पाकिस्तान में पोलियो के ख़िलाफ़ आख़िरी जंग

पोलियो ड्रॉप्स
    • Author, शुमायला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान

उस बच्ची की उम्र पांच बरस से ज़्यादा नहीं है. वो अपने कमरे में छुपकर बस रोए जा रही है.

'मैं मरना नहीं चाहती'. वो रोते हुए कहती है.

उसके मां-बाप आख़िरकार बच्ची को ये समझाने में कामयाब हो गए कि टीका सुरक्षित है. उसे कमरे से बाहर लाया जाता है, ताकि वो देखे कि उसके भाई-बहन अपनी जीभ निकालकर किस तरह से वैक्सीन ले रहे हैं.

लेकिन, बच्ची का रोना जारी है. घर में डर का माहौल साफ़ दिखता है. इससे पहले पोलियो कार्यकर्ताओं को बच्ची के हथियारबंद रिश्तेदारों ने भगा दिया था. इसके बाद पोलियो का टीका लगाने वाली टीम ने सरकारी स्वास्थ्य सलाहकार डॉक्टर उज़्मा हयात ख़ान से मदद मांगी.

एक मां और बच्ची के साथ डॉक्टर उज़्मा ख़ान
इमेज कैप्शन, एक मां और बच्ची के साथ डॉक्टर उज़्मा ख़ान

उज़्मा, देश में पोलियो टीकाकरण अभियान की निगरानी करती हैं. वो टीका लगाने का विरोध करने वाले ऐसे लोगों से निपटने का काफ़ी अनुभव रखती हैं. लेकिन, ख़ुद उज़्मा भी इस घर के पास जाते हुए थोड़ी नर्वस थीं.

उनका सामना उन लोगों से हुआ जो उज़्मा को किसी भी क़ीमत पर घर के भीतर नहीं जाने देना चाहते थे. ये टकराव तब जाकर ख़त्म हुआ जब एक और रिश्तेदार वहां पहुंचे. वो रिश्तेदार ख़ुद भी डॉक्टर हैं.

इसके बाद जाकर पोलियो टीकाकरण अभियान की टीम सभी बच्चों को टीका लगा सकी. उसमें भी वो रोती हुई बच्ची बच गई थी. तब पोलियो टीकाकरण टीम ने तय किया वो बच्ची को अगले दिन टीका लगाने की कोशिश करेंगे.

पाकिस्तान में पोलियो वैक्सीन को लेकर लोगों में बहुत विरोध है. वो ये जानते हैं कि इससे ज़िंदगी बचाने में मदद मिलती है.

फिर भी पोलियो टीकाकरण का पाकिस्तान में बहुत विरोध होता है. इस बार तो तनाव और भी बहुत बढ़ गया था.

स्वास्थ्य सलाहकार, डॉक्टर उज़्मा हयात ख़ान
इमेज कैप्शन, बच्चों के अभिभावकों को टीकाकरण के फायदों के बारे में समझाती हुईं डॉक्टर उज़्मा हयात ख़ान

टीकों को लेकर संदेह का माहौल

पोलियो टीकाकरण टीम के पेशावर के इस इलाक़े में आने के एक दिन पहले भयंकर हिंसा और आग़ज़नी हुई थी.

मशोखेल गांव के मुखिया ने पहले तो अपने गांव में पोलियो का टीका देने वाली टीम को घुसने देने से ही मना कर दिया था. लेकिन, इस बार वो सरकारी दबाव के आगे झुक गया था. और, गांव में टीकाकरण अभियान चलाया गया था.

लेकिन, टीका दिए जाने के कुछ देर बाद ही गांव के मुखिया ने बच्चों के मां-बाप को फ़ोन किया और कहा कि उनके बच्चों को उल्टी हो रही है. वो बेहोश हो रहे हैं.

डॉक्टर उज़्मा हयात ख़ान

मशोखेल गांव के दर्जनों छात्रों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. इनमें से किसी में भी उल्टी या बेहोशी के लक्षण नहीं पाए गए और उन्हें अस्पताल से जाने दिया गया था.

लेकिन, तब तक तो अफ़वाहें फैलने से रोकने में बहुत देर हो चुकी थी. सोशल मीडिया के ज़रिए पूरे इलाक़े में डर को फैला दिया गया था.

नाराज़ मां-बाप इलाक़े के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के बाहर जमा हो गए थे. उन्होंने हथौड़ों और लाठी-डंडों से उसकी दीवार तोड़ दी.

सामने का दरवाज़ा गिरा दिया और अंदर घुसकर इमारत को आग लगा दी. ये सारी वारदात को स्थानीय टीवी चैनल पर लाइव दिखाया गया था.

इससे पूरे पेशावर में दहशत फैल गई थी.

