कोरोना वायरसः दक्षिण एशिया में पढ़ाई पर क्या हुआ असर?

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- Author, श्रुति मेनन
- पदनाम, बीबीसी रिएलिटी चेक
यूरोप के ज़्यादातर हिस्से में बच्चों ने दोबारा स्कूल जाना शुरू कर दिया है. लेकिन, दुनिया के दूसरे कई मुल्कों में कोरोना वायरस की पाबंदियों के चलते स्कूलों में अभी पढ़ाई बंद है.
हमने दक्षिण एशिया में स्कूली पढ़ाई को लेकर भारत और इसके पड़ोसी मुल्कों में हालात का जायज़ा लिया है. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मुताबिक, इस पूरे इलाक़े में करीब 60 करोड़ बच्चे लॉकडाउन से प्रभावित हुए हैं.
कौन क्लासरूम नहीं जा रहा है?
जब कोरोना वायरस की पाबंदियां पहली बार मार्च और अप्रैल में लागू की गईं तो उस वक्त दक्षिण एशिया में ज़्यादातर जगहों पर अकादमिक सत्र की शुरुआत ही हुई थी.
तब से ही स्कूलों को बंद कर दिया गया है और बड़े स्तर पर अभी भी स्कूल बंद हैं.

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मौजूदा वक्त में:
- भारत में, बड़े पैमाने पर कक्षाएं बंद ही हैं. ऑनलाइन या टीवी कार्यक्रमों के जरिए ही पढ़ाई चल रही है. हालांकि, सरकार का कहना है कि कक्षा 9 से लेकर 12 तक के बच्चे अपने माता-पिता की मंज़ूरी से 21 सितंबर के बाद स्वैच्छिक आधार पर स्कूल जा सकते हैं.
- बांग्लादेश और नेपाल ने भी स्कूल बंदी को आगे बढ़ा दिया है और यहां पर भी रिमोट लर्निंग का ही सहारा लिया जा रहा है.
- श्रीलंका में अगस्त में स्कूल खोले गए थे, लेकिन मामलों में इज़ाफ़ा होने के साथ ही इन्हें फिर से बंद कर दिया गया.
- पाकिस्तान में चरणबद्ध तरीके से बच्चे स्कूलों में लौटेंगे. कोरोना के मामलों में गिरावट के साथ ही 15 सितंबर से कक्षाएं लगनी शुरू हो जाएंगी.

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क्या सभी के पास इंटरनेट है?
रिमोट लर्निंग में या तो बच्चों के लिए लाइव ऑनलाइन कक्षाएं होती हैं, या फिर डिजिटल कंटेंट मुहैया कराया जाता है. इस कंटेंट को ऑफलाइन या ऑनलाइन कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
लेकिन, दक्षिण एशिया के कई देशों में भरोसेमंद इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है. साथ ही गरीब तबके के लिए इंटरनेट का खर्चा उठा पाना मुमकिन नहीं है.
यूएन का कहना है कि कम से कम 14.7 करोड़ बच्चे ऑनलाइन या रिमोट लर्निंग हासिल नहीं कर पा रहे हैं.
भारत में केवल 24 फीसदी परिवारों के पास इंटरनेट की सुविधा है. 2019 के एक सरकारी सर्वे में इस बात का पता चला है.
भारत के ग्रामीण इलाक़ों में यह आंकड़ा और कम हो जाता है. इन जगहों पर केवल 4 फीसदी परिवारों के पास ही इंटरनेट है.

