अमरीका: डोनाल्ड ट्रंप अपने ही घर में इस गंभीर चुनौती से कैसे घिर गए

डोनाल्ड ट्रंप

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अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर पहले से ही आलोचनाओं का सामना कर रहे हैं, अब इन प्रदर्शनों को क़ाबू करने के लिए फ़ेडरल पुलिस को भेजने के उनके फ़ैसले पर भी सवाल उठ रहे हैं.

कोरोना के अलावा एक काले युवक जॉर्ज फ़्लायड की मौत ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है. अमरीका के कई हिस्सों में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं. इन प्रदर्शनों को कोरोना काल में भी वे नहीं रोक पाए हैं.

अमरीका के कई शहरों में प्रदर्शनकारी लंबे समय से विरोध कर रहे हैं और उन्होंने कई चौक-चौराहों पर क़ब्ज़ा कर रखा है.

अब डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि वो फ़ेडरल पुलिस को इन शहरों में भेज सकते हैं. इनमें से कई प्रांतों में डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में है.

ट्रंप ने शिकागो और न्यूयॉर्क का ख़ास तौर से ज़िक्र किया और आरोप लगाया कि इन शहरों में उदारवादी डेमोक्रेट्स कार्रवाई करने से डरते हैं.

उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे ओरेगॉन में फ़ेडरल पुलिस अधिकारियों ने स्थिति को नियंत्रण में कर लिया. पोर्टलैंड में कई दिनों से प्रदर्शन चल रहे हैं.

हालांकि स्थानीय अधिकारी ये कहते हैं कि इन पुलिस अधिकारियों के कारण स्थिति और बिगड़ रही है.

'राजनीतिक स्टंट'

फ़ेडेरल फ़ोर्स

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कई प्रांतीय नेताओं ने मांग की है कि फ़ेडरल पुलिस को यहाँ से हटाया जाए, क्योंकि स्थिति और बिगड़ रही है और चुनावी साल में ये एक राजनीतिक स्टंट है.

सोमवार को व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने क़ानून और व्यवस्था बहाल करने की बात दोहराई.

उन्होंने कहा कि इन शहरों में स्थिति बिगड़ने नहीं दी जा सकती है.

ट्रंप ने न्यूयॉर्क सिटी, शिकागो, फ़िलाडेल्फिया, डेट्रॉइट, बाल्टीमोर और ओकलैंड का नाम ख़ास तौर से लिया.

उन्होंने कहा, "हम अपने देश में ऐसा नहीं होने दे सकते हैं. इन सभी जगहों पर लिबरल डेमोक्रेट्स का शासन है."

मई में जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद पोर्टलैंड में लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. दो सप्ताह पहले इस शहर में फ़ेडरल पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे. ट्रंप ने इस फ़ैसले की सराहना की.

लेकिन हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ा है और यहाँ से उन्हें हटाने की मांग भी तेज़ हुई है.

प्रदर्शनकारी

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दूसरी ओर ट्रंप का कहना है कि ओरेगॉन के गवर्नर और पोर्टलैंड के मेयर और अन्य इन अराजकतावादियों से डर गए हैं. ट्रंप ने कहा कि इसी कारण वे सहायता नहीं करना चाहते.

ट्रंप ने फ़ेडरल पुलिस अधिकारियों की सराहना की और कहा कि उन्होंने कम समय में बेहतरीन काम किया है.

पिछले महीने राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया था. इस आदेश के अंतर्गत फ़ेडरल अधिकारियों को बिना प्रांतों की अनुमति के तैनात किया जा सकता है.

शिकागो ट्रिब्यून के मुताबिक़ शिकागो में भी फ़ेडरल पुलिसकर्मियों को तैनात करने की योजना है.

राष्ट्रपति ट्रंप शिकागो के नेताओं पर कई बार आरोप लगा चुके हैं कि वे इलिनॉय सिटी में हिंसा नहीं रोक पा रहे हैं. पुलिस के मुताबिक़ पिछले सप्ताह ही वहाँ 64 लोगों को गोलियाँ लगी, जिनमें 11 की मौत हो गई.

