सऊदी अरामको, दुनिया में सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने वाली तेल कंपनी

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जिस ड्रोन हमले ने कच्चे तेल के बाज़ार में हलचल मचा दी है, उसकी ज़िम्मेदारी को लेकर फिलहाल ऊहापोह की स्थिति है. लेकिन जिस पर हमला हुआ, वो सबसे ज़्यादा ध्यान खींच रहा है: सऊदी अरामको, विश्व में सबसे ज़्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी.
प्रतिदिन 10 मिलियन बैरल के उत्पादन और 356,000 मिलियन अमरीकी डॉलर की कमाई के साथ, सऊदी अरब की इस सरकारी तेल कंपनी के पास दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी का भी तमगा है. और जल्द ही, एक और भी मिलने वाला है: इतिहास में सबसे बड़े आईपीओ वाली कंपनी होने का.
हालांकि इस हफ्ते ये कंपनी दूसरे ही कारण के लिए सुर्खियों में रही: ड्रोन से इसके दो संयंत्रों को निशाना बनाया गया, जिससे आग लग गई और काफी नुकसान हुआ. इस नुकसान की वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की संभावना है.
इस हमले से देश के सबसे बड़े संयंत्र अबक़ीक़ रिफायनरी और दूसरे सबसे बड़े संयंत्र ख़ुरैस तेल क्षेत्र पर असर पड़ा है.
तब से ही, दोनों हमलों से होने वाले असर के बारे में लगातार खबरें आ रही हैं.
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री, अब्दुल अज़ीज़ बिन सलमान ने बताया कि देश का तेल उत्पादन घटकर प्रति दिन करीब 5.7 मिलियन बैरल हो गया है. जो सामान्य से लगभग आधा है.
सोमवार को जब स्टॉक मार्केट खुले तो इस गिरावट का असर कच्चे तेल की कीमतों में दिखने लगा. कीमतें 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत बढ़ गईं, इतने ही वक्त में ब्रेंट में कीमत सबसे ज़्यादा 71.95 अमरीकी डॉलर पर पहुंच गई.

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कीमतों में उस वक्त स्थिरता आई, जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि विश्व आपूर्ति को ठीक रखने के लिए वो ज़रूरत पड़ने पर अमरीका के संरक्षित तेल भंडार के इस्तेमाल को मंज़ूरी देंगे.
अमरीका, हमलों के लिए ईरान को ज़िम्मेदार बताता है. हालांकि हमलों की ज़िम्मेदारी यमन के हूती विद्रोहियों ने ली है. वो सऊदी अरब के नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के ख़िलाफ़ गृह युद्ध लड़ रहा है. ये खूनी गृह युद्ध बीते चार साल से भी ज़्यादा वक्त से चल रहा है.
वैश्विक सप्लाई में 5% की कमी
सिर्फ़ एक कंपनी पर हमले से इतने गंभीर परिणाम क्यों हो रहे हैं?
क्योंकि दुनियाभर का 10 प्रतिशत तेल सऊदी अरब से जाता है. इसलिए 5.7 मिलियन के नुकसान का मतलब है कि वैश्विक आपूर्ति में 5 प्रतिशत की कटौती.

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स्विज़ फाइनेंशियल सर्विस कंपनी यूबीएस के विश्लेषकों ने एक नोट में कहा है, "महज़ एक हमले से वैश्विक तेल आपूर्ति में 5 प्रतिशत की कमी, बहुत ही चिंता की बात है. ये मात्रा ओपेक से बाहर के देशों के 2014 से 2018 बीच के कुल उत्पादन से भी ज़्यादा है."
कई विश्लेषकों का मानना है कि अब ये कंपनी भूराजनीतिक ख़तरे की चपेट में आ गई है. और अब निवेशक निश्चित तौर पर इस बिंदु पर विचार करेंगे.
सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 2016 में पहली बार कंपनी को आईपीओ बनाए जाने के बारे में घोषणा की थी. अरामको कई सालों से इसकी तैयारी कर रही है.
ये क्राउन प्रिंस के महत्वाकांक्षी सुधार प्रोग्राम का बड़ा हिस्सा है. जो सऊदी की अर्थव्यवस्था में विविधता लाना चाहते हैं, ताकि वो अब तेल पर ज़्यादा निर्भर ना रहे.
इसे 2017 या 2018 में अमल में लाया जाना था, लेकिन इसकी तारीख कई बार टाल दी गई.
इसकी तैयारी के लिए कंपनी को कई साल लगाने पड़े हैं. फोर्ब्स पत्रिका के मुताबिक "2016 में अरामको के पास अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अकाउंटिक की किताबें तक नहीं थीं. और ना तो उसके पास संस्थागत चार्ट और स्ट्रक्चर के औपचारिक रिकॉर्ड थे."
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि चार दशकों तक अरामको की आर्थिक स्थित एक रहस्य थी.
हालांकि जब सरकार कंपनी का एक हिस्सा बेचेगी तो इस रहस्य से पर्दा उठ जाएगा. हमले के बाद आ रही खबरों से अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि ये दो चरणों में किया जा सकता है.
पहले चरण में, साल के अंत तक सऊदी अरब में ही एक प्रतिशत शेयर बेचे जाएंगे. दूसरे चरण में 2020 में शेयर विदेश में बेचे जाएंगे. हालांकि ये कहां बेचे जाएंगे, इस बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक, उत्पादन सामान्य होने तक सऊदी के अधिकारियों में आईपीओ को फिर से टालने की बातचीत चल रही है.

