कश्मीर पर दुनिया इसलिए नहीं सुनती पाकिस्तान की बात...

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कश्मीर. दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत इलाक़ों में एक. पहाड़ों की बर्फ़ से ढकी चोटियां. लुभाने वाली वादियां और घाटियां. कई लोग इसे ज़मीन की जन्नत कहते हैं.
लेकिन, बीते कई दशकों से ये जन्नत सुलगती रही है और इस पर दावेदारी करने वाले दो मुल्क उबलते रहे हैं.
भारत और पाकिस्तान के पहले से तल्ख रिश्तों में एक बार फिर कश्मीर को लेकर कड़वाहट बढ़ गई है.
इसकी शुरुआत भारत सरकार के कश्मीर पर लिए गए अहम फ़ैसले से हुई. भारत सरकार ने अगस्त के पहले हफ़्ते में अहम फ़ैसला किया और जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को ख़त्म कर दिया.
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भारतीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि अनुच्छेद 370 की वजह से जम्मू-कश्मीर में विकास का पहिया थमा हुआ था.
भारत सरकार के फ़ैसले पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया तीखी रही. पाकिस्तान ने भारत का राजनयिक दर्जा घटाने, व्यापारिक रिश्ते ख़त्म करने और समझौता एक्सप्रेस और थार एक्सप्रेस को निलंबित करने का एलान किया.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने दावा किया है कि वे इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र समेत हर संभव मंच पर उठाएंगे. लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय बिरादरी इसमें दख़ल देगी, ख़ासकर ये देखते हुए कि भारत इसे द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाने की बात करता रहा है?
और सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इस मामले में दख़ल दे सकती है?
इसका परोक्ष जवाब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने दिया है. उन्होंने दोनों देशों को 1972 में हुए शिमला समझौते की याद दिलाई है जिसमें इस मुद्दे का हल शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय तरीक़े से निकालने की बात की गई है.

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ग़ौरतलब है कि साल 1948 में सबसे पहले भारत ही इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में लेकर गया था.
कश्मीर पर क़रीबी नज़र रखने वाली राधा कुमार को मनमोहन सिंह सरकार ने कश्मीर पर बनी कमिटी का सदस्य बनाया था. वो कश्मीर की बारीकी से पड़ताल करने वाली किताब "पैराडाइज़ एट वार- ए पॉलिटकल हिस्ट्री ऑफ कश्मीर" लिख चुकी हैं.
राधा कुमार कहती हैं, "इसमें दो-तीन अलग टेक्निकल बातें हैं. संयुक्त राष्ट्र ने उसको अभी तक रिमूव (हटाया) नहीं किया. मतलब ये नहीं कहा कि ये मामला ख़त्म हो गया. उस हद तक सुरक्षा परिषद के सदस्य इस मुद्दे को देख सकते हैं. पिछले कोई 40 साल से देखें, यानी शिमला समझौते के बाद से तो संयुक्त राष्ट्र का इस पर कोई ज़्यादा असर नहीं रहा है."
यहां समझना होगा कि संयुक्त राष्ट्र का दरवाज़ा खटखटाने के बाद भारत बीते क़रीब पाँच दशक से मामले के द्विपक्षीय समाधान की बात क्यों करता है?
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कश्मीर आज़ादी मिलने के पहले से ही विवाद की वजह बना हुआ है. जब विभाजन की योजना तैयार हो रही थी और तय किया जा रहा था कि कौन सा हिस्सा भारत के साथ होगा और कौन सा पाकिस्तान को दिया जाएगा, तब मोहम्मद अली जिन्ना कहते थे कि कश्मीर तो 'उनकी जेब में है.'
कश्मीर की आबादी मुस्लिम बहुल थी लेकिन वहां के राजा हरि सिंह हिंदू थे.
राधा कुमार अपनी किताब में लिखती हैं कि महाराजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान के साथ जाने के बजाय स्विट्ज़रलैंड के मॉडल पर कश्मीर को आज़ाद राज्य रखना चाहते थे. लेकिन अगस्त 1947 में विभाजन के साथ हालात बदलने लगे.
वो कहती हैं, "हमारी आज़ादी और विभाजन के दौर की बात करें तो उसके दो तीन महीने बाद कश्मीर में जंग हुई, उसी दवाब में विलय हुआ. हमारी सेना गई और कश्मीर विभाजित हो गया."

