चीन-ईरान की ‘लायन-ड्रैगन डील’ से क्यों नाख़ुश हैं ईरान के लोग?

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, टीम बीबीसी
चीन और ईरान के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके बारे में विस्तार से अभी तक कोई ऐलान नहीं किया गया है. बताया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच ये समझौता अगले 25 वर्षों तक मान्य होगा.
विशेषज्ञ और आम लोग इस सौदे के बारे में तरह-तरह की अटकलें लगा रहे हैं और अपनी राय ज़ाहिर कर रहे हैं.
हालांकि ईरान की आम जनता इसे लेकर निराशावादी नज़र आ रही है.
इसे ‘लायन-ड्रैगन डील’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ईरान के कट्टरपंथी अख़बार ‘जवान’ ने इस समझौते की ख़बर प्रकाशित करते हुए यही शीर्षक लगाया था.
समझौता है क्या?
इस समझौते का सबसे पहले 23 जनवरी, 2016 को एक साझा बयान के ज़रिए उस वक़्त ऐलान किया गया था जब चीनी राष्ट्रपति शी ज़िनपिंग ईरान के दौरे पर गए थे.
ईरान की तसनीम समाचार एजेंसी के अनुसार, इस डील का अनुच्छेद-6 कहता है कि दोनों देश ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग और तकनीक के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे.
समाचार एजेंसी के अनुसार, “दोनों पक्ष अगले 25 वर्षों के लिए आपसी सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं.”
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़मेनेई ने चीनी राष्ट्रपति ज़िनपिंग से एक मुलाकात के दौरान ‘कुछ देशों की’, ख़ासकर अमरीका की वर्चस्वाद वाली नीति की ओर इशारा किया था.

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उन्होंने कहा था, “इस स्थिति को देखते हुए स्वतंत्र देशों को एक-दूसरे का ज़्यादा सहयोग करना चाहिए. ईरान और चीन के बीच अगले 25 वर्षों तक के लिए हुए इस रणनीतिक समझौते का दोनों पक्ष गंभीरता से पालन करेंगे.”
ख़मेनेई के अलावा ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने भी कई मौकों अमरीकी पाबंदियों के ख़िलाफ़ चीन के समर्थन और सहयोगी की तारीफ़ की है.
21 जून रूहानी ने एक कैबिनेट बैठक में कहा था कि ये समझौता, चीन और ईरान दोनों के लिए मूलभूत और इंस्फ़्राट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट्स में भागीदारी का मौका है. रूहानी ने कहा था कि उन्होंने चीनी पक्ष से बातचीत करने और बातचीत को अंतिम रूपरेखा देने की ज़िम्मेदारी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ को सौंपी है.
ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग
ईरानी अर्थशास्त्री अली असग़र ज़रगर ने ईरान की आईएलएनए समाचार एजेंसी को दिए एक अर्ध-आधिकारिक इंटरव्यू में कहा था कि ईरान, चीन और रूस के बीच तेल से जुड़ा कोई भी समझौता होने पर ऊर्जा, सुरक्षा और आर्थिक मामलों में मददगार साबित होगा.
ज़रगर ने कहा, “चीन अपनी नीति के तहत उन देशों को चुनता है जो किसी अन्य देश के प्रभाव में न हों. इसलिए, ईरान से चीन को स्वतंत्र रूप से मदद मिल सकती है. वहीं, दूसरी ओर चीन ने भी हमारी कुछ परियोजनाओं में हिस्सा लिया और इसमें उपनिवेशवादी लालच नहीं है. इसलिए, इस डील से दोनों देशों को फ़ायदा हो सकता है. चीन को इराक़ में ईरान की मौजूदगी से भी फ़ायदा मिल सकता है. ”
ज़रगर के मुताबिक़, चीन को जहां ऊर्जा संसाधनों की ज़रूरत है, वहीं ईरान को तकनीक और निवेश की ज़रूरत है, इसलिए ये समझौता दोनों देशों के हित में होगा.
चीन और ईरान बनाम अमरीका
ईरानी अख़बार 'जवान' ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा है कि ये ईरान और चीन के बीच डील का सबसे अच्छा समय है क्योंकि मौजूदा वक़्त में अमरीका चीन के सामने ‘कमज़ोर’ महसूस करता है और चीन, अमरीका से ‘असुरक्षित’ महसूस करता है.
अख़बार लिखता है कि चीन की ‘अमरीका-विरोधी’ नीतियां भी समझौते के लिए फ़ायदेमंद हैं.
अख़बार ने ईरानी संसद मजलिस के स्पीकर मोहम्मद क़लीबफ़ के उस बयान का ज़िक्र किया है, जिसमें उन्होंने कहा था, “हमने देखा है कि कैसे ट्रंप प्रशासन दूसरे देशों की स्वतंत्रता और शासन में दखल देता है. अमरीका ने ईरान और चीन के साथ भी ऐसा ही किया है. हम इसके गवाह रहे हैं. इसलिए चीन के साथ क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य है. हम इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.”
ईरानी सरकार के प्रवक्ता अली रबीई ने 23 जून को कहा था कि इस समझौते के खाके को अंतिम रूप दिया जा चुका है.

