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कोरोना लॉकडाउन: चीन आर्थिक चुनौतियों से उबर पाएगा?
- Author, करिश्मा वासवानी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
भले ही अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चीन के आर्थिक आंकड़ों पर हमेशा भरोसा नहीं किया जा सकता है लेकिन अब उनके सामने एक नई मुश्किल आ गई है. अब उन्हें कोई भी आंकड़ा नहीं मिल रहा है.
शुक्रवार को चीन ने कहा कि वह इस साल आर्थिक वृद्धि के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं कर रहा है.
चीन का यह फ़ैसला अभूतपूर्व है. 1990 में ये लक्ष्य छापना शुरू करने के बाद से ऐसा पहली बार हो रहा है जबकि चीन की सरकार ने इकनॉमिक ग्रोथ का टारगेट तय नहीं किया है.
आर्थिक वृद्धि के लक्ष्य तय न करना एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि कोरोना वायरस महामारी के बाद के दौर में चीन के लिए आर्थिक रिकवरी कितनी मुश्किल होगी.
और हालांकि, हालिया आंकड़े बता रहे हैं कि चीन सुस्ती के दौर से बाहर निकलने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह एक असमान रिकवरी है.
एक अच्छी ख़बर से शुरुआत
महामारी के चीन में दस्तक देने के बाद से पहली बार फ़ैक्ट्रियों में कामकाज शुरू हो गया है.
अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन की दर उम्मीद से बेहतर 3.9 फीसदी रही है. इस साल की शुरुआत में चीन में सख़्त लॉकडाउन लागू किया गया था. उस वक्त साल के शुरुआती दो महीनों में औद्योगिक उत्पादन में 13.5 फ़ीसदी की गिरावट आई थी.
इसके साथ ही कई ऐसे आंकड़े भी आए हैं जो कि आश्चर्यजनक रूप से मजबूत हैं. इनसे आंकड़ों से जिस तरह की रिकवरी का संकेत मिल रहा है उसे अर्थशास्त्रियों की भाषा में वी-शेप वाली रिकवरी कहा जाता है.
एक तेज और बड़ी शुरुआती गिरावट के बाद आर्थिक गतिविधियों में तेज़ रफ़्तार बहाली को वी शेप वाली रिकवरी कहा जाता है.
इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन के मुताबिक़, "चीन में बिजली पैदा करने वाली छह बड़ी कंपनियों का उत्पादन मई की गोल्डन वीक की छुट्टियों के बाद एक बार फिर से बहाल हो गया है. फिलहाल यह अपने ऐतिहासिक औसत से 1.5 फीसदी ऊपर बना हुआ है. इस आंकड़े से पता चल रहा है कि देश में बिजली की मांग बहाल होकर सामान्य स्थिति में आ गई है."
लॉकडाउन के बाद चीन के आसमान प्रदूषण मुक्त हो गए थे. अब देश में आर्थिक गतिविधियों के रफ्तार पकड़ने के बाद साफ आसमान फिर से गायब हो गए हैं.
चीन में वायु प्रदूषण के हालिया स्तर पिछले साल के इसी वक्त के मुकाबले ऊपर चले गए हैं. कोरोना वायरस शुरू होने के बाद पहली बार औद्योगिक उत्सर्जन में उछाल दर्ज किया जा रहा है.
इस सबसे पता चल रहा है कि चीन में कारोबारी माहौल धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौटने लगा है.
लेकिन, सब कुछ सामान्य नहीं हुआ है और इससे पता चल रहा है कि बाकियों के लिए अपने कामकाज को पटरी पर लाना आसान नहीं है.
रीटेल सेल्स के हालिया आंकड़े दिखा रहे हैं कि लोगों को दुकानों में लाना और उनका खरीदारी करना कितना मुश्किलभरा होने वाला है.
अप्रैल में बिक्री 7.5 फीसदी कम थी, जो कि मार्च के मुकाबले बेहतर थी. इसके बावजूद सेल्स अभी भी वैसी नहीं है जैसी अर्थव्यवस्था के पूरी ताकत से चलने के दौरान होती है.
चीन में कई लोग अभी भी संक्रमण की दूसरी लहर को लेकर चिंतित हैं और वे पहले की तरह से पैसे खर्च नहीं कर रहे हैं.
ऐसे में इस बात को लेकर कोई अचरज नहीं होना चाहिए कि चीन ने क्यों इस साल के लिए ग्रोथ का टारगेट नहीं दिया है. सरकार को अच्छी तरह से पता है कि इस संकट की गहराई का अंदाजा लगाना कितना मुश्किल है.
बढ़ती बेरोज़गारी
इन मुश्किलभरे हालात में बेरोज़गारी के आंकड़े और ज्यादा मुसीबत पैदा करने वाले साबित हो रहे हैं. मार्च के मुकाबले अप्रैल में बेरोज़गारी की दर मामूली बढ़कर 6 फीसदी पर पहुंच गई है जो कि बेरोज़गारी के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के नज़दीक है.
लेकिन, ज्यादातर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वास्तविक आंकड़े और ज्यादा बुरे हैं.
थिंक टैंक कैपिटल इकनॉमिक्स का कहना है कि करीब 20 फ़ीसदी प्रवासी मजदूर शहरों को वापस नहीं लौटे हैं, ऐसे में बेरोज़गारी का असली आंकड़ा इसका करीब दोगुना तक हो सकता है.
भले ही कट्टर रुख रखने वाला चीन का कम्युनिस्ट मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स अमूमन चीन की अर्थव्यवस्था की तारीफों के पुल बांधते थकता नहीं है, लेकिन, इसने भी बेरोज़गारी की गंभीर हालत की ओर इशारा किया है.
