टेरर फ़ंडिंग: पाकिस्तान FATF की ग्रे लिस्ट में बना रहेगा

इमरान ख़ान

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पाकिस्तान फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) की ग्रे लिस्ट में बना रहेगा.

बुधवार से शुरू हुई तीन दिनों की फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) की वर्चुअल बैठक के अंतिम दिन शुक्रवार को इसपर फ़ैसला लिया गया. कोरोना महामारी के कारण यह बैठक ऑनलाइन हुई थी.

पाकिस्तान अब फ़रवरी 2021 तक ग्रे लिस्ट में बना रहेगा. पाकिस्तान जब तक एफ़एटीएफ़ की छह मापदंड़ों को पूरा नहीं करता वो ग्रे लिस्ट में बना रहेगा.

इस बैठक में इसकी समीक्षा की गई कि पाकिस्तान चरमपंथ की फ़ंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग रोकने में कितना कामयाब रहा है.

बीते कुछ दिनों से इस बैठक और पाकिस्तान में इसे लेकर तैयारियों पर भारत समेत कई देशों की निगाहें लगातार बनी रहीं थीं.

फ़रवरी, 2020 में हुई बैठक में एफ़एटीएफ़ ने कहा था कि पाकिस्तान 27 मापदंडों में से सिर्फ़ 14 मापदंडों पर खरा उतरा है. एफ़एटीएफ़ ने बाक़ी के 13 शर्तों को लागू करने के लिए पाकिस्तान को चार महीने का और वक़्त दिया था.

इनके आधार पर ही एफ़एटीएफ़ को यह फ़ैसला करना था कि पाकिस्तान को ग्रे या ब्लैक लिस्ट में रखना है या नहीं.

11 अक्तूबर को एपीजी (एशिया पैसिफ़िक ग्रुप) ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में पाकिस्तान को 'बढ़े हुए फ़ॉलो-अप लिस्ट' में रखा था. एपीजी ने इसके पीछे पाकिस्तान की ओर से मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ को फ़ंड रोकने में नाकाम रहने की वजह बताई थी.

इस रिपोर्ट में जहां इस बात को सराहा गया कि पाकिस्तान एफ़एटीएफ़ की 27 सिफ़ारिशों को पूरी करने में सक्रिय रहा और टेरर फ़ंडिंग की रोकथाम के लिए 15 मामलों में क़ानून भी बना चुका है लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि कुछ सिफ़ारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि पाकिस्तान की तरफ़ से इस मामले में उठाए गए क़दमों से एफ़एटीएफ़ पूरी तरह संतुष्ट नहीं है.

इससे पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा था कि कुल 27 सिफ़ारिशों में से पाकिस्तान ने 21 पर सौ फ़ीसद अमल कर दिया है और पाकिस्तान की सरकार बाक़ी बची छह सिफ़ारिशओं पर भी जल्द अमल करने के लिए प्रतिबद्ध है.

एफ़एटीएफ़ क्या है और ये कैसे काम करता है?

FATF की बैठक

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एफ़एटीएफ़ एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसकी स्थापना G7 देशों की पहल पर 1989 में की गई थी. संस्था का मुख्यालय पेरिस में है.

इस संस्था का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने के लिए नीतियां बनाना है. हालांकि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद चरमपंथ की फंडिंग को रोकने का उद्देश्य भी इसमें शामिल किया गया.

एफ़एटीएफ़ ने जून, 2018 में पाकिस्तान को अपने ग्रे लिस्ट में शामिल किया था.

एफ़एटीएफ़ ने इसकी वजह पाकिस्तान की ओर से कथित तौर पर उन संगठनों को फंडिंग देना बताया जो वैश्विक चरमपंथ को फैलाने में शामिल हैं.

इसके तत्काल बाद पाकिस्तान ने चरमपंथी समूहों पर कार्रवाई शुरू कर दी और उनके ठिकानों पर छापेमारी की. जमात-उद-दावा और उसके सहयोगियों के ऊपर कार्रवाई की गई.

जुलाई, 2019 में जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को गिरफ़्तार किया गया और इसी साल दिसंबर में उन पर मामला चलाया गया.

हाफिज सईद को पहले भी कई बार गिरफ़्तार करके छोड़ा जा चुका है.

भारत की ओर से हाफिज सईद की गिरफ़्तारी पर सतर्कता पूर्ण प्रतिक्रिया दी गई थी. इससे पहले 2008 और 2009 में हाफिज सईद की मुंबई हमलों में संलिप्तता के आरोप में गिरफ़्तारी हुई ही थी लेकिन बाद में रिहा कर दिया गया था.

ग्रे लिस्ट क्या है?

हाफ़िज़ सईद

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संस्था के जिस लिस्ट में पाकिस्तान को शामिल किया गया है उसे आम भाषा में ग्रे लिस्ट कहते हैं. हालांकि एफ़एटीएफ़ इस लिस्ट को लेकर कोई विशेष शब्दावली का प्रयोग नहीं करता है.

