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डॉलर की बादशाहत हो रही कमज़ोर, रूस और चीन ने चली ये रणनीति
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
अमरीकी मुद्रा डॉलर की पहचान एक वैश्विक मुद्रा की है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर और यूरो काफ़ी लोकप्रिय और स्वीकार्य हैं. दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में जो विदेशी मुद्रा भंडार होता है उसमें 64 फ़ीसदी अमरीकी डॉलर होते हैं.
ऐसे में डॉलर ख़ुद ही एक वैश्विक मुद्रा बन जाता है. डॉलर वैश्विक मुद्रा है यह उसकी मज़बूती और अमरीकी अर्थव्यवस्था की ताक़त का प्रतीक है.
इंटरनेशनल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइज़ेशन लिस्ट के अनुसार दुनिया भर में कुल 185 करंसी हैं. हालांकि, इनमें से ज़्यादातर मुद्राओं का इस्तेमाल अपने देश के भीतर ही होता है. कोई भी मुद्रा दुनिया भर में किस हद तक प्रचलित है यह उस देश की अर्थव्यवस्था और ताक़त पर निर्भर करता है.
दुनिया की दूसरी ताक़तवर मुद्रा यूरो है जो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में 19.9 फ़ीसदी है.
ज़ाहिर है डॉलर की मज़बूती और उसकी स्वीकार्यता अमरीकी अर्थव्यवस्था की ताक़त को दर्शाती है. कुल डॉलर के 65 फ़ीसदी डॉलर का इस्तेमाल अमरीका के बाहर होता है.
दुनिया भर के 85 फ़ीसदी व्यापार में डॉलर की संलिप्तता है. दुनिया भर के 39 फ़ीसदी क़र्ज़ डॉलर में दिए जाते हैं. इसलिए विदेशी बैंकों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की ज़रूरत होती है.
डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए रूस और चीन साथ आ रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इससे दोनों देशों के बीच 'वित्तीय गठबंधन' हो सकता है.
डॉलर वैश्विक मुद्रा क्यों?
1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद डॉलर की वर्तमान मज़बूती की शुरुआत हुई थी. उससे पहले ज़्यादातर देश केवल सोने को बेहतर मानक मानते थे. उन देशों की सरकारें वादा करती थीं कि वह उनकी मुद्रा को सोने की मांग के मूल्य के आधार पर तय करेंगे.
न्यू हैम्पशर के ब्रेटन वुड्स में दुनिया के विकसित देश मिले और उन्होंने अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले सभी मुद्राओं की विनिमय दर को तय किया. उस समय अमरीका के पास दुनिया का सबसे अधिक सोने का भंडार था. इस समझौते ने दूसरे देशों को भी सोने की जगह अपनी मुद्रा का डॉलर को समर्थन करने की अनुमति दी.
1970 की शुरुआत में कई देशों ने डॉलर के बदले सोने की मांग शुरू कर दी थी, क्योंकि उन्हें मुद्रा स्फीति से लड़ने की ज़रूरत थी. उस समय राष्ट्रपति निक्सन ने फ़ोर्ट नॉक्स को अपने सभी भंडारों को समाप्त करने की अनुमति देने के बजाय डॉलर को सोने से अलग कर दिया.
तब तक डॉलर दुनिया की सबसे ख़ास सुरक्षित मुद्रा बन चुका था.
चीन और रूस की रणनीति
एशिया निक्केई रिव्यू की रिपोर्ट के अनुसार रूस के केंद्रीय बैंक और फ़ेडरल कस्टम सेवा के ज़रिए जारी किए गए हाल के आँकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2020 की पहली तिमाही में रूस और चीन के बीच व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी पहली बार 50 फ़ीसद के नीचे हो गई.
रूस और चीन के बीच सिर्फ़ 46 फ़ीसद व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल किया गया. इसी दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार में यूरो की हिस्सेदारी बढ़कर अब तक की सबसे ज़्यादा 30 फ़ीसद हो गई, जबकि दोनों देशों की अपनी मुद्रा में 24 फ़ीसद व्यापार हुआ, वो भी अब तक की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है.
पिछले कई सालों से रूस और चीन ने द्विपक्षीय व्यापार में डॉलर के इस्तेमाल को ज़बर्दस्त तरीक़े से कम कर दिया है. साल 2015 तक दोनों देशों के बीच 90 फ़ीसद व्यापार डॉलर में होता था. लेकिन अमरीका और चीन के बीच शुरू हुए ट्रेड वॉर के बाद और ख़ासकर डॉलर में व्यापार को कम करने की रूस और चीन की सोची समझी नीति के तहत साल 2019 आते-आते दोनों देशों के बीच सिर्फ़ 51 फ़ीसद व्यापार डॉलर में रह गया.
रशियन एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ में इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ार ईस्टर्न स्टडीज़ के निदेशक अलेक्से मसलोव ने निक्की एशियन रिव्यू को बताया कि रूस और चीन की डॉलर में व्यापार को धीरे-धीरे ख़त्म करने की योजना ऐसी स्थिति में पहुंचने वाली है कि अब ये दोनों देशों के बीच संबंध को वास्तव में एक गठबंधन में बदल देगा.