इसने कहा है कि इस साल निजी सेक्टर में काम करने वाले चीनी कर्मचारियों के लिए 2019 जैसी सैलरी कमा पाना तकरीबन नामुमकिन होगा.
सुधार होने से पहले चीजें ख़राब होंगी
पेकिंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जस्टिन यूफू लिन मार्च में सिंघुआ यूनिवर्सिटी के एक सर्वे का हवाला देते हुए कहते हैं कि निजी उद्योगों में से करीब 85 फीसदी को अगले तीन महीने खुद को टिकाए रखने का संघर्ष करना होगा.
वह कहते हैं, "उद्यमों के दिवालिया होने से बेरोजगारी में इज़ाफ़ा होगा."
चीन में काफी लोग सरकारी कंपनियों में काम करते हैं. ऐसे में चीन का आर्थिक तंत्र अमरीका के मुकाबले बेरोजगारों को संभालने के लिए ज्यादा अच्छी स्थिति में है.
चीन के लोगों की बचत ज्यादा है. इनके पास ज्यादा बेहतर पारिवारिक सपोर्ट है और कई प्रवासी मजदूरों के पास अपने मूल कस्बों में जमीनें हैं जहां वे अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरा करने लायक पैसा कमा सकते हैं.
सेंटर फॉर चाइना एंड ग्लोबलाइजेशन के वैंग हुइयाओ कहते हैं, "हां, कुछ मुश्किलें जरूर होंगी, लेकिन चीन के बाहर रहने वालों को शायद यह नहीं पता है कि हम मुश्किलों और तकलीफों को किस तरह से देखते हैं. चीन के लोग ऐसे हालात तब भी देख चुके हैं जब यह मुल्क बेहद गरीब था. यह ज्यादा पहले की बात नहीं है."
यह दौर अलग है
कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा से कहती रही है कि ग्रोथ टारगेट को हासिल करना यह दिखाता है कि चीन कितना बढ़िया काम कर रहा है.
लेकिन, निश्चित तौर पर यह वक्त अलग है. कोई टारगेट नहीं है. ऐसे में यह साफ है कि चीन हालिया सालों में सबसे मुश्किल आर्थिक माहौल से गुजर रहा है.
चीन पहले भी अलग-अलग आर्थिक मुश्किलों का सामना कर चुका है. मिसाल के तौर पर, नब्बे के दशक में चीन में बड़े पैमाने पर छंटनियां हुई थीं.
उस वक्त अर्थव्यवस्था सरकारी कंपनियों के दबदबे पर टिकी हुई थी. कामकाजी आबादी का बड़ा हिस्सा इन्हीं कंपनियों में लगा हुआ था.
जब अर्थव्यवस्था में सुस्ती आई तो इन कंपनियों ने लाखों कर्मचारियों को निकाल दिया. देश में बेरोजगारी की दर में तेज उछाल आया. नेशनल ब्यूरो ऑफ इकनॉमिक रिसर्च के मुताबिक, उस वक्त बेरोजगारी की दर हर साल करीब 1 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही थी.
1995 में कामकाजी आबादी का करीब 60 फीसदी हिस्सा सरकारी कंपनियों में काम कर रहा था. यह तादाद 2002 में घटकर 30 फीसदी पर आ गई.
लेकिन, चीन ने रिकवरी की और निजी सेक्टर ने युवाओं को नौकरियां देने के मामले में पहल की.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के चाइना सेंटर के एसोसिएट जॉर्ज मैग्नस कहते हैं कि इस दफ़ा चीजें अलग हैं. निजी सेक्टर भी दबाव में है. वह कहते हैं, "उस वक्त कोई भी ट्रेड वॉर के बारे में बात नहीं कर रहा था. पूरी दुनिया की कंपनियां चीन को मैन्युफैक्चरिंग का काम दे रही थीं."
वह बताते हैं, "अब पूरी दुनिया एक आर्थिक मुश्किल वक्त से गुजर रही है. इस वजह से कंज्यूमर डिमांड खत्म हो गई है. विदेश व्यापार के लिए कुछ नहीं बचा है. महामारी के आने से पहले चीन जिन मुश्किलात का सामना कर रहा था, कोरोना ने आकर उन्हें कई गुना बढ़ा दिया है."
दबाव में 'चाइनीज़ ड्रीम'
गुजरे 40 साल से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी देश के नागरिकों से अपना एक वादा निभाने में सफल रही है. वह वादा है- हम आपके जीवन की गुणवत्ता को सुधारेंगे और आप हमें सहयोग दीजिए ताकि हम चीन को सही रास्ते पर रख सकें.
2012 में शी जिनपिंग ने इसी सोशल कॉन्ट्रैक्ट को तराशकर चाइनीज ड्रीम की शक्ल दी.
2020 इस ग्रैंड प्लान का एक अहम हिस्सा होने वाला था. इस साल चीन अपने यहां गरीबी को पूरी तरह से खत्म कर देता और लाखों लोगों की जिंदगियों की गुणवत्ता और स्टैंडर्ड को ऊंचा किया जाना था.
लेकिन, कोरोना ने इस सोशल कॉन्ट्रैक्ट को जोखिम में डाल दिया है.
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास के किसी भी अन्य आर्थिक संकट के मुकाबले यह स्वास्थ्य संकट देश की सामाजिक स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है. लाखों युवाओं के लिए उनके पेरेंट्स जितनी सफलता की गारंटी अब नहीं है.
इसी वजह से चीन में आर्थिक रिकवरी बेहद अहम है. साथ ही ग्रोथ टारगेट का न होना सरकार को एक प्लान बनाने के लिए जरूरी लचीलापन दे रहा है.
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