बलूच जज जस्टिस काज़ी ईसा पाकिस्तानी सेना की आँखों में क्यों खटक रहे

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- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, कराची
पाकिस्तान में किसी जज का विवादों में पड़ना कोई नई बात नहीं है. पूर्व चीफ़ जस्टिस चौधरी इफ़्तिख़ार से लेकर जस्टिस जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा तक इसकी लंबी परंपरा रही है.
जस्टिस क़ाज़ी ईसा का मामला इसलिए भी ग़ैरमामूली है क्योंकि देश की सुप्रीम जूडिशल काउंसिल जस्टिस क़ाज़ी और एक अन्य जज के ख़िलाफ़ सुनवाई कर रही है.
जस्टिस क़ाज़ी पर ये इल्ज़ाम है कि उन्हें अपनी बीवी और बच्चों के नाम ब्रिटेन में तीन प्रॉपर्टी ख़रीद रखी हैं और इसका जिक्र उन्होंने अपने हलफ़नामे में नहीं किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जस्टिस ईसा ने ना केवल सेना की 'पॉलिटिकल इंजीनियरिंग' पर सवाल उठाए बल्कि अपनी शपथ का उल्लंघन करने वाले सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई करने का भी आदेश दिया.
लाहौर स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार जाहिद मुख्तार ने इंडिया लीगल को बताया कि जस्टिस ईसा ने 2017 में तहरीक-ए-लबाइक पाकिस्तान (TLP) के फैजाबाद धरने में जो फैसला दिया था, उससे सेना की नजरें टेढ़ी हो गई थीं.
धरने का उद्देश्य तत्कालीन नवाज़ शरीफ़ की सरकार को कमज़ोर कर देना था लेकिन यह नियंत्रण से बाहर हो गया और TLP कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय राजमार्ग ब्लॉक कर दिए. हिंसा और दंगे भड़क गए.
इस मामले की सुनवाई करने वाली दो सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट बेंच की अध्यक्षता जस्टिस ईसा कर रहे थे. 2019 में उन्होंने अपने फैसले में आर्मी खासकर ISI की कड़ी आलोचना की. सेना को फटकार लगाते हुए जस्टिस ईसा ने सरकार, इंटेलिजेंस एजेंसी और पाकिस्तान के चुनाव आयोग की तरफ से हुई गलतियों को भी चिह्नित किया. लेकिन सबसे सख्त शब्द आर्मी के ही खिलाफ इस्तेमाल किए गए थे.
इसके अलावा, जस्टिस ईसा ने अपने फैसले में पाकिस्तान की सरकार के रक्षा मंत्रालय और सेना प्रमुखों को शपथ का उल्लंघन करने वाले जवानों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश दिया.
पिछले कई दिनों से पाकिस्तान के क़ानूनी गलियारों में जस्टिस क़ाज़ी का मामला छाया हुआ है. पाकिस्तान की वकील बिरादरी इस मसले पर बंटी हुई है.
दो जुलाई को जिस दिन जस्टिस क़ाज़ी के मामले की सुनवाई थी, पाकिस्तान बार एसोसिएशन ने इसे काला दिन के तौर पर मनाने की घोषणा की.
इसके ठीक एक दिन पहले सोमवार को वकीलों की संस्था लॉयर्स एक्शन कमिटी ने मीटिंग बुलाकर पाकिस्तान बार एसोसिएशन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया.

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कौन हैं जस्टिस क़ाज़ी
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा कोई पहली बार विवादों में नहीं हैं. हाई कोर्ट में तैनाती से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इन्हें कई बार वकील समुदाय और दूसरी सरकारी संस्थाओं के विरोध का सामना करना पड़ा है.
कराची में हुए बवाल को लेकर जब पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की थी तो उस वक़्त क़ाज़ी ईसा पूर्व मुख्य न्यायाधीश चौधरी इफ़्तिख़ार की अदालत में सहायता के लिए पेश हुए थे.
