पाकिस्तानः कैसा रहा पीएम इमरान ख़ान का एक साल?

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
इमरान ख़ान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बने एक साल पूरे हो चुके हैं और ये वक्त काफ़ी घटनाक्रमों का गवाह रहा.
पूर्व क्रिकेटर की पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ़ (पीटीआई) साल 2018 में दिग्गज पार्टियों पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को हराकर सत्ता में आई थी.
पिछले साल 18 अगस्त को इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और उन्हें विरासत में समस्याओं से घिरा सिस्टम मिला, जिसमें आर्थिक संकट, व्यापक भ्रष्टाचार और ख़राब अंतरराष्ट्रीय छवि भी शामिल है.
चुनाव प्रचार में उन्होंने कुशल प्रशासन, आर्थिक लचीलापन और पड़ोसियों से रिश्ते ठीक कर पाकिस्तान की काया पलट कर देने का वादा किया था.
लेकिन एक साल बाद भी इमरान ख़ान को न केवल अपने वादे पूरे करने की ज़रूरत है बल्कि उन्हें अतिरिक्त और अभूतपूर्व स्थितियों से भी निपटना है.
अपनी हालिया लोकप्रियता के बावजूद पीटीआई दो दशक तक पाकिस्तान की राजनीति में बहुत कमज़ोर स्थिति में रही थी. सत्ता में आने से पहले साल 2013 के आम चुनावों में वो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.
बीबीसी मॉनीटरिंग ने ये जानने की कोशिश की है कि इमरान ख़ान के नेतृत्व में एक साल में पाकिस्तान का मुख्य क्षेत्रों में कैसा प्रदर्शन रहा.

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अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था को लेकर पीटीआई के नेतृत्व वाली सरकार से जिन्हें उम्मीद थी, उन्हें निराशा होगी.
सरकार ने आर्थिक संकट से उबरने के लिए बड़ा क़र्ज़ लिया है. हालांकि प्रधानमंत्री बनने से पहले इमरान ख़ान अपने भाषणों में क़र्ज़ लेने के ख़िलाफ़ बोलते रहे थे और 'विदेशी संस्थाओं से भीख मांगने की बजाय ख़ुदकुशी करने को बेहतर' मानते थे.
उसके बावजूद बीते मई में पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) से कड़ी शर्तों पर 6 अरब डॉलर के क़र्ज़ का समझौता किया है. लेकिन आर्थिक सुधारों का रास्ता इतना आसान भी नहीं है.
ताक़तवर सेना का अभी भी आर्थिक फ़ैसलों पर बहुत प्रभाव है और इसकी वजह से सरकार की ओर से किसी साहसिक क़दम का लिया जाना मुश्किल होता है.
बीते जून में आर्थिक समिति में शामिल किए गए सैन्य प्रमुख क़मर जावेद बाजवा पाकिस्तान की आर्थिक दिक़्क़तों के लिए राजस्व कुप्रबंधन को दोषी ठहराते हैं.
इमरान ख़ान की नीतिगत प्राथमिकता में पाकिस्तान के टैक्स दायरे को बढ़ाना रहा है. लेकिन उनकी अपीलों का बहुत असर नहीं दिख रहा है.
जुलाई में स्थानीय अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने ख़बर प्रकाशित की कि टैक्स और जीडीपी का अनुपात 9.9 प्रतिशत रहा है जो पिछले पांच सालों में सबसे कम है.
सरकार का दावा है कि आर्थिक हालात सुधर रहे हैं लेकिन जानकार असहमति जताते हैं.
डॉन अख़बार में साक़िब शेरानी ने लिखा, "आर्थिक संकट की वजह से पिछले एक साल के दौरान मार्केट में भरोसे पर काफ़ी असर पड़ा है."

