट्राज़ेनेका कंपनी की वैक्सीन के इस्तेमाल को फ़िलहाल टाल दिया गया है. हालांकि यूरोपीय मेडिसिन्स एजेंसी (ईएमए) ने ऐसी किसी भी स्थिति के पैदा होने से इनकार किया है.

लेकिन थाईलैंड का यह क़दम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि थाईलैंड के प्रधानमंत्री शुक्रवार को वैक्सीन लेने वाले थे. इसी के साथ देश में टीकाकरण शुरू होने वाला था लेकिन अभी इसे रद्द कर दिया गया है.

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कई दूसरे देशों में भी टीकाकरण पर रोक

इससे पूर्व डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड समेत कई यूरोपीय देश अपने यहां इस वैक्सीन के इस्तेमाल पर अस्थाई रोक लगा चुके हैं.

अभी तक यूरोप में 50 लाख से अधिक लोगों को टीका दिया जा चुका है. जिनमें से 30 ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें लोगों ने ख़ून का थक्का जमने की शिकायत की है.

सावधानी के तहत ही इटली और ऑस्ट्रिया में भी इस वैक्सीन के कुछ बैचेज़ के इस्तेमाल को फ़िलहाल रोक दिया गया है. इसके साथ ही एस्टोनिया, लातविया, लिथूआनिया और लक्ज़मबर्ग ने भी वैक्सीन के उन बैच पर रोक लगा दी है जिसे ऑस्ट्रिया ने अपने यहां प्रतिबंधित किया है.

इन यूरोपीय देशों के अलावा कुछ ख़बरों में ये भी दावा किया गया कि दक्षिण कोरिया में इस वैक्सीन को लेने के बाद दो लोगों की मौत हो गई.

हालांकि इस बीच ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि वो अपने यहां एस्ट्राज़ेनेका की कोविड-19 वैक्सीन को जारी रखेगा क्योंकि वहां इस तरह की (ख़ून का थक्का) कोई शिकायत नहीं मिली है.

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वैक्सीन से डरने की ज़रूरत नहीं: डब्लूएचओ

इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि वैक्सीन से डरने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि इससे ब्लड क्लॉट होने की बात सच है इसके कोई सबूत नहीं है.

वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ के दवा नियामक ने कहा है कि ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की कोविड-19 वैक्सीन के कारण ख़ून के थक्के बनने के कोई संकेत नहीं मिले हैं.

वैक्सीन के पक्ष में यह भी कहा गया है कि ख़ून का थक्का जमना स्वाभाविक भी हो सकता है और यह असामान्य नहीं है.

ऐसा माना जाता है कि ब्रिटेन में हर साल हज़ार में से एक व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं.

क्या कहते हैं जानकार?

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के डॉ. सुरेश कुमार राठी कहते हैं, "हमारे शरीर में जब कोई भी चीज़ जाती है तो हो सकता है कि हमारा शरीर उसे स्वीकार कर ले या यह भी हो सकता है कि उसे स्वीकार नहीं करे. अगर शरीर ने उस बाहरी चीज़ को स्वीकार कर लिया है तो ठीक है, नहीं किया तो रिएक्शन होता है. तो इसे आप चाहें एलर्जी कहिए या फिर री-एक्शन. ऐसा होना या ना होना हर एक के शरीर पर और उसकी क्षमता पर निर्भर करता है."

उनके मुताबिक़, "आमतौर पर वैक्सीन के कोई साइड-इफ़ेक्ट नहीं होते हैं, लेकिन यह पर्सन टू पर्सन निर्भर करता है."

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डॉ. राठी मानते हैं कि यह एक बहुत छोटी समस्या है.

वो कहते हैं, "यूरोप में यह वैक्सीन अभी तक पचास लाख से अधिक लोगों को दी गई है, जिसमें से सिर्फ़ 30 लोगों में यह परेशानी देखने को मिली है."

वो उदाहरण देते हुए कहते हैं कि - इसे ऐसे समझिए कि किसी एक खाने को खाकर किसी को कुछ नहीं होता है और किसी को उसी खाने से फ़ूड-पॉइज़निंग हो जाती है.

डॉ. राठी कहते हैं, "वैक्सीन के प्रभाव से डरने की ज़रूरत नहीं है. सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी वैक्सीन सार्वजनिक तौर पर तभी बाज़ार में आती है या टीकाकरण के लिए मान्य होती है जब वो सारे टेस्ट पास कर ले. एस्ट्राज़ेनेका ने सभी क्लीनिकल टेस्ट और बाक़ी के टेस्ट पास किये हैं, ऐसे में डरने की ज़रूरत नहीं है."

हालांकि दिल्ली स्थित सफ़दरजंग अस्पताल में कम्यूनिटी मेडिसीन के प्रमुख जुगल किशोर मानते हैं कि इस बात को अनदेखा तो नहीं किया जा सकता है.

वो मानते हैं कि अगर इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं तो बेशक इस पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत हैं. जो भी इस तरह के मामले आए हैं, उनका अध्ययन किये जाने की ज़रूरत है ताकि सटीक निष्कर्ष निकाला जा सके.

वहीं महाराष्ट्र कोविड टास्क फ़ोर्स के सदस्य डॉ. शशांक जोशी कहते हैं कि सबसे प्रमुख बात यह है कि ब्लड-क्लॉट किस वजह से हुआ है ये किसी को भी पुष्ट तौर पर पता नहीं. और जितनी बड़ी संख्या में वहां कोरोना की वैक्सीन लगी है और ब्लड-क्लॉट के जो मामले आए हैं वो अनुपात में बेहद कम है.

