अज़रबैजान-आर्मीनिया: नागोर्नो-काराबाख़ के अहम शहर पर 'अज़ेरी सेना का कब्ज़ा'

आर्मीनियाई इलाके़ में सेना की ट्रेनिंग ले रहे एक व्यक्ति

इमेज स्रोत, KAREN MINASYAN

इमेज कैप्शन, 27 अक्तूबर 2020 की इस तस्वीर में आर्मीनियाई इलाके़ में मिलिटरी ट्रेनिंग ले रहे एक व्यक्ति

अज़रबैजान के राष्ट्रपति ने कहा है कि नागोर्नो-काराबाख़ के इलाक़े में एक अहम शहर पर उन्होंने कब्ज़ा कर लिया है.

रविवार को टेलिविज़न पर प्रसारित एक संदेश में राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव ने कहा कि शुशा नाम के शहर को अज़ेरी सेना ने अपने कब्ज़े में ले लिया है. आर्मीनियाई भाषा में इस शहर का नाम शुशी है.

हालांकि आर्मीनिया ने अज़रबैजान के इस दावे को खारिज कर दिया है और कहा है कि लड़ाई अभी जारी है.

लेकिन इस विवादित इलाक़े में जारी संघर्ष के बीच ये शहर अज़रबैजान के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

नागोर्नो-काराबाख़ 1,700 वर्ग मील का पहाड़ी इलाक़ा है जो सोवियत संघ के विघटन से पहले स्वायत्त क्षेत्र बन गया था और अज़रबैजान का हिस्सा था. पारंपरिक तौर पर यहां ईसाई आर्मीनियाई और तुर्क मुसलमान रहते हैं.

इस इलाक़े को लेकर आर्मीनिया और अज़रबैजान तीन दशक पहले भी संघर्ष में उलझ चुके हैं. उसके बाद दोनों के बीच संघर्षविराम तो हुआ लेकिन किसी तरह का शांति समझौता नहीं हो सका.

सितंबर में दोनों देशों में बीच एक बार फिर हिंसा शुरू हो गई और इसके लिए दोनों ने एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं.

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

ज़मीन पर क्या हैं ताज़ा हालात?

नागोर्नो-काराबाख़ की राजधानी स्तेप्नाकियर्त (ज़िसे अज़रबैजान में ख़ानकेन्दी के नाम से जाना जाता है) के ऊपर की तरफ मौजूद पहाड़ी पर शुशा शहर मौजूद है. ये स्तेप्नाकियर्त से आर्मीनिया जा रही सड़क के किनारे बसा है.

अगर ये शहर अज़रबैजान के कब्ज़े में आ जाता है तो यहां से स्तेप्नाकियर्त पर हमले करना अज़ेरी सेना के लिए बहुत आसान हो जाएगा.

अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव ने कहा है कि शुशा की "आज़ादी का दिन" अज़रबैजान के लोगों के इतिहास में लिखा जाएगा. नागोर्नो-काराबाख़ पर अज़रबैजान के कब्ज़े के अपने वादे को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि "हमें कोई ताकत रोक नहीं सकती."

कुछ दिन पहले बीबीसी संवाददाता ओर्ला गुएरिन को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि अब आर्मीनिया के पास अधिक दिन नहीं बचे हैं.

नागोर्नो-काराबाख़

इमेज स्रोत, EPA

इमेज कैप्शन, अज़रबैजान के रक्षा मंत्रालय की वेबसाइट पर 20 अक्तूबर 2020 को प्रकाशित की गई तस्वीर
2px presentational grey line

लेकिन आर्मीनिया ने शुशा पर कब्ज़े के अज़रबैजान के इस दावे को झूठा बताया है. आर्मीनिया रक्षा मंत्रायल के अधिकारी आर्तस्रन होवानिस्यान ने अपने फ़ेसबुक पन्ने पर लिखा, "शुशी में लड़ाई अभी जारी है, इंतज़ार करें और हमारे सैनिकों पर भरोसा रखें."

