कितना 'आज़ाद' पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"पाकिस्तान और हिंदुस्तान के वजूद में आने से कश्मीरी सबसे ज़्यादा डिस्टर्ब हुए. हिंदुस्तान को आज़ादी मिली. पाकिस्तान को आज़ादी मिली. बीच में हम लोग फंस गए. 1931 से लेकर आज तक कश्मीरी बॉर्डर पर शहीद होते हैं. जो अंदर रहते हैं वो भी शहीद होते हैं. वो सिर्फ आज़ादी के मकसद के लिए कुर्बानी दे रहे हैं."
बीबीसी से ये बातें साझा करने वाले ये शख्स जम्मू कश्मीर के उस हिस्से में रहते हैं,जहां से बातें कम सामने आती हैं. ये कश्मीर का वो हिस्सा है जिसका प्रशासन पाकिस्तान के हाथ है.
हालात पर अफसोस ज़ाहिर करने वाले इस शख़्स की गुज़ारिश पर हम इनका नाम ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं. वो साल 1990 में भारत प्रशासित कश्मीर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर चले गए थे. वो कहते हैं कि भारत प्रशासित कश्मीर में रहने वाले अपने रिश्तेदारों की सुरक्षा की फिक्र में वो अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते.
वो वहां 'सुकून से होने का' दावा तो करते हैं लेकिन दर्द रह कर ज़ुबान पर आ जाता है.

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पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर
इसी तरह के कई मलाल भारत प्रशासित कश्मीर से गईं रज़िया भी अपने दिल में समेटे हैं. हम इनका भी असली नाम ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं.
वो कहती हैं, "सुकून है तो मुश्किल भी ज़्यादा है. दिल तो बहुत करता है वहाँ (भारत प्रशासित कश्मीर) जाने का. लेकिन किस तरह जाएं. जब तक कश्मीर का कोई फैसला नहीं होता है तो किस तरह जा सकते हैं. अगर हम इधर सोना भी खाते हैं (यानी कितनी ही अमीरी में भी रहें) तो भी हमें दुख अपने वतन का ज़रूर है. हम सोचते हैं कि अगर हमारी कब्र भी हो तो अपने वतन में हो. और मैं आपको क्या बताऊं."
हालांकि, रज़िया भी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के हालात के बारे में बोलने से कतराती हैं.
लेकिन रुहाना ख़ान को ऐसी कोई दिक्कत नहीं है. वो एक छात्रा हैं. हम इनका भी असल नाम ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं.
वो कहती हैं, "ज़िंदगी बस गुज़र ही जाती है लेकिन (हमारी ज़िंदगी) बड़ी मुश्किल हालात से गुज़र रही है. हमें पाकिस्तान सरकार जो अलाउंस देती है, उसमें हमारा गुज़ारा बड़ी मुश्किल से या कहें कि हो ही नहीं सकता."
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जम्मू और कश्मीर
भारत के विभाजन और पाकिस्तान के अलग देश बनने के पहले जम्मू कश्मीर डोगरा रियासत थी और इसके महाराजा हरि सिंह थे.
अगस्त 1947 में पाकिस्तान बना और करीब दो महीने बाद करीब 2.06 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली जम्मू कश्मीर की रियासत भी बंट गई.
इसके बाद के 72 सालों में यानी अब तक दुनिया काफी बदल गई है.
जम्मू कश्मीर की लकीरों में भी बदलाव आया है लेकिन नहीं बदली है तो इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तब से शुरू हुई तनातनी और खींचतान.
दोनों देश जम्मू और कश्मीर पर अपना हक़ जताते हैं और इसके लिए कई बार मैदान-ए-जंग में भी उतर चुके हैं.
गोलियों और धमाकों के शोर, नेताओं के भाषणों और बुलंद नारों के बीच कश्मीरियों की आवाज़ अगर गुम नहीं होती तो अनसुनी ज़रूर रह जाती है.
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भारतीय सेना
शिकायतें उन्हें भी हैं, जो हमेशा से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में रहते रहे हैं.
पाकिस्तान का कश्मीर के जिस हिस्से पर नियंत्रण है, वो उसे 'आज़ाद कश्मीर' बताता है.