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राधा कुमार लिखती हैं कि महाराजा हरि सिंह पहले पाकिस्तान के साथ समझौते के ज़रिए काम चलाने की कोशिश में थे लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने भारत का रुख़ किया.
इस बीच 21 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर कब्ज़े के मक़सद से ख़ुद को 'आज़ाद आर्मी' बताने वाले कई हज़ार पश्तून लड़ाके मुज़फ्फ़राबाद पहुंच गए और श्रीनगर की तरफ़ बढ़ने लगे.
24 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी लेकिन 26 अक्टूबर को जब उन्होंने राज्य के भारत के साथ आने के प्रस्ताव पर दस्तख़्त किए, तब उन्हें मदद मिली. अगले ही दिन भारतीय सेना श्रीनगर पहुंच गई और कथित आज़ाद आर्मी के लड़ाकों को पीछे धकेलने लगी.
राधा कुमार कहती हैं, "उस वक़्त भारत पर बहुत दबाव था. अंग्रेज़ सरकार ने उस वक़्त कई गड़बड़ियां कीं. उस वक़्त दोनों तरफ़ (भारत और पाकिस्तान में) सेना के जो प्रमुख थे, वो अंग्रेज़ थे. भारत की तरफ़ जो सेना के प्रमुख थे, उनको चुप कराया, धमकियां दीं. वो अलग समय था."

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भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष बढ़ने लगा तो तब के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर जवाहर लाल नेहरू एक जनवरी 1948 को ये मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए.
कई भारतीय विशेषज्ञ इसे नेहरू की एतिहासिक भूल मानते हैं. राधा कुमार भी इस क़दम को ग़लत मानती हैं.
वो कहती हैं, "संयुक्त राष्ट्र में जाना ग़लत फ़ैसला था. उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र की शुरुआत ही हुई थी और ये मानने की वजह नहीं थी कि संयुक्त राष्ट्र भूराजनीतिक स्थिति और बड़े देशों के दबाव से अलग रहेगा."
संयुक्त राष्ट्र में 1948 में कश्मीर पर पहला प्रस्ताव आया.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में यह था- प्रस्ताव नंबर 38. इसके बाद इसी साल प्रस्ताव 39, प्रस्ताव 47 और प्रस्ताव 51 के रूप में तीन प्रस्ताव और आए.
प्रस्ताव 38 में दोनों पक्षों से अपील की गई कि वे हालात को और न बिगड़ने दें. इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को बुलाकर सीधी बातचीत कराएं.
प्रस्ताव 39 में सुरक्षा परिषद ने एक तीन सदस्यीय आयोग बनाने का फ़ैसला किया, जिसे तथ्यों की जांच करनी थी.

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21 अप्रैल 1948 को प्रस्ताव संख्या 47 में जनमत संग्रह पर सहमति बनी. प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रण के मुद्दे को जनमत संग्रह से तय करने की बात कही गई. इसके लिए शर्त तय की गई कि कश्मीर से पाकिस्तानी लड़ाके बाहर जाएं और भारत कम से कम सेना रखे.
लेकिन 1950 के दशक में भारत ने ये कहते हुए इससे दूरी बना ली कि पाकिस्तानी सेना पूरी तरह राज्य से नहीं हटी और साथ ही इस भू-भाग के भारतीय राज्य का दर्जा तो वहां हुए चुनाव के साथ ही तय हो गया.
लेकिन भारत के इस दावे को संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तान ने नहीं माना.
हालांकि, भारत-पाकिस्तान के बीच साल 1971 में हुए युद्ध के बाद 1972 में हुए शिमला समझौते में दोनों देश इस मुद्दे का हल आपसी बातचीत से निकालने पर सहमत हुए.

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लेकिन, पाकिस्तान अब भी कश्मीर मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण की कोशिश में रहता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की गुज़ारिश के बाद हाल में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश की थी.
कश्मीर मुद्दे की गहरी समझ रखने वाले पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हारुन रशीद कहते हैं, "पाकिस्तान यही तो दलील देता है कि भारत ने ही इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया और संयुक्त राष्ट्र में लेकर गया. फिर (जवाहर लाल) नेहरू के बाद से क्यों भारत की नीति बदली है. पाकिस्तान में (प्रधानमंत्री) इमरान ख़ान अभी अमरीका से आए तो बड़े ख़ुश होकर आए."
वो कहते हैं, "ट्रंप ने उन्हें मध्यस्थता की उम्मीद दिलाई है. उनके सामने ही इमरान ख़ान ने कहा कि इस इलाक़े के जो एक अरब लोग हैं, उन्हें इससे फ़ायदा होगा कि अगर कोई मध्यस्थता करके कश्मीर का मुद्दा हल करा सके."
ट्रंप के दावे को भारत ख़ारिज कर चुका है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे मध्यस्थता की बात की थी. लेकिन चीन की ओर से मध्यस्थता के सुझाव को समर्थन मिलने से कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण की पाकिस्तान की मंशा को मज़बूती मिली.

