आर्मीनिया-अज़रबैजान: अनचाहे युद्ध में झोंके जा रहे सीरियाई युवाओं की कहानी

आर्मीनिया-अज़रबैजान संघर्ष

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नागोर्नो-काराबाख़ की लड़ाई में नियुक्त किए गए एक सीरियाई युवा ने बीबीसी अरबी सेवा के मोहम्मद इब्राहिम को बताया है कि सेना के साथ काम करने के उनके फ़ैसले के एक सप्ताह के भीतर उन्हें लड़ने के लिए अज़रबैजान भेज दिया गया.

सीरियाई युवा अब्दुल्ला (बदला हुआ नाम) का कहना है कि आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने अज़रबैजान की सीमा पर मौजूद सैन्य ठिकानों पर पहरा देने का काम करने के लिए हामी भरी थी लेकिन उन्हें बिना ट्रेनिंग लड़ाई में झोंक दिया गया.

उनका कहना है कि उन्हें सेना में आने के कुछ ही दिनों बाद नागोर्नो-काराबाख़ के इलाक़े में भेज दिया गया था जहां बीते कई दिनों से जंग जारी है.

नागोर्नो-काराबाख़ दशकों से पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच तनाव का कारण बना हुआ है.

आर्मीनिया-अज़रबैजान

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क्यों लड़ रहे हैं आर्मीनिया और अज़रबैजान?

दक्षिण पूर्वी यूरोप में पड़ने वाले कॉकेशस के इस पहाड़ी इलाक़े को अज़रबैजान अपना कहता है. हालाँकि 1994 के बाद से इस पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है.

80 के दशक के अंत से 90 के दशक के मध्य तक यहां दोनों देशों में युद्ध हुआ था. इस दौरान 30 हज़ार से अधिक लोगों की मौत हुई थी और 10 लाख से अधिक विस्थापित हुए थे.

उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया था. इस समय आर्मीनिया और अज़रबैजान ने युद्धविराम की घोषणा भी की थी लेकिन 1994 में हुए युद्धविराम के बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है.

भौगोलिक और रणनीतिक तौर पर अहम होने के कारण भी ये विवाद जटिल हो गया है. सदियों से इलाक़े की मुसलमान और ईसाई ताकतें इन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती रही हैं.

इस इलाक़े से गैस और कच्चे तेल की पाइपलाइनें गुज़रती है इस कारण इस इलाक़े के स्थायित्व को लेकर चिंता जताई जा रही है.

आर्मीनिया-अज़रबैजान मैप

असली विवाद की शुरुआत

1920 के दशक में जब सोवियत संघ बना तो अभी के ये दोनों देश (आर्मीनिया और अज़रबैज़ान) उसका हिस्सा बन गए. लेकिन असल विवाद 1980 के दशक में शुरू हुआ जब सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ और नागोर्नो-काराबाख को सोवियत अधिकारियों ने अज़रबैजान के हाथों सौंप दिया.

नागोर्नो-काराबाख की संसद ने आधिकारिक तौर पर ख़ुद को आर्मीनिया का हिस्सा बनाने के लिए वोट किया. नागोर्नो-काराबाख की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है. दशकों तक नागोर्नो-काराबाख के लोग ये इलाक़ा आर्मीनिया को सौंपने की अपील करते रहे.

इस मुद्दे को लेकर यहां अलगाववादी आंदोलन शुरू हो गया और अज़रबैजान ने इसे ख़त्म करने की कोशिश की. इस आंदोलन को लगातार आर्मीनिया का समर्थन मिलता रहा.

नतीजा ये हुआ कि यहां जातीय संघर्ष होने लगे और सोवियत संघ से पूरी तरह आज़ाद होने के बाद एक तरह का युद्ध शुरू हो गया.

यहां हुए संघर्ष के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा. दोनों पक्षों की तरफ़ से जातीय नरसंहार की ख़बरें भी आईं.

फ़ायरिंग पोज़िशन पर अज़रबैजान के दो सैनिक

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साल 1994 में रूस की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा से पहले नागोर्नो-काराबाख पर आर्मीनियाई सेना का क़ब्ज़ा हो गया.

इस डील के बाद नागोर्नो-काराबाख अज़रबैजान का हिस्सा तो रहा लेकिन इस इलाक़े पर अलगाववादियों की हूकूमत रही जिन्होंने इसे गणतंत्र घोषित कर दिया. यहां आर्मीनिया के समर्थन वाली सरकार चलने लगी जिसमें आर्मीनियाई जातीय समूह से जुड़े लोग थे.

इस डील के तहत नागोर्नो-काराबाख लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट भी बना, जो आर्मीनिया और अज़रबैजान के सैनिकों को अलग करता है.

नागोर्नो काराबाख़ में लड़ने कि लिए जा रहे आर्मीनियाई सैनिक

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कौन देश किसके साथ?

