अज़रबैजान-आर्मीनिया से ग्राउंड रिपोर्ट: बमबारी, जंग और दहशत की दुनिया

आर्मीनिया और अज़रबैजान संघर्ष

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    • Author, इल्या बरबानोव और मरीना कातयेवा
    • पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा, नागोर्नो-काराबाख़

आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच हमले, गोलीबारी और आपसी आरोप-प्रत्यारोप जारी है.

आर्मीनियाई अधिकारियों का कहना है कि नागोर्नो-काराबाख़ की राजधानी स्टेपनाकियर्ट (दोनों देश जिस क्षेत्र पर लड़ रहे हैं) पर बमबारी की गई है, जबकि अज़रबैजान का कहना है कि उसका दूसरा सबसे बड़ा शहर गांजा हमले में बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.

बीबीसी रूसी सेवा की एक टीम ने विवादित क्षेत्र नागोर्नो-काराबाख़ के कई हिस्सों का जायज़ा लिया और दो देशों के बीच चल रहे इस युद्ध को देखा. टीम ने स्थानीय लोगों से भी बात की.

बीबीसी संवाददाता लाचिन पहुंचे जो नागोर्नो-काराबाख़ और आर्मीनिया के बीच की सीमा के क़रीब का एक शहर है.

यहां सायरन की आवाज़ आ रही है. शायद यह गोलाबारी की चेतावनी होगी. आर्मीनिया और काराबाख़ के बीच परिवहन लिंक को काटने की कोशिश में अज़रबैजान की सेना तीन दिनों से इस शहर में पुल पर हमला कर रही है.

उत्तरी सीवन झील के किनारे दो सड़कें हैं, जो आर्मीनिया से काराबाख़ को जाती हैं. ये अज़रबैजान नियंत्रित क्षेत्रों के बहुत क़रीब है.

संघर्ष के पहले दिनों से इसे काट दिया गया था. 'द लाचिन कॉरिडोर' नागोर्नो-काराबाख़ की राजधानी स्टेपनाकियर्ट से आर्मीनियाई राजधानी येरेवन का मुख्य मार्ग है.

आर्मेनिया और अजरबैजान

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इमेज कैप्शन, लाचिन के इस पुल पर लगातार गोलीबारी हो रही थी

बमबारी और कानों के पर्दे चीरते सायरन

रविवार को हम सुबह स्टेपनाकियर्ट की दिशा में अपनी यात्रा कर सके लेकिन शाम को पुल यातायात के लिए असुरक्षित हो चुके थे. सड़कों पर काम करने वाले लोग पतली नदी में बजरी डालते हैं ताकि कारों के लिए एक अस्थायी रास्ता तैयार हो सकें.

जैसे-जैसे हम लाचिन के सेंटर तक पहुंचने के रास्ते में होते हैं. गोलीबारियों का नया दौरा शुरू हो जाता है और हवाई हमले की चेतावनियों वाले सायरन इतने तेज़ बजते हैं कि लगता है कानों के पर्दे चीर देंगे.

एक पुलिस कार सड़क पर दौड़ रही है. लाउडस्पीकर से चिल्लाती हुई आवाज़ लोगों को जल्द से जल्द शरण लेने का आग्रह करती है.

बीबीसी की टीम के लिए सबसे नज़दीकी शेल्टर एक सुपरमार्केट का तहख़ाना है. इसकी मालकिन, नेली ने अपने परिवार के साथ कैलिफ़ोर्निया में 17 साल बिताए और फिर अपने देश लौटने का फ़ैसला किया था.

दो बक्सेनुमा कमरे जिनमें टमाटर, चावल के बैग, ब्रैंडी की बोतलें और फावड़े थे, अब धीरे-धीरे लोगों से भर रहे हैं.यहां स्थानीय लोग भी हैं और कुछ हम जैसे लोग हैं, जो लाचिन जा रहे थे लेकिन बिगड़े माहौल में सफ़र रोकने को मजबूर हो गए.

नेली ने सभी को खाना और कॉफ़ी दी,जो उन्होंने उसी तहख़ाने में बनाई थी.

इस हॉस्टल का बेसमेंट शरणार्थियों के लिए बम शेल्टर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है

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इमेज कैप्शन, इस हॉस्टल का बेसमेंट शरणार्थियों के लिए बम शेल्टर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है

कुछ सफ़ेद और कुछ काले बालों वाले एक पतला शख़्स वहाँ वेस्टकोर्ट पहने खड़ा था. उनके कोट के ऊन एक जगह से बाहर आते दिख रहे थे. हमें पहली नज़र में वो एक पत्रकार लगे.

लेकिन हमें पता चला कि ग्रेचिक अरमेनाकियान नाम के ये शख़्स एक आर्टिस्ट हैं. पहले काराबाख़ युद्ध के दौरान वो पढ़ाई कर रहे थे. 2016 में, जब आखिरी बार इस इलाक़े में लड़ाई लड़ी गई थी तो उस दौरान वो मॉस्को में रह रहे थे.