पाकिस्तान टीकाकरण

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इमेज कैप्शन, अप्रैल में पोलियो टीकाकरण के बाद बच्चों के बीमार होने की अफ़वाह तूल पकड़ने लगी. इससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई. अप्रैल 2019 की इस तस्वीर में एक पिता पोलियो ड्रॉप्स पिलाने के तुरंत बाद अपने बेटे को लेकर अस्पताल जा रहे हैं
पाकिस्तान टीकाकरण

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इमेज कैप्शन, पेशावर में अफ़वाह के कारण दहशत फैली और गुस्साई भीड़ ने सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर हमला कर दिया.

अफ़वाह का असर पड़ा टीकाकरण अभियान पर

कुल मिलाकर, क़रीब तीस हज़ार बच्चों को टीका लगाने के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा था. सूबे की सरकार के एक मंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि इस भगदड़ में स्थानीय मस्जिदों ने भी बड़ा रोल निभाया.

मस्जिदों से ऐलान किए गए थे कि लोग टीका लगवाने वाले अपने बच्चों को अस्पताल ले जाकर उनकी जांच कराएं. जबकि जांच में किसी भी बच्चे को कोई परेशानी नहीं थी. सभी सुरक्षित थे.

भले ही किसी बच्चे को कोई परेशानी न हुई हो, लेकिन इस घटना ने पाकिस्तान के पोलियो टीकाकरण अभियान को कमोबेश पटरी से ही उतार दिया. अप्रैल में टीकाकरण के तीन दिन के अभियान में तीन लोगों की मौत हो गई. इनमें से एक पोलियो टीकाकरण का कार्यकर्ता था और दो पुलिसवाले थे, जो टीकाकरण करने वाली टीम के साथ गए थे.

डॉक्टर उज़्मा की टीम के एक सदस्य ने बताया कि, "लोग सड़कों पर हमें परेशान कर रहे थे, इससे पहले से ही मुश्किलों का सामना कर रहे टीकाकरण अभियान को और झटका लगा. गांव के दुकानदारों ने हमें भगा दिया. उनमें से एक ने तो कहा कि तुम हमारे बच्चों को ज़हर दे रहे हों."

इस घटना के बाद सरकार ने माहौल ख़राब होने की वजह से पोलियो टीकाकरण का राष्ट्रीय अभियान हालात सामान्य होने तक स्थगित कर दिया.

लेकिन, टीकाकरण बहुत ज़रूरी है. बचपन की एक ख़तरनाक बीमारी पोलियो से निपटने के लिए टीका लगाना ही सबसे सुरक्षित उपाय है.

पोलियो की बीमारी बच्चों के नर्वस सिस्टम पर हमला कर दी है. हर 200 में से एक बच्चा इस बीमारी से विकलांग हो जाता है. अगर पोलियो का वायरस फेफड़े पर हमला कर दे, तो ये बीमारी जानलेवा भी हो सकती है. इसका कोई इलाज नहीं है.

बीबीसी
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क्या पाकिस्तान हो पाएगा पोलियो मुक्त?

टीकाकरण की वजह से दुनिया के ज़्यादातर इलाक़ों से इस बीमारी को मिटाने में कामयाबी मिली है. आज की तारीख़ में केवल तीन देशों में पोलियो के मरीज़ पाए जाते हैं. पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान और नाइजीरिया.

नाइजीरिया में अगस्त 2016 से पोलियो का कोई मरीज़ नहीं मिला है. जल्द ही उसे पोलियो मुक्त घोषित कर दिए जाने की संभावना है.

पाकिस्तान में भी पोलियो से मुक्ति का अभियान कमोबेश पटरी पर ही है. लेकिन, इसे पोलियो मुक्त घोषित किए जाने से पहले ही ये हंगामा हो गया. इस साल टीकाकरण अभियान बहुत निराशाजनक रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक बयान जारी कर के कहा है कि, "हम इस बात से बहुत चिंतित हैं कि पोलियो के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की लड़ाई ग़लत दिशा में जा रही है."

पोलियो के टीके
पाकिस्तान टीकाकरण
इमेज कैप्शन, पोलियो के टीकों के बारे में हो रही एक बैठक में हिस्सा लेती महिलाएं

पाकिस्तान की सरकार ने इस महीने की शुरुआत में पोलियो के 21 मरीज़ पाए जाने की बात क़बूली है. इनमें जंगली पोलियो वायरस यानी WPV1. जबकि 2017 में पाकिस्तान में पोलियो के केवल 8 मरीज़ पाए गए थे.

अब टीकाकरण अभियान का विरोध पोलियो के ख़ात्मे की राह में रोड़ा बन सकता है.

डॉक्टर उज़्मा कहती हैं कि, 'मैं जब भी किसी का दरवाज़ा खटखटाती हूं, मुझे पता नहीं होता कि उस घर से कैसा जवाब मिलेगा.'

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चैप्टर 2:गोलीबारी

ये बात 18 दिसंबर 2012 की है. पोलियो कार्यकर्ता गुलनाज़ अपने घर में ही थी, जब उसकी मां ने गोलियों की आवाज़ सुनी. उसकी मां को बड़ी चिंता हुई. लेकिन, गुलनाज़ ने उसे ढाढस बंधाया. गुलनाज़ ने अपनी मां से कहा कि लोग शादी का जश्न मना रहे हैं.