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बांग्लादेश में भारत के मुकाबले कहीं अच्छी कनेक्टिविटी है. अनुमान है कि बांग्लादेश में 60 फीसदी बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर सकते हैं. हालांकि, यहां ब्रॉडबैंड इंटरनेट की गुणवत्ता अक्सर काफी खराब होती है.
कई स्कूलों में बेसिक इक्विपमेंट्स का भी अभाव है.
नेपाल के हालिया आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि करीब 30 हज़ार सरकारी स्कूलों में से 30 फीसदी से भी कम में कंप्यूटर की सुविधा है. साथ ही केवल 12 फीसदी स्कूल ही ऑनलाइन लर्निंग करा पा रहे हैं.
कुछ देशों ने इंटरनेट वाली डिवाइसेज या ब्रॉडबैंड कनेक्शन न होने के चलते टेलीविजन और रेडियो का सहारा पढ़ाई के लिए लिया है.
इन प्लेटफॉर्म्स की पहुंच आबादी के एक बड़े हिस्से तक है.
भारत का सरकारी टीवी दूरदर्शन रोजाना अपने चैनलों पर शैक्षिक कार्यक्रम दिखाता है.
बांग्लादेश का सरकारी ब्रॉडकास्टर संगसद टेलीविजन भी अपने चैनलों पर रिकॉर्डेड कंटेंट दिखाता है.
यूनिसेफ के साउथ एशिया डायरेक्टर जीन गो ने बताया, "ये सबसे सफल तरीक़ों में से हैं. इनकी पहुंच बच्चों की बड़ी आबादी तक है."
नेपाल ने भी ऐसा ही तरीक़ा अपनाया है, लेकिन यहां आधे से भी कम परिवारों के पास केबल टीवी है.

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स्कूल खोलने में संक्रमण का खतरा
श्रीलंका में स्कूल खोल दिए गए हैं. सीलोन टीचर्स यूनियन के जनरल सेक्रेटरी जोसेफ स्टालिन कहते हैं, "यहां किसी तरह की सामाजिक दूरी का पालन नहीं हो रहा है और केवल कुछ स्कूलों में ही मास्क पहनना अनिवार्य किया गया है."
वे कहते हैं, "बेसिक सेफ्टी उपायों को लागू करना मुश्किल है क्योंकि कोई विशेष फंडिंग जारी नहीं की गई है."
ऑल पाकिस्तान प्राइवेट स्कूल्स फेडरेशन ने सितंबर में स्कूलों को खोले जाने का विरोध किया है. इसका कहना है कि उन्हें टेस्टिंग और कोरोना वायरस सुरक्षा दिशानिर्देशों को लागू करने के लिए सरकारी फंडिंग की ज़रूरत है.
भारत में भी स्कूलों में कक्षाएं शुरू करने को लेकर इसी तरह की चिंताएं बनी हुई हैं.
चाइल्ड राइट्स एंड यू की प्रीति महारा ने बीबीसी को बताया, "स्कूलों के खुलने के साथ ही माता-पिता, परिवहन, शिक्षक और अन्य सेवा प्रदाता भी काम शुरू कर देंगे और इससे लोगों की गतिविधियां बढ़ जाएगी."

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लंबे वक्त से बंद पड़े रहने की वजह से इन प्राइवेट स्कूलों के सामने बड़ी वित्तीय मुश्किल खड़ी हो गई है.
बांग्लादेश में 100 से ज़्यादा निजी स्कूल बिक रहे हैं. ढाका में ऐसे ही एक स्कूल के मालिक तकबीर अहमद ने बताया, "मैंने वेतन और किराया देने के लिए पैसा उधार लिया है."
कई चैरिटी संगठनों ने ऐसे स्कूलों की मदद करने की भी कोशिश की है.
भारत में प्रथम एजूकेशन फाउंडेशन की डॉ. रुक्मिणी बनर्जी कहती हैं, "राज्य सरकारें और स्कूल ऐसे हर बच्चे के साथ कनेक्ट होने की कोशिश कर रहे हैं जिसके परिवार में कम से कम एक मोबाइल फोन है."
कुछ मामलों में बच्चों ने स्कूल से अपना नाम तक कटा लिया है क्योंकि अधिकारी पढ़ाई के लिए उनसे संपर्क करने में नाकाम रहे थे.
यूनिसेफ के जीन गो कहते हैं कि इसके चलते स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट में तेज बढ़ोतरी हो सकती है.
गो कहते हैं, "इबोला और दूसरी आकस्मिक स्थितियों में स्कूलों के बंद होने के पिछले मामलों के हिसाब से देखा जाए तो लर्निंग के लिहाज से यह चीज़ काफी नुक़सानदायक साबित हो सकती है."
(वलीउर रहमान मिराज, मुहम्मद शाहनवाज और सरोज पथिराना ने अतिरिक्त रिसर्च की है)
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