दोनों का तालमेल कुछ यूं बना रहा कि जैसे ही अंतरिम संवैधानिक आदेश के तहत शपथ लेने वाले जज बर्ख़ास्त हुए बैरिस्टर क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा की बलूचिस्तान हाई कोर्ट के जज के तौर पर नियुक्ति कर दी गई.
इससे पहले वो रिज़वी, ईसा इंजीला लॉ फॉर्म के पार्टनर थे. याद रहे कि इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी ने भी क्वेटा से ही अदालती करियर की शुरुआत की थी.
जस्टिस क़ाज़ी ईसा जब बलूचिस्तान हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के पद पर बैठे तो बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (मिंगल) ने इनकी नियुक्ति के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक पिटीशन फ़ाइल की.
पिटीशन में ये कहा गया था कि जस्टिस फ़ाएज़ ईसा की नियुक्ति संविधान के ख़िलाफ़ है क्योंकि किसी की भी बतौर जज नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में दस साल की प्रैक्टिस का तजुर्बा होना ज़रूरी है.
इनकी नियुक्ति एडहॉक बुनियादों पर हुई थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस साक़िब निसार ने इस आवेदन को ख़ारिज कर दिया था.

बलूचिस्तान के राजनीतिक घरानों से संबंध
जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा के पूर्वजों का संबंध अफ़ग़ानिस्तान के इलाक़े कंधार से था. बाद में वो बलूचिस्तान के इलाक़े पशीन में आकर आबाद हुए.
इनके दादा क़ाज़ी जलालुद्दीन क़लात रियासत के प्रधानमंत्री रहे जबकि पिता क़ाज़ी मोहम्मद ईसा तहरीक-ए-पाकिस्तान के कद्दावर लीडर थे.
उन्हें ऑल इंडिया मुस्लिम लीग बलूचिस्तान का पहला अध्यक्ष होने का सम्मान हासिल था. बाद में जब पाकिस्तान की स्थापना के लिए रेफ़रेंडम हुआ तो उन्होंने इसमें भरपूर तहरीक चलाई.
अमरीका और भारत में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत और संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधी रहे अशरफ़ क़ाज़ी इनके चचेरे भाई हैं जबकि दिवंगत बलूच क़ौम परस्त रहनुमा नवाब ख़ैर बख़्श से भी इनकी रिश्तेदारी थी.
क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा की पैदाइश 26 अक्टूबर, 1959 को क्वेटा में हुई. इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वहीं से हासिल की. बाद में कराची ग्रामर स्कूल से 'ओ' और 'ए' लेवल क्वॉलिफ़ाई किया और क़ानून की तालीम हासिल करने लंदन चले गए, जहां से 1985 में वापस आए और बलूचिस्तान हाई कोर्ट के वकील के तौर पर काम करने लगे.



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सियासत से दूर वकालत
बलूचिस्तान हाई कोर्ट के अलावा वो सिंध हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और शरीअत कोर्ट में पेश हुए थे जबकि कई बार अदालत में बतौर एमिकस क्यूरी (मददगार) भी तलब किए गए. वो बलूचिस्तान और सिंध हाई कोर्ट के अलावा सुप्रीम कोर्ट के सदस्य तो रहे लेकिन बार काउंसिल की सक्रिय सियासत से दूर रहे.
क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा जनहित याचिका भी दायर करते रहे जबकि बैंकिंग, पर्यावरण और सिविल लॉ में इनकी महारत है. वो वर्ल्ड बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक के पदों पर क़ानूनी सहायक रहे हैं. इन पदों में कराची मास ट्रांजिट, हाइवे फाइनैंसिंग एंड ऑपरेशन, बलूचिस्तान ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज़ शामिल हैं.
बलूचिस्तान हाई कोर्ट में बतौर जज तैनात होने से पहले वो अंग्रेज़ी अख़बारों में संविधान और क़ानून, इतिहास और पर्यावरण पर विश्लेषणात्मक लेख भी लिखते थे. इसके अलावा 'मास मीडिया लॉ एंड रेगूलेशन' के सह-लेखक, 'बलूचिस्तान केस एंड डिमांड' के भी लेखक हैं.