ग्रे लिस्ट में शामिल देश वो होते हैं जहाँ चरमपंथ की फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग का जोखिम सबसे ज़्यादा होता है लेकिन वो एफ़एटीएफ़ के साथ मिलकर इसे रोकने को लेकर काम करने के लिए तैयार होते हैं.

एफ़एटीएफ़ से जुड़ी एजेंसी एशिया पैसिफिक ग्रुप (एपीजी) इस मामले में संबंधित देश पर नज़र रखती है कि वो चरमपंथ को मिलने वाली फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग को खत्म करने को लेकर कितना गंभीर है. ग्रे लिस्ट में अभी 18 देश शामिल हैं.

एपीजी की तरह ही यूरोप, दक्षिण अमरीका और दूसरे क्षेत्रों में एफ़एटीएफ़ से जुड़ी एजेंसियाँ हैं.

ग्रे लिस्ट के अलावा एफ़एटीएफ़ का एक ब्लैक लिस्ट भी है. जहाँ ग्रे लिस्ट में शामिल देश एफ़एटीएफ़ के साथ मिलकर काम करने को इच्छुक होते हैं तो वहीं ब्लैक लिस्ट में वैसे देश शामिल होते हैं जो यह साबित करने की कोशिश नहीं करते हैं कि उन पर लगे इल्जाम बेबुनियाद है. वो इन आरोपों से बाहर निकलने की भी कोशिश नहीं करते हैं. अभी ब्लैक लिस्ट में दो देश हैं- ईरान और उत्तर कोरिया.

पाकिस्तान के लिए ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने की क्या अहमियत है?

इमरान ख़ान और शाह महमूद कु़रैशी

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पाकिस्तान के लिए इस लिस्ट से बाहर आना काफी अहमियत रखता है. पाकिस्तान के ऊपर चरमपंथियों को आर्थिक मदद मुहैया कराने का आरोप साल 2000 से लग रहा है. भारत एफ़एटीएफ़ की अगली बैठक पर नज़र गड़ाए हुए है और अमरीका भी करीब से हालात पर नज़र रखे हुए है.

एक समाचार चैनल से पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा है कि पाकिस्तान को जल्दी ही लिस्ट से बाहर निकाल लिया दिया जाएगा लेकिन कितनी जल्दी यह हो पाएगा, इसे लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा.

पहले भी पाकिस्तान 2013 से लेकर 2016 तक ग्रे लिस्ट में रह चुका है. संतोषजनक रिपोर्ट्स के बाद पाकिस्तान को लिस्ट से बाहर निकाल दिया गया था. एक बार फिर से एफ़एटीएफ़ की ओर से उठाए गए मुद्दों पर पाकिस्तान काम करने की कोशिश में लगा हुआ ताकि वो जल्द से जल्द इस लिस्ट से बाहर आ सके.

ग्रे लिस्ट में बने रहने से पाकिस्तान को मिलने वाले विदेशी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. इसके अलावा आयात, निर्यात और आईएमएफ़ और एडीबी जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज लेने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है.

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि पाकिस्तान विदेशी मदद पर अपनी आर्थिक स्थिति के लिए बहुत हद तक निर्भर है, ग्रे लिस्ट में बने रहना देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित कर रही है. ग्रे लिस्ट में बने रहना ई-कॉमर्स और डिजिटल फाइनेंसिंग के लिए भी एक गंभीर बाधा है.

पाकिस्तान ने ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए अब तक क्या किया है?

इस साल फरवरी में एफ़एटीएफ़ ने कहा था कि पाकिस्तान 27 मापदंडों में से सिर्फ़ 14 मापदंडों पर खड़ा उतरा है. लेकिन सितंबर में मनी लॉन्ड्रिंग और चरमपंथ को फंड रोकने के मकसद से पाकिस्तान की संसद में कई बिल और संशोधन पास किए गए हैं.

पाकिस्तान ने चरमपंथ रोधी क़ानून को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के मापदंडों के अनुकूल इसे और मज़बूत बनाया है. इसके अलावा कुछ इलाकों में लोक कल्याणकारी संस्थाओं पर प्रशासनिक और वित्तीय निगरानी भी बढ़ाई गई है.

पाकिस्तान ने अभियोजन प्रक्रिया में बदलाव लाकर इसे और कठोर बनाया है.

करेंसी

कूटनीतिक प्रयास

अभी पाकिस्तान और ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए 39 सदस्यों में से कम से कम 12 सदस्यों के समर्थन की जरूरत है.

भारत और उसके सहयोगी पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डलवाने की कोशिश में लगे हुए हैं लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान के सहयोगी देश यह मानते हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद पाकिस्तान चरमपंथ को कुचलने को लेकर हर संभव प्रयास में लगा हुआ है.

सितंबर में चीन ने अक्तूबर में होने वाली समीक्षा बैठक को लेकर यह उम्मीद जताई थी कि यह पाकिस्तान के पक्ष में होगा.

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