1947 में जब पाकिस्तान की तरफ से खुद को 'आज़ाद आर्मी' बताने वाली कबायली फ़ौज कश्मीर में दाखिल हुई तब महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और राज्य के विलय के प्रस्ताव पर दख्तखत किए.
भारतीय सेना जब तक कश्मीर पहुंची तब तक जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान के कबायली कब्ज़ा कर चुके थे और वो रियासत से कट चुका था.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद में रहने वाले लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी लंबे अर्से से कश्मीर मामले पर करीबी नज़र रखते हैं.
अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, "पहले सीज़फायर के बाद जो हिस्सा पाकिस्तान के पास आया, उससे यहां दो हिस्सों में हुकूमतें बनीं. एक आज़ाद कश्मीर था. एक गिलगित बल्तिस्तान. हुकूमत आज़ाद ए कश्मीर 24 अक्टूबर 1947 को बनाई गई. 28 अप्रैल 1949 को हुकूमत के प्रेसिडेंट ने एक समझौते के तहत गिलगित बाल्टिस्तान का एक बड़ा इलाक़ा पाकिस्तान को दिया."
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लगभग पूरी आबादी मुसलमान है...
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और गिलगित बल्तिस्तान जम्मू और कश्मीर रियासत के ही हिस्से थे.
मौजूदा दौर में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पास 5134 वर्ग मील यानी करीब 13 हज़ार 296 वर्ग किलोमीटर इलाका है.
इसकी सरहदें पाकिस्तान, चीन और भारत प्रशासित कश्मीर से लगती हैं. मुज़फ़्फ़राबाद इसकी राजधानी है और इसमें 10 ज़िले हैं.
वहीं गिलगित बल्तिस्तान में 28 हज़ार 174 वर्ग मील यानी करीब 72 हज़ार 970 वर्ग किलोमीटर इलाक़ा है.
गिलगित बल्तिस्तान में भी दस ज़िले हैं. इसकी राजधानी गिलगित है. इन दोनों इलाकों की कुल आबादी 60 लाख के करीब है और लगभग पूरी आबादी मुसलमान है.
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समझौतों का उल्लंघन
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पूर्व चीफ़ जस्टिस सैयद मंजूर गिलानी दावा करते हैं कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पास पाकिस्तान के राज्यों से ज़्यादा अधिकार हैं.
लेकिन वो गिलगित बल्तिस्तान इलाक़े को कराची समझौते के तहत पाकिस्तान को सुपुर्द करने के फ़ैसले पर सवाल उठाते हैं.
वो कहते हैं, "कराची समझौता अप्रैल 1949 में हुआ था. ये पाकिस्तान सरकार, आज़ाद कश्मीर की सरकार और तब की रूलिंग पार्टी दरम्यान हुआ था. अगर उस समझौते की भावना के तहत यहां संविधान बन जाता तो हमें ज़्यादा खुद मुख्तारी हासिल होती. उस समझौते में एक ही ड्रॉ बैक था कि गिलगित बल्तिस्तान पाकिस्तान को सरेंडर कर दिया गया."
भारत पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और गिलगित बल्तिस्तान दोनों पर ही हक़ जताता है.
भारत में नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइज़री बोर्ड के मैंबर और रॉ के पूर्व स्पेशल सेक्रेटरी तिलक देवाशर पाकिस्तान और कश्मीर मामलों पर करीबी नज़र रखते हैं.
वो पाकिस्तान पर कई किताबें भी लिख चुके हैं. वो कहते हैं कि पाकिस्तान ने समझौतों का बार-बार उल्लंघन किया है.
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नियंत्रण पाकिस्तान के पास
देवाशर कहते हैं, "अभी भारत के लिए कहा जा रहा है कि 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर का स्टेटस बदल दिया. सबसे बड़ी बात है कि पाकिस्तान ने इसका (समझौते का) उल्लंघन किया था. मैं उदाहरण देता हूं. मार्च 1963 में पाकिस्तान ने कश्मीर का एक इलाका चीन को दे दिया. ये करीब 1900 वर्ग मील था."