अब वो येरेवान में रह रहे हैं. वो बताते हैं कि कि जब यहां लड़ने आ रहे थे तो ये फ़ैसला लेने से पहले अपने दोस्तों और परिवार से राय तक नहीं ली.

उन्होंने बताया, ''मेरे दोस्तों और परिवार वालों ने कहा कि इससे मेरा कोई मतलब नहीं है. मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए. मैं घर पर ही रहूँ. मैने सबसे कहा मैं काराबाख़ जाऊंगा और आज सुबह ही मैं यहां के लिए निकल आया.''

एक कलाकार और एक फ़ाइटर

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हमने ग्रेचिक से पूछा कि उन्होंने जब कभी युद्ध नहीं लड़ा तो वह जंग के मैदान में क्या करेंगे. क्या वो एक सेना के जवान के तौर पर वॉलंटियर करेंगे?

उन्होंने बताया, ''मैं तोपखाने को दिशा देने में मदद कर सकता हूं. हम कलाकारों के पास दूरी की अच्छी समझ होती है.''

ग्रेचिक के पास कोई सैन्य कौशल नहीं है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि उन्हें प्रशिक्षण मिलेगा और वो यह भी मानते हैं कि युद्ध में कोई भी मदद महत्वपूर्ण है: नैतिक, शारीरिक, और प्रतिभा, जिसके लिए वह ख़ुद को सक्षम मानते हैं.

ये रास्ता आर्मीनिया से नागोर्नो-काराबाख़ की ओर जाता है

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यहां आकर नागोर्नो- काराबाख़ में लड़ने का उनका फ़ैसला कुछ अजीब लग सकता है लेकिन हमने ख़ुद देखा कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से बहुत से आर्मीनियाई मॉस्को होते हुए काराबाख़ आ रहे हैं.

आम तौर पर येरेवान-मॉस्को रूट पर चलने वाले काफ़ी छोटे विमानों के बजाय आजकल बड़े बोइंग-777 विमान इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

इस तरह के विमान अक्सर पर्यटकों को न्यूयॉर्क या थाइलैंड जैसी लोकप्रिय हॉलीडे डेस्टिनेशन (छुट्टियों वाली जगह) पर ले जाने के लिए इस्तेमाल के जाते हैं.

अब 50-60 साल की उम्र वाले दर्जनों लोग इन विमानों में बैठ रहे हैं और नागोर्नो- काराबाख़ आ रहे हैं. इनमें से कई लोगों ने पहले भी ये किया है - 30,20 और यहां तक कि चार साल पहले भी.

बीबीली की टीम लाचिन से गुज़री

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पत्रकारों को रोकती सेना

स्थानीय प्रशासन के एक प्रतिनिधि गेवगोर मन्त्साकन ने कहा कि लाचिन ही सिर्फ़ काराबाख़ के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण शहर नहीं है. उन्होंने कहा,''सभी शहर और कस्बे हमारे लिए बराबर महत्वपूर्ण हैं."

उन्होंने बताया कि अब तक लाचिन में कोई गंभीर गोलाबारी या नुक़सान नहीं हुआ है.

सैन्य वर्दी वाले आदमी हमारी बातचीत में बार-बार बाधा डाल रहे थे. लड़ाई की शुरुआत में सेना चाहती थी कि इलाक़े में पत्रकारों की मौजूदगी रहे लेकिन अब वो ज़्यादा चौकन्ने हैं.

वो कोई लाइव स्ट्रीम या ब्रॉडकास्ट नहीं चाहते हैं क्योंकि उन्हें चिंता है कि इससे इंटरव्यू की सटीक लोकेशन का पता चल जाएगा.

हमें सिर्फ़ सादे बैकग्राउंड में फ़िल्म करने के लिए कहा गया ताकि कुछ ऐसा ना दिखे जिससे पता चले कि हम कहां हैं.

स्थानीय प्रशासन के एक प्रतिनिधि गेवगोर मन्त्साकन

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रोती औरतें, मज़बूत दिखने की कोशिश करते मर्द

हम गोलीबारी बंद होने का इंतज़ार कर रहे हैं. उधर तहख़ाने में भीड़ बढ़ती जा रही है.

यहां हर तरह के लोग हैं: पत्रकार जो स्टेपनाकियर्ट से आए हैं, कुछ शरणार्थी जो अज़रबैजानी सीमा के नज़दीक के गांवों से आए हैं और वॉलंटियर जो युद्ध वाले इलाक़े में जा रहे हैं.

कुछ औरतें रो रही हैं, अपने घरों के नुक़सान को लेकर दुखी हैं. वहीं, कुछ अन्य शांत हैं और इस बात पर चर्चा कर रही हैं कि कब वो वापस लौट पाएंगी.

कुछ आदमी तहख़ाने के दरवाज़े पर सिगरेट पी रहे हैं और ये दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि वो डरे हुए नहीं हैं. वो दावा करते हैं कि भले ही हमें शेल्टर लेने के लिए कहा गया है लेकिन असल बमबारी दूर स्टेपनाकियर्ट में ही हो रही है.