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दो अरब डॉलर की कंपनी
ये सवाल उठता रहा है और उठता रहेगा कि अरामको की आर्थिक हैसियत क्या है.
सऊदी के मुताबिक अरामको दो अरब डॉलर की कंपनी है. अगर ये अनुमान सही है, तो इसका मतलब अरामको का मूल्य अपने करीबी प्रतिद्वंदी एप्पल के मुकाबले चार गुना ज़्यादा है.
विश्लेषकों का मानना है कि रियाद की रणनीति कुछ ज़्यादा ही आशावादी है. इतनी की, इससे इसका मूल्य बढ़कर दोगुना हो जाएगा. लेकिन अगर कंपनी का मूल्य इससे आधा भी है तो, आईपीओ मिलना ऐतिहासिक होगा.
फायदे और खतरे
एकेडियन एसेट मैनेजमेंट में इमर्जिंग मार्केट्स स्ट्रेटजी की प्रमुख आशा मेहता ने बीबीसी से कहा, "अरामको दुनिया में सबसे ज़्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनी बनकर उभरी है."
उनके मुताबिक, "देश के कई सारे और उत्पादक तेल क्षेत्रों को देखते हुए, कंपनी को बड़े तेल भंडारों, अद्वितीय स्तर के उत्पादन और उत्पादन की कम कीमत की वजह से फायदा होता है."

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मोहम्मद बिन सलमान के सुधार
एक मुद्दा जो सीधे तौर पर कंपनी के आईपीओ से जुड़ा है वो है अर्थव्यवस्था का उदारीकरण. विश्लेषकों का कहना है, "कंपनी ने तेज़ी से बदलाव किए हैं और कम वक्त में वैश्विक पूंजी बाज़ार के साथ खुद को जोड़ा है."
क्राउन प्रिंस ने अपनी रणनीतिक योजना "विज़न 2030" को बढ़ावा दिया है, जिससे वो एक घोर रूढ़िवादी देश की छवि को बदलना चाहते हैं और विदेशी प्राइवेट पूंजी के लिए दरवाज़े खोलने की ओर बढ़ रहे हैं.
इसके लिए उन्होंने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाया. सिनेमा घर और महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार देकर पश्चिम को सांकेतिक संदेश दिए.
हालांकि पिछले साल तुर्की स्थित दूतावास में सऊदी पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या से उसकी छवि धूमिल भी हुई.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, "इस अपराध में क्राउन प्रिंस की संलिप्तता के पर्याप्त और विश्वसनीय सबूत मौजूद हैं."

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इसके बाद भी दूसरी सरकारों और कंपनियों के सऊदी के साथ वाणिज्यिक संबंध ज्यों के त्यों हैं और अरामको जैसी कंपनी पर कोई असर नहीं पड़ा है.
इंटर-अमरीकन ट्रेंड्स कंसल्टेंसी के कार्यकारी निदेशक एंटोनियो डे क्रुज़ ने बीबीसी से कहा, "अरामको मुनाफे वाली कंपनी इसलिए है, क्योंकि वो शेल और एक्सोन के मुकाबले ज़्यादा मात्रा में कच्चे तेल का उत्पादन करती है, उस पर कर्ज़ कम है और उसे उत्पादन की कीमत भी कम पड़ती है."
विश्लेषकों की मानें तो कर्ज़ करीब 20 हज़ार मिलियन अमरीकी डॉलर होगा और वो हाइड्रोकार्बन से प्रति बैरल 4 अमरीकी डॉलर की कीमत पर उत्पादन कर लेते हैं. जबकि उनके करीबी प्रतिद्वंदियों को इसकी कीमत 20 अमरीकी डॉलर पड़ती है.
क्रुज़ कहते हैं, "मुझे लगता है कि अरामको का वाणिज्यिक मूल्य 1.3 अमरीकी डॉलर और 2 अरब अमरीकी डॉलर के बीच हो सकता है."
"उनके मुताबिक कंपनी के पास दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोकार्बन भंडार है. यानी क़रीब 261 अरब बैरल."
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