अज़रबैजान के राष्ट्रपति ने कहा, रुक जाए आर्मीनिया वरना ख़ूनखराबा बढ़ेगा

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नार्गोनो-काराबाख़ के इलाके के लिए अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच पिछले दो हफ़्ते से चली आ रही लड़ाई अभी तक रुकी नहीं है. गुरुवार को इस संघर्ष के 19वें दिन भी यह विवाद गहराता ही नज़र आ रहा है.
अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव ने थोड़ी देर पहले ही ट्वीट करके आर्मीनिया को खुली चेतावनी दी है.
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उन्होंने ट्वीट किया, "मैं आर्मीनिया की सरकार और लोगों को स्पष्ट संदेश देता हूँ कि वो आज़ाद इलाकों में लौटना तुरंत बंद करें. उनके इस कदम से सिर्फ़ ख़ूनखराबा और पीड़ित ही बढ़ेंगे."
गुरुवार की सुबह ही आर्मानिया और अज़रबैजान ने बताया था कि युद्धविराम के बावजूद नार्गोनो-काराबाख़ इलाके में हिंसक संघर्ष जारी है और हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं.
आर्मीनियाई रक्षा मंत्रालय की प्रवक्ता सुशान स्तेपान्यान ने अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में बताया कि अज़रबैजान के सशस्त्र बलों ने गोलीबारी फिर से शुरू कर दी है.
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अज़बैजान के रक्षा मंत्रालय ने भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "आर्मीनिया के सशस्त्र बलों ने कुछ इलाकों में अज़रबैजान की सेना पर हमले किए हैं और जवाब में अज़रबैजान की सेना ने उनके दो T-72 टैंक और एक एंटी क्राफ़्ट मिसाइल नष्ट कर दी."
इससे एक दिन पहले आर्मीनिया के राष्ट्रपति निकोल पाशिन्यान ने कहा था कि इस युद्ध में उनकी सेना को बड़ा नुक़सान हुआ है. पाशिन्यान ने कहा था कि अज़रबैजान लगातार आक्रामक बना हुआ है और उसने एक सेकेंड के लिए भी युद्धविराम (सीज़फ़ायर) का पालन नहीं किया.

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बीबीसी ने पुष्टि की, अज़रबैजान ने दागी थी मिसाइल
इस बीच बीबीसी संवाददाताओं ने पुष्टि की है कि अज़रबैजान ने बुधवार को आर्मीनिया के इलाके में एक मिसाइल दागी थी. हालाँकि रूस ने अभी इसकी पुष्टि नहीं की है लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रेस सेक्रेटरी पेस्कोव ने कहा कि रूसी सेना इन रिपोर्टों की जाँच करेगी.
जानकारों का कहना है कि आर्मीनिया के इलाके में अज़रबैजान का ये मिसाइल हमला युद्ध की दिशा बदल सकता है. यह पहली बार है जब अज़रबैजान ने ग़ैर मान्यता प्राप्त नार्गोनो-कराबाख़ से बाहर हमला किया है. इस मिसाइल स्ट्राइक के अंतरराष्ट्रीय और राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं.
अज़रबैजान के उलट आर्मीनिया रूस के साथ सीएसीटीओ (कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) का सदस्य है. यानी आर्मीनिया पर हमला रूस की ओर से संघर्ष में हस्तक्षेप का कारण बन सकता है. अब तक रूस ने युद्धरत देशों के बीच संतुलन बनाने और मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान अज़रबैजान ने तुर्की से आयात किए जाने वाले हथियारों की संख्या भी बढ़ा दी है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन इस जंग में खुलकर अज़रबैजान का समर्थन कर रहे हैं.
युद्ध और हिंसा के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात को लेकर चिंतित है कि इस दौरान युद्धग्रस्त इलाकों में कोरोना संक्रमण फ़ैलने की आशंका कई गुना ज़्यादा बढ़ गई है.

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कौन सा देश किसके साथ?
नार्गोनो-काराबाख़ में शांति बनाए रखने के लिए 1929 में फ़्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता शुरू हुई थी.
कुछ दिनों पहले मिंस्क ग्रुप की एक बैठक के बाद अमरीका, फ़्रांस और रूस ने नार्गोनो-काराबाख़ में जारी लड़ाई की आलोचना की थी और कहा है कि 'युद्ध जल्द ख़त्म होना चाहिए'.
हालाँकि अज़रबैजान के समर्थन में उतरे तुर्की ने युद्धविराम की मांग को रद्द कर दिया है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन ने कहा कि युद्धविराम तभी संभव है जब आर्मीनिया अज़रबैजान के इलाक़े पर अपना कब्ज़ा ख़त्म करे.
वहीं, रूस के आर्मीनिया के साथ गहरे संबंध हैं और मौजूदा तनाव के दरम्यान उसने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की थी लेकिन आर्मीनिया पर ताज़ा हमले के बाद जानकारों की नज़र एक बार फिर रूस की ओर है.
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