"ये भी समझौते का उल्लंघन था.फिर 1949 का कराची समझौता था, जहां गिलगित बल्तिस्तान के लोग उसमें शामिल भी नहीं थे और जो कथित आज़ाद जम्मू और कश्मीर था, उनके नेतृत्व ने वो इलाका पाकिस्तान को सौंप दिया. उनका कोई हक़ नहीं बनता था. मगर पाकिस्तान ने उस इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया."
चीन इसके पहले 1962 में भी जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से (अक्साई चीन) पर अधिकार कर चुका था.
अब्दुल हकीम कश्मीरी भी गिलगित बल्तिस्तान को नज़रअंदाज़ किए जाने की बात करते हैं.
वो बताते हैं कि अब भी इस इलाके को बेहद कम अधिकार हासिल हैं और लगभग पूरा नियंत्रण पाकिस्तान के पास है.
"गिलगित बल्तिस्तान को पाकिस्तान ने अलग स्टेटस दिया. वहां पर शुरू में जम्हूरियत नहीं थी. 2009 में उन्हें पहला सेटअप दिया गया. उन्होंने कहा कि इसे एक सूबाई हैसियत देते हैं. लेकिन इसे राज्य बनाने की घोषणा नहीं की गई. वहां के लोगों की राज्य बनाने की मांग थी. अब 2018 में जो आदेश आया है उसमें गिलगित बल्तिस्तान की असेंबली है जिसे क़ानून बनाने का अधिकार है, फिर भी उसके पास बेहद सीमित अधिकार हैं."
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बहुसंख्यक आबादी शिया
गिलगित-बल्तिस्तान की सीमा चीन से लगती है. ये इलाका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के मुख्य रास्ते पर है और चीन यहां अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है.
गिलगित बल्तिस्तान का स्टेटस बदलने की एक वजह इसे भी माना जा रहा है और इसे लेकर स्थानीय लोग विरोध भी जाहिर करते रहे हैं.
तिलक देवाशर कहते हैं, "वहां भी विरोध है लेकिन बातें सामने नहीं आती हैं. गिलगित बल्तिस्तान में 1947-48 में बहुसंख्यक आबादी शिया थी. अब कह रहे हैं कि स्टेट सब्जेक्ट रूल हटा दिया, लेकिन (तथ्य है कि) 1970 से ही गिलगित बल्तिस्तान में स्टेट सब्जेक्ट रूल को हटा दिया गया था."
"वहां बाहर के लोगों को बसा कर उन्होंने कोशिश की है कि वहां शिया बहुल स्थिति को बदला जाए. स्थानीय लोग विरोध करते हैं. जब काराकोरम हाईवे बन रहा था या फिर सीपेक के प्रोजेक्ट तैयार हो रहे थे तो बहुत विरोध हुआ. वहां के जो मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, उनके नाम भी आपने नहीं सुने होंगे. एक बाबा जान नाम के नेता थे, वो जाने कितने सालों से जेल में पड़े हैं."
हालांकि, अब भी ऐसे संगठन हैं, जो गिलगित बल्तिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की आज़ादी के लिए मुहिम चला रहे हैं.
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कश्मीर के लोग
ऐसे ही एक संगठन से जुड़े हैं ज़ुल्फिकार बट.
वो कहते हैं, "आज़ाद कश्मीर और गिलगित बल्तिस्तान के अंदर जो लोग हैं वो पाकिस्तान की फौज को काबिज फ़ौज समझते हैं. यहां बड़ी मूवमेंट खुद मुख्तार (स्वायत्त) कश्मीर के लिए चलाई जा रही है. इसमें एक दर्जन से ज़्यादा नेशनलिस्ट संगठन शामिल हैं, जिसमें पांच छह सक्रिय तंजीम हैं."
"डोगरा राज के बाद जो पाकिस्तानी कबायली घुसे जिन्होंने कश्मीर के बँटवारे की बुनियाद रखी और कश्मीर को गुलाम भी किया. उसकी बहाली के लिए कश्मीर के लोग जद्दोजहद कर रहे हैं."