अलेक्से मसलोव के अनुसार वित्तीय क्षेत्र में रूस और चीन के बीच सहयोग बताता है कि दोनों देश एक दूसरे के साथ एक नए गठजोड़ के लिए आख़िरकार एक मापदण्ड तय कर रहे हैं.
उनका कहना था, ''कई लोगों को उम्मीद थी कि ये सैन्य गठबंधन या व्यापारिक गठबंधन होगा, लेकिन अब ये बैकिंग और वित्तीय गठबंधन की दिशा में जा रहा है और ये दोनों देशों के लिए अपने फ़ैसले लेने में स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करेगा.''
रूस और चीन के लिए साल 2014 से ही डॉलर के इस्तेमाल को कम करने की प्राथमिकता रही है. क्राइमिया पर रूस के क़ब्ज़े के बाद पश्चिमी देशों से उसके संबंध ख़राब हो गए और तभी से रूस और चीन ने आर्थिक सहयोग को बढ़ाना शुरू किया. रूस पर अमरीका के प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए व्यापार में डॉलर के इस्तेमाल को ख़त्म करना ज़रूरी हो गया था.
रूस के लिए आईएनजी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री डिमित्री डोलगिन ने कहा, "दुनिया में कहीं भी ऑनलाइन पैसे की लेन-देन होती है जिसमें डॉलर का इस्तेमाल होता है तो किसी न किसी रूप में एक अमरीकी बैंक ही उसे मंज़ूरी देता है. इसका मतलब ये हुआ कि अमरीकी सरकार कुछ लेन-देन को रोकने के लिए बैंक को आदेश दे सकती है."
अमरीकी डॉलर सूचकांक, जो कि दुनिया की छह मज़बूत मुद्राओं की तुलना में उसकी क़ीमत का आकलन करता है, में मार्च के हिसाब से नौ फ़ीसद की गिरावट दर्ज की गई है और ये साल 2011 के बाद से सबसे बुरी स्थिति में पहुंचने की कगार पर है.
डॉलर पर दबाव इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि ऐसी आशंका जताई जा रही है कि दूसरी अर्थव्यवस्थों की तुलना में कोरोना महामारी का असर अमरीकी अर्थव्यवस्था पर ज़्यादा होगा.
वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की केंद्रीय भूमिका के कारण डॉलर में लगातार लेन-देन बाज़ार में उछाल ला सकता है, इस उम्मीद पर कि दुनिया के केंद्रीय बैंक और सरकारें लगातार आर्थिक राहत पैकेज लेकर आते रहेंगे. लेकिन अगर डॉलर में और गिरावट आती है तो ये यूरोप और जापान के लिए बुरी ख़बर होगी.
पिछले दो साल में डॉलर की क़ीमत में उछाल देखी जा रही थी लेकिन इसी समय पिछले साल की तुलना में अब डॉलर की क़ीमत में तीन फ़ीसद की कमी आई है. साल 2017 में डॉलर में 10 फ़ीसद की गिरावट हुई थी. डॉलर की क़ीमत में कमी से अमरीकी निर्यात को फ़ायदा होता है. इससे अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी को अपने मुनाफ़े को अपनी घरेलू मुद्रा डॉलर में बदलकर लाने में मदद मिलेगी. ये अमरीकी शेयर बाज़ार में उछाल लाने के लिए एक अच्छी ख़बर होगी जहां हाल के कुछ हफ़्तों मेंर गिरावट देखी जा रही थी.
अमरीका की इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और वित्तीय सेवा की बहुराष्ट्रीय कंपनी गोल्डमैन सैच ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ऐतिहासिक तौर पर एस एंड पी 500 सूचकांक (अमरीकी शेयर बाज़ार सूचकांक जो कि अमरीकी शेयर मार्केट में लिस्ट की गईं 500 कंपनियों की स्थिति को बताता है) ने 2.6 फ़ीसद का रिटर्न दिया है जब डॉलर की क़ीमत तेज़ी से निचे गिरती है और टेक्नोलोजी और उर्जा क्षेत्र की कंपनियां बहुत बढ़िया प्रदर्शन करती हैं.
गोल्डमैन के अनुसार डॉलर में 10 फ़ीसद की गिरावट से साल 2020 में आमदनी में प्रत्येक शेयर तीन फ़ीसद की बढ़ोत्तरी होगी. गोल्डमैन के विश्लेषकों को आशंका है कि अगले 12 महीनों में डॉलर की क़ीमत में अभी पाँच फ़ीसद की और गिरावट होगी.
लेकिन कमज़ोर होते डॉलर से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को शायद ही कोई राजनीतिक लाभ हो, जो कि नवंबर में होने चुनाव में दोबारा जीतने की कोशिश कर रहे हैं. ट्रंप ने हमेशा शिकायत की है कि डॉलर की क़ीमत ज़्यादा होने से अमरीकी उत्पादकों और निर्माताओं को नुक़सान होता है.
ड्यूच बैंक के मुख्य अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकार एलन रस्किन का कहना है, "डॉलर की क़ीमत में कमी का लाभ औद्योगिक क्षेत्र तक पहुँचने में कम से कम एक साल लगेगा और इससे नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को कोई फ़ायदा नहीं हो सकेगा."
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