अज़रबैजान आर्मीनिया युद्ध विराम समझौता जो एक रात भी ना टिक सका- ग्राउंड रिपोर्ट

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग
    • Author, इलया बैराबानोव
    • पदनाम, बीबीसी रूसी सेवा

अज़रबैजान की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे स्टपनेकर्ट शहर में लोगों ने दस और ग्यारह अक्टूबर की दरमियानी रात अपने घरों के तहख़ानों में गुजारी.

नार्गोन-काराबाख पर हो रही लड़ाई को लेकर शनिवार को अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच रूस की मध्यस्थता में युद्ध विराम के जिस समझौते की घोषणा हुई थी, वो एक दिन भी ठीक से बरकरार नहीं रखा जा सका.

अज़रबैजान ने आर्मीनिया पर समझौता तोड़ने का आरोप लगाया. उसने कहा कि आर्मीनिया की तरफ़ गांजा शहर पर गोलीबारी की गई और शहर की एक रिहाइशी इमारत को तबाह कर दिया गया. इस घटना में कम से कम नौ लोग मारे गए.

आर्मीनिया की मिलिट्री ने इस बात से इनकार किया कि उनकी तरफ़ से गांजा शहर पर कोई हमला किया गया था.

कई दिनों के बाद शनिवार की दोपहर ऐसा लगा जब स्टपनेकर्ट शहर में हवाई हमले की चेतावनी वाले सायरन नहीं सुनाई नहीं दिए.

वीडियो कैप्शन, अज़रबैजान-आर्मीनिया के बीच जारी जंग

शहर के बहुत से लोग जो पिछले दो हफ़्तों से बेसमेंट में रह रहे थे, वे बाहर निकले और अपने अपार्टमेंट्स में जा पाए.

हवाई हमले में तबाह हो गए पावर प्लांट के पास सड़क पर हमारी मुलाकात तीन बुजुर्गों से हुई जो ताज़ा ख़बरों पर बात कर रहे थे और बीच-बीच में बेचैन होकर उनकी निगाहें आसमान की तरफ़ चली जाती थीं.

सरगिस नाम के एक बुजुर्ग ने एक दिन पहले ही अपना जन्मदिन बेसमेंट में ही पड़ोसियों के साथ मनाया था.

उन्होंने बताया, "मैं कल ही सत्तर साल का हुआ हूं. हमने एक खरगोश मारा, आलू उबाले और वोदका हमारे पास हमेशा ही रहती है. हम अपना जन्मदिन जैसे हर बार मनाते हैं, इस बार भी मनाया."

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग
इमेज कैप्शन, सरगिस

सरगिस ने एक पांच मंज़िला इमारत की तरफ़ इशारा करते हुए बताया, "हम इस इमारत में रहते हैं. लेकिन फिलहाल अपार्टमेंट्स में रहना जोख़िम भरा है, इसलिए हम बेसमेंट में रह हैं. पिछले दो हफ़्तों से हम ऐसे ही रह रहे हैं. पहली जंग के समय हम इन तहख़ानों में आठ महीने रहे थे."

बेसमेंट में बुजुर्ग

सरगिस से हमारी बातचीत में दुभाषिये का किरदार निभा रहे जेवोर्ज इन मिलिट्री क्वॉर्टर्स की ज़िंदगी के बारे में बताते हैं, "यहां हर दिन बम गिरते हैं. किसी दिन यहां गिरता है, किसी दिन वहां गिरता है. उन्होंने थोड़ी देर पहले ही शहर को निशाना बनाया है. मेरे चार छोटे बच्चे हैं और मेरी पत्नी गर्भवती हैं. उन्होंने सुबह के सात बजे ही शहर पर बमबारी शुरू कर दी. मेरे घर को अभी तक कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है लेकिन मेरे पड़ोसी का घर तबाह हो गया है. वे लोग ये नहीं देखते हैं कि कहां पर हमला करें, वे बस बम गिरा देते हैं."

जेवोर्ज और सरगिस को शुरू से ही यकीन नहीं था कि अज़रबैजान और आर्मीनिया के बीच रूस की मध्यस्थता में हुआ युद्ध विराम का समझौता टिक पाएगा.

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग

हालांकि शनिवार को स्टपनेकर्ट शहर में सन्नाटा पसरा था, लेकिन दक्षिणी मोर्चे पर अज़रबैजान के हादरुत और आर्मीनिया के कपान शहर के गांवों में सुबह से ही गोलीबारी सुनी जा रही थी.

सरगिस हमें उस बेसमेंट में ले गए जहां वे और उनके पड़ोसी पिछले दो हफ़्तों से रह रहे थे. घेर कर बनाई गए एक कोने की तरफ़ इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "ये हमारा ट्वॉलेट है."

एक पुराने कैसेट रिकॉर्डर दिखाते हुए उन्होंने कहा कि इससे हमें ख़बर मिलती है. उन्होंने बताया, "पानी की पाइप टूट गई है. हमें खुद ही ये ढोकर लाना पड़ता है."

संघर्ष विराम की घोषणा के बावजूद कई बुजुर्ग महिलाएं बेसमेंट में थीं. वे अपने अपार्टमेंट्स में जाने से अभी भी डर रही थीं. उन्होंने हमसे अपना नाम न छापने की गुजारिश की.

उन बुजुर्ग महिलाओं में से एक ने पूछा, "क्या वास्तव में युद्ध विराम जैसी स्थिति है? घंटे भर पहले सायरन की आवाज़ सुनाई दी थी. यही युद्ध विराम है?"

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग

इस बातचीत में एक अन्य बुजुर्ग महिला ये कहते हुए शरीक होती हैं, "पहली और दूसरी जंग के समय हम यहां रहे थे. आज कल हम लोग तीसरी लड़ाई के बीच जी रहे हैं."