शशांक जोशी का कहना है कि ऐसा नहीं लगता है कि वैक्सीन का इससे कोई सीधा संबंध है.

वो कहते हैं, "मैं यह स्पष्ट तौर पर कहना चाहूंगा कि जो लोग वैक्सीन लेने के योग्य हैं, उन्हें वैक्सीन लेना चाहिए और इसमें बिल्कुल भी डरने जैसी कोई बात नहीं है."

आईएचएस हेल्थ इकोनॉमिक्स एंड हेल्थ पॉलिसी के प्रमुख डॉ. थॉमस ने भी ट्वीट करके लोगों से परेशान ना होने की अपील की है.

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उन्होंने ट्वीट किया है, "हर साल तक़रीबन एक लाख में से सौ लोगों में थ्रोम्बोम्बोलिज़्म की शिकायत मिलती है और बुज़ुर्गों में यह ज़्यादा देखने को मिलता है. पीएआरसी/ईएमए जल्दी ही इस मसले को सुलझा लेंगे."

कैसे पता चलता है कि कोई वैक्सीन सुरक्षित है और है तो कितनी?

वैक्सीन के लिए पहले लैब में सेफ्टी ट्रायल शुरू किए जाते हैं, जिसके तहत कोशिकाओं और जानवरों पर परीक्षण और टेस्ट किए जाते हैं. इसके बाद इंसानों पर अध्ययन होते हैं.

लैब का सेफ्टी डेटा ठीक रहता है तो वैज्ञानिक वैक्सीन के असर का पता लगाने के लिए आगे बढ़ सकते हैं. इसका मतलब फिर वॉलंटियर के बड़े समूह पर परीक्षण किए जाते हैं.

आमतौर पर वैक्सीन आपको कोई बीमारी नहीं देती. बल्कि आपके शरीर के इम्यून सिस्टम को उस संक्रमण की पहचान करना और उससे लड़ना सिखाती है, जिसके ख़िलाफ़ सुरक्षा देने के लिए उस वैक्सीन को तैयार किया गया है.

वैक्सीन के बाद कुछ लोगों को हल्के लक्षण झेलने पड़ सकते हैं. ये कोई बीमारी नहीं होती, बल्कि वैक्सीन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया होती है.

10 में से एक व्यक्ति को जो सामान्य रिएक्शन हो सकता है और आम तौर पर कुछ दिन में ठीक हो जाता है, जैसे - बांह में दर्द होना, सरदर्द या बुख़ार होना, ठंड लगना, थकान होना, बीमार और कमज़ोर महसूस करना, सिर चकराना, मांसपेशियों में दर्द महसूस होना.

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दोबारा से बढ़ रहे हैं कोरोना के मामले

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के डैशबोर्ड पर मौजूद आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़कर 118,625,333 हो गए हैं. दुनियाभर में संक्रमण से अब तक 2630841 लोगों की मौत हो चुकी है.

संक्रमण के सबसे अधिक मामले अमेरिका में हैं. जहां कुल मामले 29,286,143 हैं वहीं कोरोना संक्रमण के कारण अभी तक वहां 530821 लोगों की मौत हो चुकी है.

संक्रमित मामलों के आधार पर भारत दूसरे स्थान पर है. जहां संक्रमण के कुल 11308846 मामले हैं और अब तक यहां 158306 लोगों की मौत हो चुकी है.

बीते कुछ महीनों में निश्चित तौर पर कोरोना संक्रमण के नए मामलों में कमी देखी गई थी लेकिन अब एक बार फिर इनमें तेज़ी देखी जा रह है. यह तेज़ी दुनिया के दूसरे देशों के साथ-साथ भारत में भी देखी जा रही है.

ब्राज़ील में महामारी के बाद पहली बार एक दिन में दो हज़ार से अधिक लोगों की मौत हो गई है.

11 मार्च को देश में 2286 लोगों की मौत दर्ज की गई.

अमेरिका के बाद ब्राज़ील में इस संक्रमण से मरने वालों की कुल संख्या सबसे ज़्यादा है, यहां कोविड-19 से अब तक 268,370 लोगों की मौत हो चुकी है.

जानकारों का कहना है कि कोरोना वायरस के नए वैरिएंट के आने से संक्रमण की दर में और तेज़ी आई है.

कुछ ऐसी ही स्थिति भारत में भी देखी जा रही है.

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भारत में बीते 24 घंटे में कोरोना वायरस संक्रमण के 23,285 नए मामले सामने आए हैं. जबकि 117 लोगों की मौत हो गई है.

भारत में कोरोना के बढ़ते मामलों का सबसे अधिक असर महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है. बढ़ते मामलों को देखते हुए नागपुर शहर में 15 से 21 मार्च के बीच संपूर्ण लॉकडाउन रखने का निर्णय लिया गया है.

महाराष्ट्र में शुरुआत से ही कोरोना संक्रमण के मामले सबसे अधिक रहे हैं.

महाराष्ट्र के साथ ही पंजाब के मोहाली और फ़तेहगढ़ साहिब में 12 मार्च से रात के कर्फ़्यू की घोषणा की गई है. यह कर्फ्यू अगले आदेश तक के लिए जारी रहेंगे.

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नागपुर में बुधवार को 1,710 नये मामले सामने आए थे. शहर में अब तक कोविड-19 के दो लाख 43 हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं.

देश की राजधानी दिल्ली में भी बीते कुछ महीनों की तुलना में संक्रमण के मामलों में तेज़ी आई है. बीते 24 घंटे में यहां संक्रमण के 431 नए मामले सामने आए हैं.

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