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विदेश नीति
पांच अगस्त तक प्रधानमंत्री के सामने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की सबसे बड़ी चुनौती थी. लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर के बारे में भारत सरकार के फ़ैसले के बाद स्थितियां बदल गई हैं.
भारत के अचानक क़दम से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री पर बहुत अधिक दबाव आ गया है. एक साल की सरकार के सामने शायद अब तक की ये सबसे बड़ी चुनौती है.
पाकिस्तान अब संयुक्त राष्ट्र से कार्रवाई की मांग कर रहा है, भारत के साथ उसने राजनयिक रिश्ते कम कर दिये हैं और द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया है.
बीते फ़रवरी में पुलवामा में 40 भारतीय सैनिकों की हत्या की ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी संगठन जैश ए मोहम्मद ने ली थी, उसके बाद दोनों परमाणु हथियार संपन्न देशों में तनाव बहुत बढ़ गया था.
फ़िलहाल चीन पाकिस्तान का एकमात्र ताक़तवर सहयोगी है. इसकी वजह उनके ऐतिहासिक संबंध और इस्लामाबाद में बीजिंग के गहरे आर्थिक हित हैं.
इमरान ख़ान ने अपना पहला साल सऊदी अरब, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात से संबंध सुधारने में गुज़ारा जिन्होंने पाकिस्तान को अरबों डॉलर क़र्ज़ देने का वादा किया था.
इमरान ख़ान ने पड़ोसी मुल्क अफ़ग़ानिस्तान में शांति समझौते में मदद करने की इच्छा जताई थी ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को सुधारा जा सके क्योंकि अमरीका वहां अपने सैनिकों की संख्या कम करना चाह रहा है.

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इमरान ख़ान जब जुलाई में वॉशिंगटन में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मिले तो इस संबंध में प्रस्ताव दिया था. तब पत्रकारों और समीक्षकों ने दोनों देशों में तनावपूर्ण रिश्ते के बीच इमरान की कूटनीतिक सफलता क़रार दिया था.
इस्लामाबाद पर विदेशी नीति के हथियार के तौर पर इस्लामी चरमपंथियों को शह देने के दिल्ली और वॉशिंगटन लगातार आरोप लगाते रहे हैं.
चरमपंथी समूहों के ख़िलाफ़ पर्याप्त कार्रवाई न करने को लेकर अमरीका की ओर से पाकिस्तान पर काफ़ी दबाव रहा है. कथित तौर पर इमरान ख़ान की सरकार से पहले भी देश में ये चरमपंथी समूह सक्रिय रहे हैं.
जैश ए मोहम्मद और जमात उद दावा समेत कई ग्रुपों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की स्थानीय मीडिया में ख़बरें आती रही हैं, जिसे बहुत से लोग सरकार के रुख़ में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखते हैं.
पाकिस्तान सरकार ने चरमपंथी संगठनों की संपत्तियां ज़ब्त कीं, धार्मिक मदरसों को अपने नियंत्रण में लिया और जैश और जमात के साथ कथित लिंक पर दर्जनों संगठनों पर प्रतिबंध लगाया.
बीते जून में चरमपंथ को फ़ंड करने के आरोप में, हाफ़िज़ सईद को गिरफ़्तार किया गया, जिन पर अमरीका और भारत 2008 के मुंबई हमले का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगाते रहे हैं.
प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने 21 जुलाई को लिखा, "इसे साफ़तौर पर महसूस किया जा रहा है कि सरकार देर से ही सही चरमपंथी समूहों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई कर रही है."

