कोरोना लॉकडाउन: 'मानसिक बीमारियों की सुनामी' की चेतावनी दे रहे हैं डॉक्टर

    • Author, फ़िलिपा रोक्सोबी
    • पदनाम, स्वास्थ्य संवाददाता

दुनिया भर के मनोचिकित्सक चेतावनी दे रहे हैं कि लॉकडाउन के दौरान पैदा हुई मुश्किलों की वजह से लोगों में मानसिक तकलीफ़ों की ‘सुनामी’ आने वाली है.

डॉक्टरों की चिंता मुख्य रूप से बच्चों और बुज़ुर्गों को लेकर है.

उनका मानना है कि स्कूल बंद होने और सेल्फ़ आइसोलेशन की वजह से उनकी उस तरह से देखभाल नहीं हो पा रही है, जैसी होनी चाहिए.

मनोचिकित्सकों ने एक सर्वे के ज़रिए पता लगाया कि अस्पतालों में मानसिक सेहत से जुड़े आपातकालीन मामलों की संख्या की बढ़त हुई है और नियमित चेकअप के लिए आने वाले लोगों की संख्या कम हुई है.

डॉक्टरों ने ज़ोर देकर कहा है कि लॉकडाउन के दौरान भी मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं जारी थी इसके बावजूद लोग रुटीन चेकअप और फ़ॉलोअप के लिए अस्पताल नहीं पहुंचे.

मरीज़ अचानक कम हो गए

रॉयल कॉलेज ऑफ़ सायकाइट्रिस्ट्स की प्रमुख, प्रोफ़ेसर वेंडी बर्न ने कहा, “हम पहले ही देख रहे हैं कि कोविड-19 संकट का लोगों की मानसिक सेहत पर बेहद गंभीर असर पड़ा है. बहुत से लोगों को तत्काल मदद की ज़रूरत है.”

प्रोफ़ेसर वेंडी बर्न कहती हैं, “हमें इस बात की चिंता है कि जिन लोगों को तुरंत मदद की ज़रूरत है, लॉकडाउन की वजह से उन तक ये मदद पहुँच नहीं रही है. हमें डर है कि लॉकडाउन के कारण मानसिक समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं और ये सुनामी का रूप ले लेंगी.”

ब्रिटेन के 1,300 डॉक्टरों में हुए सर्वे से पता चला कि इनमें से 43 फ़ीसदी के पास इमर्जेंसी मामलों में बढ़त आई थी. वहीं, 45 फ़ीसदी डॉक्टरों ने रूटीन चेकअप के लिए आने वाले मरीज़ों की संख्या में गिरावट की बात कही.

एक मनोचिकित्सक ने कहा, “ऐसा लगता है जैसे हमारे बुज़ुर्ग मरीज़ बिल्कुल ग़ायब ही हो गए हैं. मुझे लगता है कि वो मदद लेने से बहुत ज़्यादा डरे हुए हैं.”

एक अन्य डॉक्टर ने लिखा, “कोरोना वायरस संक्रमण से उपजी समस्याओं जैसे- सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ने, बढ़ते तनाव और दवाइयां ख़त्म होने की वजह से हमारे बहुत से मरीज़ों में मानसिक बीमारियों के लक्षण पैदा हो गए हैं.”

रॉयल कॉलेज ऑफ़ सायकाइट्रिस्ट्स में बाल और किशोर मनोचिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉक्टर बर्नाडका ड्युबिका ने कहा, “हम चिंतित हैं क्योंकि हमें लगता है कि मानसिक तकलीफ़ों से जूझ रहे बच्चों और किशोरों को वो सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है, जिसकी उन्हें ज़रूरत है.”

उन्होंने कहा, “हमें लोगों तक ये संदेश पहुँचाने की ज़रूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं अब भी उपलब्ध हैं.”

ओल्ड-एज सायकाइट्री की विशेषज्ञ डॉक्टर अमैंडा टॉम्पसेल का कहना है कि बुज़ुर्ग लोग स्काइप और ज़ूम जैसे ऑनलाइन माध्यमों के ज़रिए डॉक्टर से बात करने में कतराते हैं.

उन्होंने कहा, “लोग मदद लेने में हिचकिचा रहे हैं जबकि उन्हें अभी इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.”

'मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाएं'

मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम करनी वाली चैरिटी संस्था ‘रीथिंक मेंटल इलनेस’ का कहना है कि अभी दुनिया के सामने जो चिंताएं उभरकर आ रही हैं, वो इस बात का सुबूत हैं कि लोग पहले से ही मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं.

1,000 लोगों के बीच हुए सर्वे में बहुत से लोगों ने कहा कि महामारी और लॉकडाउन के बाद से उनकी मानसिक सेहत बुरी तरह प्रभावित हुई है. सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों ने कहा कि लॉकडाउन के कारण उन्हें वो ज़्यादातर चीज़ें बंद करनी पड़ीं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद थीं.

रीथिंक मेंटल हेल्थ संस्था की डेनियल हैम मानती हैं कि अस्पताल इन दिनों बेहद मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य को भी प्राथमिकता की सूची में रखना चाहिए.

उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को मानसिक सेहत में हुए नुक़सान से उबरने में बरसों भी लग सकते हैं.

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