अफ़ग़ानिस्तान वियतनाम नहीं है, आने वाला वक़्त बलिदान का: अशरफ़ ग़नी

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने कहा है कि "शांति की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए कई मौक़े हैं." ये बयान उन्होंने नेटो के बयान के बाद दिया जिसमें कहा गया कि सेना को वापस बुलाने पर कोई अंतिम फ़ैसला नहीं लिया गया है.
अशरफ़ ग़नी ने ये बातें बीबीसी को दिए एक ख़ास इंटरव्यू में कही. इस युद्धग्रस्त देश में नेटो सैन्य गठबंधन के लगभग 10,000 सैनिक हैं. अमेरिका-तालिबान सौदे के तहत इन्हें मई में वापस जाना है. लेकिन चिंताएं जताई जा रही हैं कि इससे हिंसा में तेज़ी आ सकती है.
ग़नी ने बीबीसी की लाइसे डाउसेट से कहा कि, "विवाद से जुड़े सभी पक्षों को फिर से मूल्यांकन कर एक निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए" अवसर मिलना चाहिए.
उन्होंने कहा,"हमें एक राजनीतिक समझौते तक पहुँचना चाहिए."

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उन्होंने कहा कि ज़रूरत है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर "प्रयास" कर ये "संकेत देने की कि कई तरह के व्यवहार स्वीकार नहीं किए जाएंगे"
कितने विदेशी सैनिकों की जरूरत है या कितने समय के लिए, उनके मुताबिक़ यह "युद्ध की तीव्रता पर निर्भर करता है"
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन अभी पूर्व राष्ट्रपति के किए गए सौदों की समीक्षा कर रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद विदेशी सेना में अब अमेरिकी ज़्यादा नहीं हैं. बावजूद इसके अगर अमेरिका समर्थन वापस ले लेता है तो नेटो के लिए ऑपरेशन जारी रखना मुश्किल हो सकता है.
अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की वर्तमान उपस्थिति 2001 से है जब सैनिकों ने 9/11 के हमलों के बाद तालिबान को सत्ता से हटाने के लिए आक्रमण किया था. लेकिन आंदोलन फिर से शुरू हुआ और तालिबान 2018 तक देश के दो तिहाई हिस्सों में सक्रिय था, जिससे निर्वाचित सरकार को ख़तरा था.
ग़नी, जिन्हें अमेरिका-तालिबान डील से अलग रखा गया था, उन्होंने बीबीसी से कहा कि वो अमेरिका के नए प्रशासन के साथ अपने रिश्तों और अफ़गानिस्तान के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की एकजुटता से "ख़ुश" हैं.
'ये वियतनाम नहीं है'
ये मानते हुए कि दोनों ही पक्ष जंग की तैयारी कर रहे थे, उन्होंने कहा, "एकजुटता की ताक़त है जिस पर मैं भरोसा कर रहा हूं ताकि भविष्य के संकट से बचा जा सके. एक गृह युद्ध में फँस जाने का कई प्रकार का डर है."
लेकिन उन्होंने तालिबानी सेना की जीत की संभावना को नकार दिया. उन्होंने कहा, "ये वियतनाम नहीं है. सरकार नहीं गिर रही है."
उनका ये बयान एक ऐसे समय में आया है जब देश में जारी भारी हिंसा के बीच दोनों पक्षों के बीच शांति वार्ता रुकी हुई है.
लेकिन ग़नी ने कहा कि ये "निराशा नहीं बल्कि आशा" के संदर्भ में है.
ग़नी पर अब एक अंतरिम सरकार की तरफ़ से दवाब बढ़ रहा है कि वो तालिबन को सत्ता में लाएं और एक संभवित गृहयुद्ध की ओर जाने से बचें.
ग़नी ने कहा कि उनके पाँच साल के कार्यकाल की क़ीमत शांति के मुक़ाबले कम है लेकिन साथ कहा कि, "अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य का फ़ैसला वहां के लोग करेंगे, ना कि पीछे बैठे सपने देखने वाले लोग."
उन्होंने कहा कि आने वाला समय हर तरफ़ से कड़े फ़ैसले और बलिदान का है, जहां शांति की या तो जीत होगी या हार.
"हर तरफ़ से हम जल्दबाज़ी का अनुभव कर रहे हैं, हम कड़े फ़ैसले लेना चाहते हैं, और कड़े फ़ैसलों की ज़रूरत होगी. 40 साल की हिंसा इस देश के लिए बहुत है."
विश्लेषण - लाइसे डाउसेट, मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवादादाता
कड़ी सुरक्षा वाले महल में एक नया आत्मविश्वास है. राष्ट्रपति ट्रंप की टीम की तरफ़ से तालिबान को बेहतर भागीदार बताने वाले संकेतों के सालों बाद ग़नी को लग रहा है कि उनकी बात सुनी जा रही है.
लेकिन "एक क़ीमत चुकाने के लिए तैयार रहना" भी वॉशिंगटन द्वारा काबुल को दी गई चेतावनी है, जो अब भी आवश्यकता से अधिक दिन नहीं रहना चाहते.
इसका ख़ामियाजा राष्ट्रपति के पाँच साल के कार्यकाल को भुगतना पड़ सकता है. लेकिन वो अभी भी चुनाव पर ज़ोर दे रहे हैं, एक ख़राब इतिहास के बावजूद.
उनके सहयोगियों और दुश्मनों के विचार अलग हैं कि कैसे एक शक्ति-साझा की व्यवस्था की ओर अधिक तेज़ी से बढ़ा जाए. कुछ लोग आशावादी हैं कि एक समझौता कुछ महीनों में किया जा सकता है. मुमकिन है कि राष्ट्रपति ग़नी समेत कई अन्य ये मान रहे हैं कि फ़ासला बहुत बड़ा है, इसलिए वे एक कठिन लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं.
महल की दीवारों से परे, मूड में जो भी बदलाव आया है, अफ़ग़ानी अब भी हर दिन अपनी जान गंवा रहे हैं.

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