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उन्होंने कहा था, “यह समझौता साबित करता है कि अमरीका की ईरान को अलग-थलग करने और इसके अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न करने की नीति विफल रही है.”
ईरान की नीति बदल रही है?
वरिष्ठ ईरानी पत्रकार अहमद ज़ीदाबादी का मानना है कि ‘ईस्ट पॉलिसी’ की तरफ़ नहीं मुड़ रहा है बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा बन रहा है.
अहमद लिखते हैं, “चीन दुनिया के साथ दुश्मनी के बजाय स्थिरता पर ज़ोर देता है. यह ईरान, सऊदी अरब और इसराइल से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखना चाहता है.”
साथ ही अहमद को ये भी लगता है इस समझौते की वजह से ईरान की अपनी नीतियां बदल जाएंगी और वो चीन की नीतियों पर चलने को मजबूर हो जाएगा.
अहमद पूछते हैं कि क्या ईरानी अधिकारियों के चीन के साथ यह समझौता अमरीका और यूरोप को धमकाने के लिए किया ताकि वो उस पर बाद-बाद पाबंदी लगा देने वाली अपनी नीतियों में नर्मी लाएं?
अहमद ये अनुमान भी लगाते हैं कि ईरानी सरकार ने यह समझौता शायद इसलिए किया होगा क्योंकि उसे अपनी नीतियों में बदलाव करने के अलावा कोई और विकल्प नज़र नहीं आ रहा होगा.

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ये डील इतनी ‘गोपनीय’ क्यों है?
इस समझौते के बारे में विस्तार से जानकारी न दिए जाने की वजह से ईरानी सरकार की आलोचना भी हो रही है. ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने 27 जून को एक रैली में कहा था, “जनता की इच्छा और मांगें जाने बाने किसी विदेशी पक्ष के साथ कोई भी समझौता करना देशहित के ख़िलाफ़ और अमान्य है.”
उन्होंने डील की ‘अस्पष्टता’ और के ईरानी सरकार के ‘टतथ्यों को गोपनीय रखे जाने’ वाले रवैये की आलोचना की. अहमदीनेजाद ने सरकारी अधिकारियों से अपील की कि वो देश को इस समझौते के बारे में पूरी जानकारी दें.
अहमदीनेजाद के आरोपों के जवाब में ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अब्बास मौस्वी ने कहा कि चीन की मंज़ूरी के बाद मंत्रालय इस समझौते का पूरा ब्योरा प्रकाशित कर सकता है. उन्होंने इन आरोपों से इनकार कर दिया कि डील के प्रावधानों में किसी भी तरह की ‘अस्पष्टता है.
अर्थशास्त्री मोहसिन शरीयातिना कहते हैं कि समझौते से ये साबित होता कि ईरान अब पूरब की तरफ़ नर्मी वाली रणनीति अपना रहा है. उनका मानना है कि इस डील का रोडमैप रणनीतिक सहयोग है जो ‘अलायंस’ से अलग है. मोहसिन का मानना है कि चीन और ईरान के विचार, नीतियां और संविधान असल में काफ़ी अलग हैं.
ईरान के लोग क्या कह रहे हैं?
ईरान की जनता इस डील की ख़बरों से ख़ुश नज़र नहीं आ रही है. सोशल मीडिया पर लोग इस समझौते के ‘चीनी उपनिवेशवाद’ की शुरुआत बता रहे हैं.
सोशल मीडिया यूज़र्स ने पिछले 24 घंटों में #iranNot4SELLnot4RENT (ईरान बिकने के लिए और किराए के लिए नहीं है) हैशटैग के साथ 17 हज़ार से ज़्यादा बार ट्वीट किया है.
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