जैसे ही उनकी ये बात ख़त्म हुई, हमारे बहुत नज़दीक एक बम विस्फोट हुआ. वो तुरंत सभी के साथ तहख़ाने में छिप गए.

शुषा से दिखता स्टेपनाकियर्ट

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हर रात बमबारी और दहशत

प्राचीन शहर शुषा, स्टेपनाकियर्ट से गाड़ी से 10-15 मिनट की दूरी पर है. राजधानी स्टेपनाकियर्ट घाटी में स्थित है वहीं शुषा हिलसाइड पर. यहां आम तौर पर कम गोलीबारी होती है, लेकिन जब होती है तो शरण लेने के लिए कोई तहख़ाना मिलना मुश्किल हो जाता है.

शुषा के जिस सांस्कृतिक केंद्र में कुछ शरणार्थियों ने पनाह ली हुई थी, रविवार को उस जगह गोलीबारी हुई. नागोर्नो-काराबाख़ गणराज्य की स्वयंभू सरकार ने दावा कि उस दिन शुषा और स्टेपनाकियर्ट में कम से कम चार आम नागरिकों की मौत हो गई.

शुषा से स्टेपनाकियर्ट साफ़ दिखता है. हमने यहां कुछ घंटों तक फ़िल्म किया और जब हम यहां थे तो यहां कोई गोलीबारी नहीं हुई. लेकिन हम जानते हैं कि स्टेपनाकियर्ट में हर सुबह और हर रात लगातार बमबारी होती है.

स्टेपनाकियर्ट में मौजूद हमारे पत्रकार साथी बताते हैं कि वहां हर दिन हालात और बुरे होते जा रहे हैं. शुषा में हम लोगों से मिले. ज़्यादातर बहुत बूढ़े थे. वो अज़रबैजान की सीमा से लगने वाले गांवों से आए थे.

राया गेवोर्कियन एक रूसी टीचर हैं. वो कहती हैं कि उन्हें स्थानीय प्रशासन से एक फ़ोन आया, जिसमें उन्हें यहाँ से चले जाने के लिए कहा गया. वो हमें बताती हैं, "वो जितना हो सके आम नागरिकों की मौत के नुक़सान को कम करना चाहते हैं."

तहख़ाने में शरणार्थी

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बेटे ज़िंदा हैं या नहीं, माँ को नहीं मालूम

1988 में उन्हें अज़रबैजान छोड़ना पड़ा था. 1992 और 2016 में उन्हें अस्थाई तौर पर नागोर्नो-काराबाख़ से निकलना पड़ा था. ये चौथी बार है जब वो घर छोड़ने पर मजबूर हो रही हैं. उनके दो बेटे हैं जो युद्ध के मैदान में हैं. वो नहीं जानती कि उनके बेटे ज़िंदा भी हैं या नहीं क्योंकि उनकी अपने बेटों से कोई बात नहीं हो पा रही है.

यहाँ के शरणार्थी समूह में एक अन्य महिला ऐडा मेलकानियन भी हैं. वो भी अपनों के लिए चिंतित हैं. उनका बेटा 18 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गया था और उनका एक भाई भी है जिन्होंने लड़ाई के लिए वॉलंटियर किया था.

ऐडा कहती हैं कि उनकी कुछ दिन पहले अपने भाई से बात हुई थी. उन्होंने उनसे कहा कि उनपर गोलीबारी हो रही है और वो अब पैदल ही स्टेपनाकियर्ट जाने की कोशिश कर रहे हैं. यहाँ कोई यातायात का साधन नहीं है.

वो कहती हैं, "वो कह रहा था कि वो घायल नहीं हुआ है लेकिन मैं उसकी आवाज़ से बता सकती हूँ कि कुछ तो ग़लत हुआ था. ये एक भयावह स्थिति है. फिर भी दुनिया चुप है. ये 21वीं सदी है और शांतिपूर्ण आम नागरिकों पर बमबारी हो रही है, ये अमानवीय है"

लाचिन में पनाह लिए हुए लोग

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नागोर्नो-काराबाख़ को किसी ने भी स्वतंत्र राज्य के तौर पर मान्यता नहीं दी है, यहां तक कि आर्मीनिया ने भी नहीं. गैर-मान्यता प्राप्त गणराज्य का येरेवन में एक प्रतिनिधि तो है, लेकिन दूतावास नहीं है.

लड़ाई को शुरू हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा वक़्त हो गया है. लेकिन संकेत है कि 30 साल में पहली बार अज़रबैजान को तुर्की का समर्थन मिला है.

दूसरे देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं - रूस, फ्रांस, अमरीका, यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र, नेटो और ओएससीई मांग कर रहे हैं कि लड़ाई रोकी जाए और शांतिपूर्ण बातचीत फिर शुरू की जाए.

लेकिन इस बार तुर्की और अज़रबैजान दोनों ही कह रहे हैं कि बातचीत फिर से तभी शुरू होगी जब आर्मीनिया 'नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़ा' छोड़ देगा.

वो चाहते है कि गैर-मान्यता प्राप्त गणराज्य और आर्मीनिया के सुरक्षाबल क्षेत्र से चले जाएं, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अज़रबैजान का है.

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