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हालांकि सरकार के इस फ़ैसले के पीछे फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफ़एटीएफ़) को कारण माना जाता है. ये एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है जिसने चरमपंथ को नियंत्रित करने में असफल होने के कारण पाकिस्तान को अपनी ग्रे लिस्ट में डाल रखा है.
कुछ लोग ये भी मानते हैं कि पुलवामा में हुए हमले के बाद इस्लामाबाद की बढ़ती आलोचना के बाद ये कार्रवाई तेज़ हुई है. हालांकि पाकिस्तान का कहना है कि ये पहले से तय था.
इस बीच पाकिस्तान में चरमपंथी समूहों की ओर होने वाली हिंसा में हाल के समय में काफ़ी कमी आई है, इसका श्रेय कबायली इलाक़ों में सैन्य अभियान को भी जाता है.
हालांकि बलूचिस्तान में अलगाववादी ग्रुपों की ओर से छोटी मोटी हिंसा अभी भी जारी है.
डॉन के अनुसार, "ये हमले बताते हैं कि ये दावा करने से पहले कि पाकिस्तान चरमपंथ से मुक्त हो गया है, अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है."
जबसे इमरान ख़ान प्रधानमंत्री बने हैं, विपक्ष लगातार उन्हें निशाना बनाता रहा है और उन्हें 'सेलेक्टेड' प्रधानमंत्री कहता रहा है, जिसका आशय है कि देश की ताक़तवर सरकार की मदद से वो पीएम बने.

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हालांकि ऐसी भी ख़बरें हैं कि सरकार और सेना में कुछ दरार आई है.
चार जून को सेना ने कहा कि पीटीआई सरकार की ओर से कटौती के उपायों के तहत वो नए वित्तीय वर्ष से रक्षा बजट कम कर लेगी.
भारतीय मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार, "सरकार के कामकाज को लेकर भी इमरान ख़ान और सेना में अनबन है."
लेकिन प्रधानमंत्री ने इससे साफ़ इनकार करते हुए कहा कि मुख्य मुद्दों पर सेना और सरकार के विचार एक हैं.
सेना भी विदेश नीति के मामले में इमरान ख़ान सरकार के साथ खड़ी दिखती है, ख़ासकर चिर प्रतिद्वंद्वी भारत के मामले में.
सरकार-विपक्ष के बीच सत्ता संघर्ष
घरेलू स्तर पर, पीटीआई सरकार का एक साल विपक्ष के साथ विभिन्न मुद्दों पर सत्ता संघर्ष में उलझा रहा.
पीएमएल-एन और पीपीपी समेत बड़ी विपक्षी पार्टियों ने चुनावी नतीजों को ये कहते हुए ख़ारिज़ कर दिया था कि चुनावों में 'धांधली' हुई थी.
25 जुलाई को इन पार्टियों ने पीटीआई सरकार के चुनाव जीतने के एक साल पूरे होने पर काला दिवस मनाया.

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विपक्ष ने सरकार पर 'अर्थव्यवस्था को नष्ट करने' और 'महंगाई का बम गिराने' का भी आरोप लगाया है.
उनका आरोप है कि मीडिया पर सेंसरशिप बढ़ाई जा रही है और विपक्षियों को चुप कराने की कोशिशें हो रही हैं. सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि वो उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.
भ्रष्टाचार और नशा तस्करी के मामले में कई विपक्षी नेताओं की गिरफ़्तारी ने सरकार की ओर से राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ 'बदले की कार्रवाई' के आरोपों को बढ़ावा दिया है.
गिरफ़्तारी और मुक़दमे के मामले में पीएमएल-एन प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़, उनकी बेटी और पीएमएल-एन की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ और पूर्व राष्ट्रपति और पीपीपी प्रमुख आसिफ़ अली ज़रदारी जैसे ये कुछ नाम हैं.
उर्दू टीवी चैनल जियो न्यूज़ पर पत्रकार शाहज़ेब ख़ानज़ादा ने कहा था, "जल्द ही मुख्यधारा के विपक्ष का पूरा नेतृत्व जेल में होगा."
लेकिन कश्मीर के मामले में कुछ तीखी आलोचनाएं अब आई हैं.
भारत प्रशासित कश्मीर पर भारत सरकार की कार्रवाई पर बहुत कमज़ोर प्रतिक्रिया देने पर पीएमएल-एन जैसी पार्टियों ने इमरान ख़ान पर 'कश्मीर के भविष्य को बेचने' के आरोप लगाए हैं.
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