नागोर्नो-काराबाख़ के स्वघोषित राष्ट्रपति अरायिक हारुत्युन्यान के एक विदेश नीति सलाहकार ने बीबीसी को बताया, "हम ये कह सकते हैं कि फिलहाल शुशी जंग का मैदान बन हुआ है, वहां पर अज़रबैजान की सेना है और काराबाख़ की सेना है. हम इलाक़े की एक-एक घर के लिए लड़ रहे हैं."

अज़रबैजान की घोषणा से पहले आर्मीनिया के रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता शूशान स्टेपन्यान ने लिखा था, "आज की रात शुशी में सबसे भयंकर लड़ाई हो रही है."

उन्होंने लिखा कि इस लड़ाई में अज़रबैजान के कई सैनिकों की जान गई है, उनके कई टैंक और गाड़ियां घ्वस्त हो चुके हैं.

गज़ानचेत्सोत्स चर्च

इमेज स्रोत, KAREN MINASYAN

इमेज कैप्शन, आर्मीनिया के लिए शुशी वो जगह है जहां पवित्र माना जाने वाला गज़ानचेत्सोत्स चर्च है.

शुशा शहर का महत्व

अज़रबैजान और आर्मीनिया दोनों के लिए शुशा का अलग सांस्कृतिक महत्व है. 1980 के अंत और 1990 की शुरूआत में दोनों के बीच जो युद्ध हुआ था उससे पहले तक यहां की आबादी मुख्य रूप से अज़ेरी थी. लेकिन युद्ध के कारण यहां के हजारों लोगों को अपना घर छोड़ कर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा.

आर्मीनिया के लिए ये वो जगह है जहां पवित्र माना जाने वाला ऐतिहासिक गज़ानचेत्सोत्स चर्च है. ये आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च है यानी सबसे पुराने और सबसे बड़े चर्चों में शुमार है.

बीते महीने आर्मीनिया ने अज़रबैजान पर इस चर्चा पर हमला करने का आरोप लगाया था. हालांकि दोनों ही पक्षों का कहना है कि वो आम लोगों या जगहों को निशाना नहीं बना रहे हैं.

रविवार को इस जंग को 43 दिन हो गए हैं. दोनों देशों के बीच 27 सितंबर से शुरु हुई इस जंग में अब तक कितने लोगों की जान गई है इसके बारे में अब तक स्पष्ट जानकारी नहीं है. नागोर्नो-काराबाख़ के अधिकारियों का कहना है कि जंग के दौरान सेना के कम से कम 1,200 लोगों की मौत हो चुकी है. उनका कहना है कि जंग में आम लोगों की भी मौत हुई है.

टारटार ज़िले में काम करते अज़रबैजान के लैंड माइन्स एक्सपर्ट

इमेज स्रोत, Gavriil Grigorov

इमेज कैप्शन, टारटार ज़िले में काम करते अज़रबैजान के लैंड माइन्स एक्सपर्ट

अज़रबैजान ने अब तक युद्ध में मारे गए लोगों की आंकड़ा जारी नहीं किया है, हालांकि उनका कहना है कि जंग के कारण 80 से अधिक नागरिकों की जान जा चुकी है. इसमें बीते महीने बर्दा में हुए मिसाइल हमले में मारे गए 21 नागरिक भी शामिल हैं.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बीते महीने कहा था कि अब तक लड़ाई में क़रीब 5,000 लोगों की जान जा चुकी है.

क्या है प्रतिक्रिया?

अज़रबैजान के राष्ट्रपति की घोषणा के बाद राजधानी बाकू में लोग सड़कों पर निकल कर खुशियां मनाने लगे, वो कार के हॉर्न बजा रहे थे, नारे लगा रहे थे और अपना राष्ट्रीय झंडा फहरा रहे थे.