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सरकार और संस्थाओं पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने क्वेटा बम धमाके की जांच के लिए एक कमीशन का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा को दी गई थी. साल 2016 में क्वेटा सिविल अस्पताल में आत्मघाती हमले में 70 लोगों की मौत हुई थी.
कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में सिक्योरिटी संस्थाओं के कामों पर सवाल उठाए और साथ में चरमपंथी संगठनों की सरगर्मियों पर भी चिंता व्यक्त की. कमीशन ने रिपोर्ट में कहा था कि सरकार आतंकवाद के ख़ात्मे के क़ानून पर पालन करते हुए चरमपंथियों और उनके संगठनों को तुरंत प्रतिबंधित करे.
कमीशन ने नेशनल एक्शन प्लान को मुनासिब तरीक़े से लागू करने की ज़रूरत पर ज़ोर देने के साथ आतंकवाद से मुक़ाबले की बनी संस्था नेक्टा के ख़राब प्रदर्शन की आलोचना की थी.
कमीशन ने उस वक़्त के संघीय आंतरिक मंत्री चौधरी निसार से चरमपंथी संगठन अहले सुन्नत और अल-जमाअत के सरबराह अल्लामा यूसुफ़ लुधियानवी से मुलाक़ात पर भी सवाल उठाया था.
चौधरी निसार का कहना था कि वो पाकिस्तान डिफेंस काउंसिल के प्रतिनिधिमंडल के साथ आए थे जिसकी अध्यक्षता मौलाना समीउल हक़ कर रहे थे. चौधरी निसार ने आरोपों को निजी क़रार दिया था. सरकार ने कमीशन की रिपोर्ट पर संशोधन के लिए आवेदन दायर करने का ऐलान किया.
फ़ौजी अदालतों की स्थापना का विरोध
सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट ने जब 2015 में चीफ़ जस्टिस नासिर अलमक की अध्यक्षता में फौजी अदालतों की स्थापना के हक़ में फ़ैसला दिया तो जस्टिस क़ाज़ी ईसा उन 6 जजों में शामिल थे, जिन्होंने फौजी अदालतों की स्थापना का विरोध किया था.
इन जजों की राय थी कि इन अदालतों की स्थापना न्यायपालिका की आज़ादी और मानव अधिकारों का उल्लंघन है. हालांकि मुस्लिम लीग (एन) की सरकार ने इस फ़ैसले को जीत क़रार दिया था और कहा था कि इन अदालतों की मदद से चरमपंथ का ख़ात्मा किया जाएगा.
स्व-अधिसूचना पर आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी के बाद चीफ़ जस्टिस साक़िब निसार ने सबसे ज़्यादा स्वतः संज्ञान लिए, जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने इस कार्रवाई पर आपत्ति की थी.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस साक़िब निसार के साथ पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल हमले केस की स्वतः संज्ञान नोटिस की सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के ह्यूमन राइट्स सेल के पास सीधे कोई अख़्तियार नहीं कि आवेदन को स्व-अधिसूचना में तब्दील किया जाए. उन्होंने आपत्ति की कि आर्टिकल 184 (3) के तहत पहले सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर ज़रूरी है.
इसी सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस साक़िब निसार ने अचानक अदालत बर्ख़ास्त कर दी और कुछ देर बाद जब अदालत दुबारा लगी तो बेंच में जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा शामिल नहीं थे.
फौजी को कार्रवाई का आदेश
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 'तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान' के धरने के ख़िलाफ़ स्वतः संज्ञान नोटिस के फैसले ने सिविल ऑर्गनाइज़ेशन के साथ सैन्य संगठनों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया.
तहरीक-ए-लब्बैक ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के संगम पर स्थित फ़ैज़ाबाद इंटरचेंज पर चुनावी हलफ़नामे में 'ख़त्म-ए-नबूव्वत' के हवाले से विवादित संशोधन के ख़िलाफ़ नवम्बर 2017 में धरना दिया था जो क़ानून मंत्री ज़ाहिद हामिद के इस्तीफ़े के बाद समाप्त हुआ था.
जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा और जस्टिस मुशीर आलम की दो सदस्यी बेंच ने अपने फ़ैसले में सरकार को आदेश दिया है कि वो ऐसे फौजी अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे जिन्होंने अपनी शपथ का उल्लंघन करते हुए राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया था.
अदालत ने आर्मी चीफ़, और नौसेना और वायु सेना बल के अध्यक्षों को रक्षा मंत्रालय के माध्यम से आदेश दिया कि वो फौज के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें जिन्होंने अपनी शपथ को दरकिनार करते हुए किसी राजनीतिक दल या गुट का समर्थन किया था.
अदालत ने आईएसआई, मिलिट्री इंटेलीजेंस और इंटेलीजेंस ब्यूरो के अलावा पाकिस्तानी फौज के जनसंपर्क विभाग को भी हिदायत की है कि वो अपने दायरे में रहते हुए काम करें.


पाकिस्तान का वकील समुदाय बँटा
फ़ैज़ाबाद धरने के फ़ैसले पर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा के समर्थन और विरोध पर वकील समुदाय बँट गया.
इस फ़ैसले पर पंजाब बार काउंसिल ने नाराज़गी का इज़हार करते हुए इन्हें हटाने की मांग की.
पंजाब बार काउंसिल ने आरोप लगाया कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने फ़ैज़ाबाद धरना केस का फ़ैसला सुनाते हुए क़ानून के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन किया है.
बार काउंसिल का ये भी दावा था कि पाकिस्तान की फ़ौज और आईएसआई ने देश के अस्तित्व और स्थिरता के ख़ातिर चरमपंथ के ख़िलाफ़ कामयाब जंग करते हुए शहरियों की जान व माल को महफ़ूज़ करने का कारनामा अंजाम दिया है.
मगर जस्टिस फ़ाएज़ ईसा ने फौज और आईएसआई के उस महान चरित्र की तारीफ़ करने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के सिक्योरिटी एजेंसियों को बग़ैर किसी सबूत के दोषी ठहरा कर मुल्क की दुश्मन ताक़तों को पाकिस्तान की रक्षा एजेंसियों के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा करने का अवसर उपलब्ध करा दिया है.
पंजाब बार काउंसिल के मांग की सिंध बार काउंसिल, हाई कोर्ट बार, कराची और मलेर बार ने निंदा की और जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा के हक़ में संकल्प पत्र मंज़ूर किया.
सिंध की बार काउंसिल ने संयुक्त संकल्प पत्र में कहा कि कुछ अनोखी ताक़तें अदालत को दबाव में लाना चाहती हैं. पंजाब बार कठपुतलियों की भी कठपुतली का किरदार अदा कर रही है जबकि सिंध का तमाम वकील समुदाय इस सैधांतिक राय के साथ खड़ा है.
पाकिस्तान बार काउंसिल ने भी पंजाब बार काउंसिल की मांग को खारिज किया और क़रार दिया कि किसी भी संस्था को अदालत की आज़ादी का खून करने की इजाज़त नहीं देंगे.
देश के मशहूर वकील और पूर्व जज जस्टिस रशीद ए रिज़वी का कहना है कि अगर जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा को हटाया गया तो 2007 से भी बड़ी तहरीक चलाई जाएगी. याद रहे कि वो तहरीक जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी की बहाली के लिए चलाई गई थी.
स्पष्ट रहे कि जस्टिस क़ाज़ी फ़ाएज़ ईसा ने सदर पाकिस्तान को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि उनकी जानकारी के मुताबिक़ सराकारी सूत्र कह रहे हैं कि उनके ख़िलाफ़ संविधान के आर्टिकल 209 के तहत रेफ्रेंस दायर किया गया है.
"मैं शुक्रगुज़ार रहूंगा अगर आप मुझे बता सकें कि क्या ये दुरूस्त है और अगर ऐसा है तो मुझे उसकी कॉपी उपलब्ध कराई जाए."
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