शिकागो की मेयर लोरी लाइटफ़ुट ने पहले कहा था कि वे फ़ेडरल अधिकारियों की तैनाती को लेकर चिंतित हैं. पोर्टलैंड के मेयर टेड ह्वीलर ने भी सीएनएन को दिए इंटरव्यू में कहा था कि इन फ़ेडरल पुलिसकर्मियों के कारण हिंसा और लूटपाट और बढ़ रही है.

पोर्टलैंड में हो क्या रहा है

फ़ेडेरल फ़ोर्स

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मई में जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद से यहाँ लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग पुलिस सुधार और समानता है. शुरू में ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे.

लेकिन हाल के दिनों में प्रदर्शन हिंसक हुए हैं. लूटपाट की घटनाएं बढ़ी हैं और आगजनी भी हुई है. संपत्ति को नुक़सान पहुँचा है और पुलिस पर बर्बरतापूर्ण कार्रवाई के आरोप भी लगे हैं. कई गिरफ़्तारियाँ भी हुई हैं.

पिछले सप्ताह फ़ेडरल अधिकारियों ने स्थानीय सरकार की इच्छा के उलट प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई शुरू की थी. इसकी काफ़ी आलोचना हुई और कई लोगों ने अदालत में इसे चुनौती भी दी है.

वरिष्ठ डेमोक्रेट नेता नैंसी पेलोसी ने पुलिस कार्रवाई की आलोचना की है. दूसरी ओर ट्रंप यहाँ क़ानून व्यवस्था लागू करने की बात कह रहे हैं.

अब सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि क्या ट्रंप इन राज्यों में फ़ेडरल फ़ोर्स की तैनाती कर सकते हैं. ट्रंप का कहना है कि अगर राज्य क़ानून व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहते हैं, तो उन्हें मिलिटरी भेजने का पूरा अधिकार है.

क़ानूनी रूप से देखें, तो हाँ राष्ट्रपति ट्रंप को ये अधिकार है. लेकिन कुछ ख़ास परिस्थितियों में.

अमरीका के इंसरेक्शन एक्ट के मुताबिक़ राष्ट्रपति बिना प्रांतीय गवर्नरों की अनुमति के ऐसा कर सकते हैं, जब वहाँ अमरीका का क़ानून लागू करना असंभव हो जाए या फिर नागरिकों के अधिकारों पर ख़तरा पैदा हो जाए.

लेकिन सवाल यही है कि क्या जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद अमरीका में ऐसी स्थिति है कि इस एक्ट को लागू किया जाए. ट्रंप के अपने रक्षा मंत्री मार्क एस्पर भी कह चुके हैं कि इस क़ानून को आख़िरी हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए.

वैसे अमरीका में ये एक्ट कई बार इस्तेमाल हो चुका है. हालांकि क़रीब तीन दशकों में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ है. 1992 में जॉर्ज बुश सीनियर ने लॉस एंजलिस में हुए दंगों के दौरान इसका इस्तेमाल किया था, लेकिन उस समय कैलिफ़ोर्निया के गवर्नर ने मदद मांगी थी.

ये क़ानून 1950 और 60 के दशक में भी इस्तेमाल हुआ था और गवर्नरों की आपत्ति के बावजूद ऐसा हुआ था. हालांकि 60 के दशक के बाद इसका इस्तेमाल कम ही हुआ है.

जॉर्ज फ़्लायड की मौत

जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद से शुरू हुए हैं प्रदर्शन

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मिनियापोलिस में 25 मई की शाम को पुलिस को एक कॉल आई कि एक ग्रोसरी स्टोर पर जॉर्ज फ़्लायड ने 20 डॉलर का नक़ली नोट दिया था.

अधिकारी उन्हें पुलिस की गाड़ी में बैठाने की कोशिश कर रहे थे, जब फ़्लायड ज़मीन पर गिर गए. उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे क्लॉस्ट्रोफ़ोबिक हैं.

पुलिस के मुताबिक़ फ़्लायड ने अधिकारियों को रोकने की कोशिश की, इसलिए उन्हें हथकड़ी पहना दी गई. वीडियो में ये नहीं दिखता है कि कैसे पुलिस के साथ उनकी झड़प शुरू हुई.

पुलिस अधिकारी डेरेक चौविन का घुटना उनके गर्दन पर था और फ़्लायड को ये कहते सुना गया कि प्लीज़ मैं सांस नहीं ले सकता, मुझे मत मारिए.