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार चुर्की के राष्ट्रपति रिचेप तैय्यप अर्दोआन ने "अपने अज़ेरी भाइयों" को मुबारकबाद दी है. तुर्की के कोचेली में लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि शुशा में जो कुछ हो रहा है वो "इस बात का संकेत है कि दूसरे वो इलाक़े जो दुश्मन के कब्ज़े में हैं को भी जल्द आज़ाद करा लिए जाएंगे."

तुर्की, अज़रबैजान को अपना मित्र मानता है और इस लड़ाई में उसका साथ देने की बात कर चुका है. शनिवार को अद्रोआन ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से कहा कि आर्मीनिया को अज़रबैजान की ज़मीन से बाहर निकल जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि "मामले का हल निकालने के लिए आर्मीनिया को बातचीत की मेज़ पर आने के लिए आश्वस्त होना पड़ेगा."

इधर इस मामले में रूसी सरकार ने एक बयान जारी किया है जिसके अनुसार पुतिन ने अर्दोआन से कहा है कि उन्होंने अज़रबैजान और आर्मीनिया, दोनों के नेताओं से बात कि है और मानते हैं कि "जानें बचाने के लिए जल्द से जल्द संघर्ष को ख़त्म किया जाना चाहिए और इस मसले का राजनीतिक और कूटनीतिक हल खोजा जाना चाहिए."

तुर्की और अज़रबैजान

इमेज स्रोत, Barcroft Media

इमेज कैप्शन, तुर्की के केचिरिन जिले की एक इमारत में तुर्की और अज़रबैजान के राष्ट्रीय झंडों के साथ सेथ दोनों देशों के राष्ट्रपति अर्दोआन और इलहाम अलीयेव की तस्वीरें लगाई गई हैं.

दोनों देशों के बीच संघर्ष की शुरूआत से ही कई बार युद्धविराम के लिए मध्यस्थता की कोशिश की गई है.

रूस, आर्मीनिया का मित्र है लेकिन अज़रबैजान के साथ उसके अच्छे संबंध हैं. रूस ने दो बार युद्धविराम के लिए मध्यस्थता की लेकिन दोनों ही बार युद्धविराम कारगर नहीं हो सका. युद्धविराम लागू होने के मिनटों बाद ये टूट गया. दोनों पक्षों का आरोप है कि युद्धविराम को दूसरे पक्ष ने मिनटों में तोड़ दिया.

2px presentational grey line

नागोर्नो-काराबाख़ के बारे में कुछ बातें

  • नागोर्नो काराबाख़ 4,400 वर्ग किलोमीटर यानी 1,700 वर्ग मील का पहाड़ी इलाक़ा है.
  • पारंपरिक तौर पर यहां ईसाई आर्मीनियाई और तुर्क मुसलमान रहते हैं.
  • सोवियत संघ के विघटन से पहले ये एक स्वायत्त क्षेत्र बन गया था जो अज़रबैजान का हिस्सा था.
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस इलाक़े को अज़रबैजान के हिस्से के रूप में मान्यता दी जाती है, लेकिन यहां की अधिकांश आबादी आर्मीनियाई है.
  • आर्मीनिया समेत संयुक्त राष्ट्र का कोई सदस्य किसी स्व-घोषित अधिकारी को मान्यता नहीं देता.
  • 1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध में 30 हज़ार से अधिक लोगों की जानें गईं. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया.
  • उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख़ के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया. 1994 में यहाँ युद्धविराम की घोषणा हुई थी, उसके बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है और अक्सर इस क्षेत्र में तनाव पैदा हो जाता है.
  • 1994 में यहां युद्धविराम हुआ जिसके बाद से यहां गतिरोध जारी है.
  • तुर्की खुल कर अज़रबैजान का समर्थन करता है.
  • यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना है.
  • इस इलाक़े को लेकर 27 सितंबर 2020 को एक बार फिर अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच जंग शुरू हो गई.
  • समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार अब तक युद्ध में 1,200 लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि माना जा रहा है मृतकों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
वीडियो कैप्शन, आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच युद्ध में भारत किसकी ओर है?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)