नागोर्नो-कराबाख़ में शांति बनाए रखने के लिए 1929 में फ्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता शुरू हुई थी.

हाल में मिंस्क ग्रुप की एक बैठक के बाद अमरीका, फ्रांस और रूस ने नागोर्नो काराबाख़ में जारी लड़ाई की आलोचना की है और कहा है कि 'युद्ध जल्द ख़त्म होना चाहिए'.

हालाँकि अज़रबैजान के समर्थन में उतरे तुर्की ने युद्धविराम की मांग को रद्द कर दिया है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन ने कहा है कि युद्धविराम तभी संभव है जब आर्मीनिया अज़रबैजान के इलाक़े पर अपना कब्ज़ा ख़त्म करे.

वहीं रूस के आर्मीनिया के साथ गहरे संबंध हैं और मौजूदा तनाव के बीच उसने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है.

वीडियो कैप्शन, आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई की वजह क्या है?

यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं. लेकिन अज़रबैजान की सरकार के साथ भी रूस के अच्छे संबंध हैं.

अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नेटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कहा था.

वहीं, आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी.

ताज़ा विवाद गहराया तो तुर्की एक बार फिर अपने मित्र के समर्थन में आ गया.

लेकिन इस पर तुर्की से फ्रांस नाराज़ हो गया है. फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तुर्की से कहा है कि अब इस मामले में ख़तरे की रेखा पार कर ली गई है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

आर्मीनिया-अज़रबैजान

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आर्मीनिया-अज़रबैजान की लड़ाई में सीरियाई युवा

आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिनयान ने ये दावा दोहराया है कि इस विवाद में मर्सिनरी (किराए के लड़ाके) जुड़ गए हैं जो अज़रबैजान और तुर्की 'विदेशी आतंकी लड़ाकों की मदद और हिस्सेदारी से' ये जंग लड़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, "ये आतंकवाद अमरीका, ईरान, रूस और फ्रांस के लिए भी इतना ही बड़ा ख़तरा है."

उनकी इस बात से फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों भी इत्तफ़ाक रखते हैं, जिन्होंने कहा था कि इस बात की ख़ुफ़िया जानकारी मिली है कि 'जिहादी समूहों' के 300 सीरियाई लड़ाके एलप्पो से निकाले गए हैं और वो अज़रबैजान के लिए तुर्की के रास्ते जा रहे हैं.

आर्मीनिया ने इससे पहले भी आरोप लगाया था कि सीरिया के क़रीब 4,000 नागरिकों को लड़ाई में शिरकत करने के लिए अज़रबैजान भेजा गया है लेकिन तुर्की ने इस बात से इनकार किया है.

अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव का कहना है कि आर्मीनिया के साथ जारी इस लड़ाई में तुर्की बाहर से समर्थन कर रहा है लेकिन वो इसमें सीधे तौर पर शामिल नहीं है.

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अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर तुर्की और अज़रबैजान बेहद क़रीब हैं. लेकिन ये पहली बार नहीं है जब सीरियाई लड़ाकों को लड़ाई के लिए तुर्की के ज़रिए देश के बाहर ले जाया गया है.

बीते साल मई में संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तर सीरिया के कई लड़ाकों को लीबिया के गृहयुद्ध में लड़ने के लिए तुर्की के ज़रिए वहां ले जाया गया था.

त्रिपोली में सारियाई लड़ाकों के कई वीडियो सामने आए थे जिसके बाद तुर्की पर आरोप लगा था कि वो वहां के गृहयुद्ध में घी डालने का काम कर रहा है.

सीरियस ऑब्ज़रवेटरी फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के निदेशक रामी अब्दुल रहमान कहते हैं कि लड़ाकों को अज़रबैजान भेजा जाए या नहीं इसे लेकर विपक्षी सारियाई गुट में फिलहाल आम सहमति नहीं है.

तुर्कमेन मूल से जुड़े गुटों का कहना है कि तुर्की के कहने पर सैनिकों को वहाँ भेजा जाना चाहिए लेकिन होम्स और गूटा से जुड़े लड़ाकों का कहना है कि ये अज़रबैजान के शिया मुसलमानों और आर्मीनिया के ईसाइयों के बीच की लड़ाई है जिसमें वो शामिल नहीं होना चाहते (विपक्षी सीरियाई सेना में अधिकतर सुन्नी लड़ाके हैं).

चेहरे को अपने हाथों से छिपाए हुए एक सैनिक

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कहानी सीरियाई युवा की

सीरिया के रहने वाले अब्दुल्ला (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी अरबी सेवा के मोहम्मद इब्राहिम को बताया कि उन्हें इस बात का कोई जानकारी नहीं थी कि उन्हें जंग के मैदान में भेजा जा रहा है."