ऑटॉप्सी की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक़ पुलिस अधिकारी ने फ़्लायड की गर्दन पर आठ मिनट और 46 सेकेंड तक अपना घुटना रखा था. जिनमें से तीन मिनट ऐसे थे, जब फ़्लायड बिल्कुल निष्क्रिय हो गए थे.

चौविन के अपने घुटना हटाने के दो मिनट पहले अन्य अधिकारियों ने फ़्लायड का पल्स देखने के लिए उनकी दाहिनी कलाई को चेक किया, लेकिन उन्हें पल्स नहीं मिला. फ़्लायड को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ एक घंटे बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

फ़्लायड के परिवार के एक वकील ने चौविन पर सोच-समझ कर हत्या का आरोप लगाया है.

लोगों की नाराज़गी एक वीडियो क्लिप के वायरल होने के बाद सामने आई है जिसमें एक गोरा पुलिस अधिकारी जॉर्ज फ़्लॉयड नाम के एक निहत्थे काले व्यक्ति की गर्दन पर घुटना टेककर उसे दबाता दिखता है. इसके कुछ ही मिनटों बाद 46 साल के जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत हो गई.

वीडियो में देखा जा सकता है कि जॉर्ज और उनके आसपास खड़े लोग पुलिस अधिकारी से उन्हें छोड़ने की मिन्नतें कर रहे हैं. पुलिस अधिकारी के घुटने के नीचे दबे जॉर्ज बार-बार कह रहे हैं कि "प्लीज़, आई कान्ट ब्रीद (मैं सांस नहीं ले पा रहा)". यही उनके आख़िरी शब्द बन गए. अमरीका के कई शहरों में प्रदर्शनकारी आई कॉन्ट ब्रीद का बैनर लिए प्रदर्शन कर रहे हैं.

ट्रंप के फ़ैसले पर सवाल

डोनाल्ड ट्रंप और जेम्स मैटिस

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पिछले दिनों अमरीका के पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर आरोप लगाया था कि वे देश में विभाजन की आग भड़का रहे हैं और अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि ट्रंप ने जिस तरह हालिया घटनाओं को हैंडल किया है, उससे वे नाराज़ हैं और आश्चर्यचकित भी हैं.

इसके जवाब में डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें 'ओवररेटेड जनरल' की संज्ञा दी थी और कहा था कि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि मैटिस ने अपना पद छोड़ दिया था.

द अटलांटिक में जेम्स मैटिस ने लिखा था, ''मेरे जीवनकाल में डोनाल्ड ट्रंप ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अमरीकी लोगों को एकजुट करने की कोशिश नहीं की है. वे ऐसी कोशिश करते दिखे भी नहीं है. दरअसल उन्होंने हमें विभाजित करने की कोशिश की है.''

उन्होंने आगे लिखा, ''हम तीन साल से उनकी तरफ़ से जान-बूझकर की जा रही कोशिशों का नतीजा देख रहे हैं. हम परिपक्व नेतृत्व के बिना तीन साल का नतीजा देख रहे हैं.''

मैटिस ने अमरीका में नस्लवाद के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर भी अपनी चुप्पी तोड़ी थी.

25 मई को जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत उस समय हो गई थी, जब एक पुलिस अधिकारी डेरेक चोविन ने कई मिनटों तक अपने घुटने से उनकी गर्दन को दबाए रखा था.

इस मामले में चार पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है. जबकि मुख्य अभियुक्त डेरेक चोविन के ख़िलाफ़ आरोप को बढ़ाकर सेकेंड डिग्री मर्डर में तब्दील कर दिया गया है.

इस मामले पर जेम्स मैटिस ने लिखा था, ''जो लोग क़ानून तोड़ रहे हैं, वे काफ़ी कम संख्या में हैं. हमें इससे भटकना नहीं चाहिए. प्रदर्शन में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर सड़कों पर उतरे हैं. जो ये कह रहे हैं हमें एक देश के रूप में अपने मूल्यों पर क़ायम रहना चाहिए.''

जेम्स मैटिस ने दिसंबर 2018 में इस्तीफ़ा दे दिया था. उन्होंने अपने इस्तीफ़े में ट्रंप की विदेश नीति की कड़ी आलोचना की थी.

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