नए साल पर रेडियो को याद करता वुसअत का ब्लॉग

- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
सिर्फ 2019 का रजिस्टर ही बंद नहीं हो रहा हिंदी और उर्दू रेडियो से जुड़ी मेरी यादों का पन्ना भी पलट रहा है.
नए पन्ने पर भी बहुत कुछ होगा पर अपने स्वर्गवासी दोस्त जवाले सानी का ये शेर कई दिनों से याद आ रहा है-
"चिराग़ बुझते चले जा रहे हैं सिलसिलेवार
मैं ख़ुद को देख रहा हूं फ़साना होते हुए"
या फिर जॉन एलिया को वे शेर-
"यही सब कुछ था जिस दम तू यहां था
चले जाने पर तेरे जाने क्या नहीं"
पर बात ये है कि समय से कैसी लड़ाई. सर्कल ऑफ़ लाइफ़ को कौन तोड़ सकता है. कोपल फूटती है, कोपल से पौधा बनता है, पौधा जवान होकर दरख़्त बनता है.
और जब अधेड़ उम्र से बुढ़ापे में दाख़िल होता है तो छांव घनी होती जाती है और फिर परछाई में बदल जाती है और इस परछाई से ज़रा परे एक और कोपल फूट पड़ती है. और फिर एक नए सफ़र पर उछलती, कूदती रवाना हो जाती है.
कल ही एक शख़्स मुझसे पूछ रहा था कि मेरे गांव में तो इंटरनेट नहीं, मेरे टीवी पर जो चैनल आते हैं उनमें राजनीतिक बहस के नाम पर सिवाय मुर्गे लड़ाने के कुछ भी तो नहीं होता.

आस-पास, पड़ोस और बाकी दुनिया में क्या हो रहा है इससे न किसी लोकल एफ़एम को मतलब है न किसी लोकल टीवी चैनल को.
अब बीबीसी भी नहीं सुन पाउंगा तो कैसे चलेगा. 30-32 साल पहले मैंने जो दुबई से बीबीसी को सुनने के लिए जो जापानी ट्रांसजिस्टर ख़रीदा था अब मैं उसका क्या करूंगा.
मैं इस शख़्स की बातें सुनता रहा और ये ही कह पाया कि भाई बाज़ार में जो दिखता है वही बिकता है.
पीढ़ी बदलती है तो सोच और उपकरण भी बदल जाते हैं. मगर आवाज़ लगाने वाले कोई न कोई रस्ता ढूंढ ही लेते हैं बस नहीं बदलते तो आवाज़ दबाने वाले नहीं बदलते.
जब मैं 28 साल पहले बीबीसी के परिवार में शामिल हुआ तो उस ज़माने में कंप्यूटर इतना आम नहीं था. एक टीवी की तरह की मशीन हुआ करती थी जिसमें से ख़बरें और रिपोर्ट निकलते रहते थे. उन्हें हम प्रिंट कर हाथ से अनुवाद कर लेते थे.
फिर कंप्यूटर आया तो टाइप करने लगे. रिकॉर्डिंग के लिए भारी-भारी टेप रिकॉर्डर और लंबी टेपों वाले स्पूल डिज़िटल और हल्के होते गए.

ब्लेड से टेप काटने और हाथ से एडिटिंग करने की बजाय कंप्यूटर पर माउस के ज़रिए एडिटिंग होने लगी. फोन की जगह ई-मेल ने ले ली और फिर देखते ही देखते रेडियो, टीवी और बाकी सब मीडिया हमारे फ़ोन की कैद में आ गया.
अब आगे जाने क्या-क्या चमत्कार होंगे. इस परिवर्तन के बीच कुछ नहीं बदला तो वो दोस्त जो मैंने उर्दू और हिंदी सर्विस में इस बीच कमाए.
नए साल में नई सोच, नया बीबीसी और नई पीढ़ी मुबारक हो. कोशिश करूंगा इस बदलाव और नएपन का साथ दे पाउं अब जहां तलक भी दे सकूं.
रही बात भारत-पाकिस्तान की तो वो तो बदलने से रहे. मालूम नहीं ये अच्छी बात है या बुरी.
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