उन्होंने बीबीसी संवाददाता इब्राहिम से मैसेजिंग ऐप के ज़रिए बात की. इब्राहिम से उनकी बात अक्सर ऐसे ही रुक-रुककर होती थी. अब्दुल्ला को डर था कि उनके अधिकारियों को पता चल जाएगा कि वो एक पत्रकार के साथ मैसेज पर बातें कर रहे हैं.

अब्दुल्ला ने एक संदेश में लिखा, "उन्होंने हमसे कहा कि हमें सीमा पर मौजूद सेना के ठिकानों पर पहरा देने के लिए अज़रबैजान जाना है. इसके लिए हमें 2,000 डॉलर दिए जाने की बात की गई थी. उस वक्त यहां कोई युद्ध नहीं चल रहा था और हमें किसी तरह की कोई सैन्य ट्रेनिंग भी नहीं दी गई थी."

एक सप्ताह के भीतर इस सीरियाई युवा को एक ऐसे युद्ध में झोंक दिया गया जिससे उनका कोई नाता नहीं था और उन्हें एक ऐसे देश भेज दिया गया जहां इससे पहले उन्होंने कभी कदम नहीं रखा.

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'हमें नहीं पता था कि दुश्मन कौन है और कहां है'

27 सितंबर, रविवार को अब्दुल्ला को कैंप में पहुंचे लगभग एक सप्ताह हो गया था. वो वहां कई अन्य सीरियाई लोगों के साथ थे जो पैसा कमाने के लिए यहां काम करने के लिए राज़ी हुए थे.लेकिन उन्हें उस वक्त आश्चर्य हुआ जब उन्हें वहां से जल्द कहीं और भेज दिया गया.

वो कहते हैं, "हमें अज़बैजानी सेना की यूनिफ़ॉर्म पहनने को दी गई और बख्तरबंद गाड़ियों में भर कर वहां से कहीं और भेजा गया. हम सभी को एक-एक कालाश्निकोव (एके-47 असॉल्ट राइफ़ेल) थमा दी गई."

नागोर्नो काराबाख़ में भीषण लड़ाई शुरू हो चुकी थी.

वीडियो कैप्शन, अर्दोआन ने कहा, तुर्की एक क़दम भी नहीं हटेगा पीछे

अब्दुल्ला बताते हैं, "जब गाड़ी रुकी को हमने खुद को युद्ध के मैदान में पाया. हमें नहीं पता था कि दुश्मन कहाँ है. इसके बाद बमबारी शुरू हो गई और लोग डर के मारे रोने-चीखने लगे. लोग वापस अपने घर जाना चाहते थे. एक बम हमारे नज़दीक आकर गिरा जिससे हमारे साथ के चार सीरियाई सैनिकों की मौत हो गई और तीन घायल हो गए."

अब्दुल्ला बताते हैं कि अगले कुछ दिनों में उन्होंने 10 सीरियाई सैनिकों के शव देखे. उत्तरी सीरिया में मौजूद स्थानीय सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि अज़रबैजान में सीरियाई सैनिकों की मौत की ख़बरें अब उनके परिवारों तक पहुंचने लगी हैं.

अब्दुल्ला बताते हैं कि वहां पर क़रीब 70 सीरियाई लोग हैं जो घायल हैं और उन्हें उचित स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पा रही.

नागोर्नो काराबाख़ इलाक़े में लोग लड़ाई से बचने के लिए ज़मीन खोद कर इस तरह के बंकर बना रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, नागोर्नो काराबाख़ इलाक़े में लोग लड़ाई से बचने के लिए ज़मीन खोद कर इस तरह के बंकर बना रहे हैं.

अब्दुल्ला का आख़िरी संदेश

कुछ दिनों तक इब्राहिम को अब्दुल्ला का कोई संदेश नहीं मिला. उन्हें लगा कि शायद किसी ने उनके पास फ़ोन देख लिया होगा और छीन लिया होगा.

हाँलाकि ये भी हो सकता है कि ये कमज़ोर इंटरनेट का असर हो और वो किसी से भी संपर्क न कर पा रहे हों.

उनके आख़िरी संदेशों में से एक में उन्होंने लिखा था कि वो चाहते हैं कि युद्ध ख़त्म हो और शांतिपूर्ण माहौल बने.

उन्होंने लिखा था, "जब युद्ध शुरू हुआ तो हमने अपने आला अधिकारियों से कहा कि हम सीरिया में अपने घर लौट जाना चाहते हैं, लेकिन उन्होंने इसके लिए हमें मना कर दिया. उन्होंने हमें धमकी दी कि अगर हमने लड़ने से इनकार किया तो हमें जेल में सड़ने के लिए डाल दिया जाएगा. ऐसा लग रहा है कि हम एक तरह से निर्वासित जीवन जी रहे हैं."

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