"मुझे उम्मीद है कि ये आख़िरी लड़ाई होगी. मेरे बच्चे इस जंग में शामिल हैं और मुझे उनकी कुछ भी ख़बर नहीं हैं. मैं उनसे संपर्क नहीं कर सकती."

ये महिलाएं एक टेबल के इर्दगिर्द बैठी थीं. उनके हाथों में कुछ कप और मिठाइयां थीं. दीवार पर लगे पाइप में मोमबत्तियां लगी हई थीं. बिजली की सप्लाई बंद होने की सूरत में इन मोमबत्तियों का सहारा था. जब हम लोग बात कर रहे थे मेरा हेलमेट कई बार नीची छत से जा टकराया. उन महिलाओं के सामने ऐसा होना मुझे असहज कर रहा था.

फिर लगा कि युद्ध की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार आम नागरिकों से ज़्यादा महफूज़ रहते हैं.

बेसमेंट में रह रहे लोगों ने बताया कि कुछ दिनों पहले हवाई हमले में पावर प्लांट बर्बाद हो गया था. उसके अगले दिन एक पेंट शॉप पर बम गिरा और वो इमारत खाक़ हो गई.

एक महिला ने कहा, "हम लड़ाई के मोर्चे पर नहीं हैं लेकिन हम फिर भी देखते हैं कि नागरिक आबादी वाले शहर के आसमान पर ड्रोन, हेलिकॉप्टर, लड़ाकू विमान मंडराते रहते हैं."

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग

'हमारी किस्मत अच्छी नहीं है'

धमाके में एक रिहाइशी इमारत पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है और सड़क पर एक बड़ा गड्ढा बन गया है.

हम इसके बगल से गुजरते हुए सोच रहे हैं कि यहाँ पर क्या गिरा हुआ होगा. एक बुजुर्ग महिला खिड़की से हाथ हिलाते हुए हमें अपने पास आने को कह रही थी.

अर्लेता मिर्ज़ोयान अपनी पूरी ज़िंदगी काराबाख में रही हैं और जब लड़ाई शुरू हुई तो उन्होंने कहीं भी और नहीं जाने का सोचा. हालांकि सभी बच्चों को आर्मीनिया पहुँचा दिया गया लेकिन वो और दूसरे उम्रदराज लोग हमले के दौरान वहीं बेसमेंट में छिपे रहे.

वो कहती हैं कि वो इस जगह को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकती है क्योंकि उनके दो बेटे और दो पोते फ्रंट पर लड़ाई लड़ रहे हैं. वो बताती हैं, "वे सीमा पर अलग-अलग जगहों पर मोर्चा संभाले हुए हैं. मैं उन्हें कैसे छोड़ कर जा सकती हूँ? यह बिल्कुल असंभव है."

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग, अर्लेता मिर्ज़ोयान
इमेज कैप्शन, अर्लेता मिर्ज़ोयान

अर्लेता हमारे लिए चाय बनाती है और ब्लैकबेरी का जैम खिलाती है.

वो हमें बताती हैं कि उनके बच्चों के लिए यह दूसरी लड़ाई है जिसमें वो हिस्सा ले रहे हैं. इससे पहले 2016 में हुई लड़ाई में भी उन्होंने हिस्सा लिया था. उनमें से एक तब 18 साल का था तो एक 20 साल का था. इस बार वो आर्मीनिया से वापस लौट कर अपनी मातृभूमि को बचाने स्वेच्छा से आए हैं.

वो ख़ुद के बारे में बताती हैं कि, "मैं पेशे से मिडवाइफ हूँ. लेकिन अब मैं रिटायर्ड हो चुकी हूँ. मेरा बड़ा बेटा एक सर्जन है और छोटा बेटा वकील. मेरा पोते यूनिवर्सिटी ऑफ़ येरेवन में पढ़ता है. एक वकालत की पढ़ाई कर रहा है तो एक फाइनेंस की. मेरी पोती सेंट्स पीट्सबर्ग में है. मेरा एक पूरा परिवार है. मैं चाहती हूँ कि वो वहाँ शांति से रहे और वे यहाँ आकर नहीं मरे. यह डराने वाला एहसास है."

अज़रबैजान और आर्मीनिया की जंग

अर्लेता को अपने एक पड़ोसी से पता चला कि शांति समझौता दो दिनों तक सिर्फ कायम रहा है. स्टपनेकर्ट के दूसरे लोगों के मुंह से लेकिन बीबीसी के संवाददाता ने सुना कि 72 घंटे तक शांति रही थी

लेकिन रात में नार्गोनो-काराबाख में फिर से गोलीबार हुई और वहाँ रहने वालों को तहखानों में जाकर शरण लेनी पड़ी.

आर्मीनिया ने अज़रबैजान पर युद्ध विराम का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है लेकिन अज़रबैजान ने कहा है कि आर्मीनियाई फ़ौज ने गांजा पर हमला किया था इसलिए उसने शांति समझौते का उल्लंघन किया है.

नार्गोनो-काराबाख क्षेत्र के विदेश मंत्रालय से जब बीबीसी संवाददाता ने पूछा कि क्या नए सिरे से गोलीबारी का मतलब है कि शांति समझौता पूरी तरह से ख़त्म हो चुका है और फिर से दोनों देशों में जंग शुरू हो गई है.

इस पर विदेश मंत्रालय का जवाब था , "यह कहना मुश्किल है लेकिन कम से कम यह जरूर साफ है कि जो हो रहा है वो युद्धविराम को लेकर हुई संधि का पालन तो कतई नहीं है. हम देखेंगे कि इस बारे वो क्या करते हैं. हमारी किस्मत अच्छी नहीं है. यह तो पक्का है."

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