ऐसे अभियान पाकिस्तान के उन दावों पर सवाल उठाते हैं जिनमें कहा जाता है कि उसके नियंत्रण वाला 'कश्मीर आज़ाद' है.
पूर्व चीफ़ जस्टिस गिलानी के मुताबिक पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में हमेशा से बरायनाम चुनाव होते रहे हैं और 1974 से संसदीय प्रणाली लागू है. सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री और राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति होता है.
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ह्यूमन राइट्स वाच
लेकिन लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की असेंबली को हासिल अधिकारों को बेमानी बताते हैं.
अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, "आईन साज़ असेंबली वो होती है जो आईन यानी संविधान बनाए. कानून साज़ वो होती है जो कानून बनाए और कानून एक आईन के तहत ही बनाए जाते हैं. मैं समझता हूं कि इस असेंबली के पास सिर्फ़ कानून के तहत ही इख्तियारात हैं. इनके पास आईन (संविधान) मौजूद ही नहीं."
"इनका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई स्टेटस नहीं है. ये ऐसी हुकूमत है जिसे पाकिस्तान की सरकार के अलावा दुनिया भर में कहीं भी माना नहीं जाता. अगर सच्ची बात की जाए तो रियासत जम्मू कश्मीर की इस असेंबली की पोजीशन अंगूठा लगवाने से ज्यादा नहीं है."
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. बीते दशक में इस इलाके में आए भूकंप के बाद ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी.
रिपोर्ट में दावा किया था, "आज़ाद कश्मीर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कड़ा नियंत्रण है. नियंत्रण की ये नीति चुनिंदा तरह से इस्तेमाल की जाती है. पाकिस्तान स्थित ऐसे चरमपंथी संगठन जो जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की हिमायत करते हैं, उन्हें खुली छूट हासिल है.ख़ासकर 1989 से. वहीं, कश्मीर की आज़ादी बात करने वालों को दबाया जाता है."
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अंतरराष्ट्रीय बिरादरी
रॉ के पूव अधिकारी तिलक देवाशर भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करते हैं
वो कहते हैं, "ये जो कहते हैं आज़ाद कश्मीर (वो) बिल्कुल आज़ाद नहीं है. सारा कंट्रोल पाकिस्तान के हाथ में है. वहां की जो काउंसिल है, उसका चेयरमैन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री है. वहां की सेना नियंत्रण करती है."
"वो लाइन ऑफ कंट्रोल के करीब है, तो वहां 1989 से बेशुमार कैंप चल रहे हैं. वहां वो ट्रेनिंग भी करते हैं. वहां लॉन्च पैड हैं, जहां से भारत में घुसपैठ होती है. ये आर्मी कैंप के साथ जुड़े हुए हैं."
देवाशर ये भी दावा करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के खामोश रहने से पाकिस्तान को मनमानी का मौका मिलता है.
"लोग खुश नहीं हैं पाकिस्तान से. वो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते. लेकिन उनका कोई सपोर्ट नहीं है. कोई सुनवाई नहीं है. अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उन पर ध्यान नहीं दे रही तो पाकिस्तान अपनी मनमानी करता जा रहा है."
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पाकिस्तान और हिंदुस्तान
वहीं लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं कि ये दिक्कत कश्मीर पर अधिकार को लेकर है और सबसे ज़्यादा मुश्किल कश्मीरी लोगों को ही हो रही है
वो कहते हैं, "गोली एलओसी के इस पार से हो या उस पास से आए, उसका निशाना कश्मीर के लोग बनते हैं. जो पाकिस्तान और हिंदुस्तान का आम फौजी है, वो इसकी भेंट चढ़ा."
और रुहाना ख़ान जैसे कश्मीरियों के पास तो शायद गुजारिश करने से ज़्यादा कोई अधिकार है भी नहीं
वो कहती हैं, "मैं ये पैगाम देना चाहती हूं कि जंग से लड़ने से, एक दूसरे पर ताना बाज़ी करने से कुछ हासिल नहीं होगा. दोनों हुकूमतों को चाहिए कि वो आपस में बात करें और इसका कोई हल निकालें."
लेकिन, क्या ये आवाज़ सुनी जाएगी?
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