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हालांकि, पाकिस्तान की इस मंशा पर कई सवाल भी उठाए जा रहे हैं.
हारुन रशीद कहते हैं, "जब इमरान ख़ान सरकार में नहीं थे तब वो एक हल की बात किया करते थे कि कश्मीर को तीन हिस्सों में बांट दें और शायद यही इसका हल हो. तो शायद इमरान ख़ान उसी तीन हिस्सों वाले हल पर अमल कर रहे हैं या फिर अमरीका में कोई वादा करके आए हैं. तो जैसे वो ऐलान हुआ कि भारत ने कहा कि दो हिस्सों में बांट रहे हैं और तीसरा हिस्सा पाकिस्तान के पास है तो अगर उस तरह से हल किया जा रहा है तो शायद हल हो जाए."
हारुन रशीद कहते हैं कि कई लोग ये सवाल भी पूछ रहे हैं कि भारत ने जब अनुच्छेद 370 पर फ़ैसला किया तो इमरान ख़ान ने भारत पर दबाव बना सकने वाले अमरीका और चीन जैसे देशों से संपर्क करने के बजाए तुर्की और मलेशिया के नेताओं से क्यों बात की?

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उधर, राधा कुमार कहती हैं कि कश्मीर में पहले से ही कई पक्ष शामिल हैं. इसलिए ये मामला पेचीदा बना हुआ है.
वो कहती हैं, "दो तरह की दिक्क़तें हैं. एक तो भारत- पाकिस्तान हैं. दूसरा दो विभाजित कश्मीर भी हैं. विभाजित कश्मीर में चीन भी आ जाता है. हम देखें तो इसमें बहुत सारे दावेदार हैं और खेल बिगाड़ने वाले हैं. सिर्फ़ एक देश के नहीं बल्कि काफ़ी सारे देशों के. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन था तब काफ़ी अफ़ग़ान भी आए थे."

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लेकिन, वो ये भी दावा करती हैं कि पाकिस्तान भले ही कोशिश करता दिख रहा है लेकिन इस मुद्दे पर उसे संयुक्त राष्ट्र या अन्य बड़े देशों का समर्थन मिलना मुश्किल है. वो याद दिलाती हैं कि बीते 50 वर्षों में सयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सिर्फ़ तभी दख़ल दिया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष जैसी परिस्थिति बनी हो.
राधा कुमार कहती हैं, "मुझे लगता है कि दुनिया की जो बड़ी शक्तियां हैं वो ज्यादा दबाव नहीं डाल पाएंगी. ठीक तरह से दख़ल देना और उसके साथ आर्थिक और सैन्य नतीजों को देखना होगा. धमकी भी होनी चाहिए और तैयारी भी होनी चाहिए कि इसे हम इस्तेमाल करेंगे. मुझे नहीं लगता कि अमरीका और चीन सैन्य और आर्थिक दख़ल करेंगे."

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वहीं, हारुन रशीद की राय भी ऐसी ही है. वो कहते हैं कि दुनिया इसे विवाद का मुद्दा ज़रूर मानती है लेकिन इस मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण की कोशिश में पाकिस्तान ज़्यादा क़ामयाब नहीं हो पाया है.
हारुन रशीद कहते हैं, "पाकिस्तान ने पहले भी काफ़ी कोशिशें कीं. बीते दस या 15 साल मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसमें कोई क़ामयाबी मिली है. मानवाधिकार का मुद्दा वो उठाते हैं. इस पर मानवाधिकार संगठन तो बोलते हैं लेकिन कोई देश नहीं बोलता. हर किसी के आर्थिक और दूसरे हित हैं. वो इसे इतनी अहमियत नहीं दे रहे लेकिन हर देश इसे एक मुद्दा मानता है. वो मानते हैं कि ये एक विवादित क्षेत्र है, जिसका हल होना अभी बाक़ी है."

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ये हल कब और कैसे होगा, ये वो सवाल है जिसका जवाब कम से कम अभी मिलता नहीं दिखता है.
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