फिर गुलनाज़ को पड़ोस में आने का संदेश मिला. उस इलाक़े में गुलनाज़ की भतीजी मदीहा और उसकी भाभी फहमीदा बच्चों को पोलियो के टीके लगा रही थीं.

पाकिस्तान में पोलियो अभियान में कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाली गुलनाज़
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में पोलियो अभियान में कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाली गुलनाज़ कहती हैं कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं थी कि इस काम में जोखिम भी है.

जब गुलनाज़ वहां पहुंची, तो उसका सामना गुस्से से भरी भारी भीड़ से हुआ. वहां पर पुलिस भी थी और एम्बुलेंस भी थी. स्ट्रेचर पर एक शव रखा हुआ था. गुलनाज़ उस दिन को याद कर के कहती हैं कि, 'शव ढंका हुआ था, पर मैंने लटकती हुई कलाई देखकर पहचान लिया था कि वो शव मेरी भतीजी मदीहा का था.'

गुलनाज़ वहां से भागने लगी, तभी उसने देखा कि उसकी भाभी फहमीदा की लाश ख़ून के ढेर में पड़ी थी. उसे भी गोली मार दी गई थी. गुलनाज़ ने कहा कि, 'मेरी दुनिया ही लुट गई थी, तबाह हो गई थी.'

गुलनाज़, पोलियो के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की लड़ाई की 2 लाख 62 हज़ार कार्यकर्ताओं की टीम की एक सदस्य हैं. गुलनाज़ ने अपनी भाभी फहमीदा और भतीजी मदीहा के साथ 2011 में कराची में पोलियो टीकाकरण अभियान से जुड़ी थीं. टीकाकरण अभियान के दौरान वो घर-घर जाकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों को पोलियो का टीका लगाती थीं.

पाकिस्तान की 70 फ़ीसद पोलियो कार्यकर्ता महिलाएं हैं. महिलाओं को लोग अपने घरों में घुसने की इजाज़त आसानी से दे देते हैं. इस काम से कम पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी सम्मान के साथ कुछ पैसे कमाने का मौक़ा मिलता है, जो किसी और काम में मिलता है.

लेकिन, गुलनाज़ कहती हैं कि उन्होंने इसके ख़तरों का ठीक से आकलन नहीं किया था.

गुलनाज़ कहती हैं कि, 'मैं ने कभी नहीं सोचा था कि वाक़ई इसमें जान का ख़तरा है.'

2012 में पोलियो टीकाकरण अभियान से जुड़े पांच लोगों की 20 मिनट के अंतराल में हत्या कर दी गई थी. मदीहा और फ़हमीदा इनमें शामिल थीं. कराची में ऐसे तीन हमले टीका लगाने वाली टीम पर हुए थे. वहीं एक टीम को पेशावर में निशाना बनाया गया था. वहीं, अगले दिन चार पोलियो कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई थी.

इस घटना के बाद गुलनाज़ का परिवार उन पर दबाव डालने लगा कि वो कोई और काम करने लगा.

लेकिन गुलनाज़ कहती हैं कि उस दुखद घटना के बाद उनके इरादे और मज़बूत हो गए.

वो कहती हैं कि 'किसी को डर के आगे हार नहीं माननी चाहिए, वरना आप कुछ नहीं कर पाएंगे.'

गुलनाज़

लेकिन, टीकाकरण अभियान से जुड़े होने की गुलनाज़ को भारी क़ीमत चुकानी पड़ी. पड़ोसियों के दबाव के चलते उन्हें अपना घर बदलकर दूसरे इलाक़े में रिहाइश बनानी पड़ी. वो हर वक़्त एक और हमले के डर की शिकार रहती थीं.

गुलनाज़ अक्सर रास्ता बदलकर अपने काम पर जाती थीं. गुलनाज़ कहती हैं कि, "शुरुआत में मुझे इतना डर लगता था कि अगर राह चलते हुए मेरे क़रीब से कोई बाइक गुज़र जाती थी, तो भी मैं कांप जाती थी."

पाकिस्तान टीकाकरण
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में पोलियो कार्यकर्ताओं को पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ रही है. अप्रैल 2016 में ली गई ये तस्वीर क्वेटा की है जिसमें पाकिस्तानी पुलिसकर्मी पोलियो कार्यकर्ताओं को काम के दौरान सुरक्षा दे रहे हैं.

गुलनाज़ के परिवार पर जो क़यामत गुज़री, वो पोलियो टीकाकरण से जुड़े कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ हिंसक अभियान की शुरुआत थी. 2012 से अब तक पाकिस्तान में पोलियो टीकाकरण से जुड़े 94 कार्यकर्ताओं और सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है. 2012 में पाकिस्तान में केवल 58 पोलियो केस पाए गए थे. लेकिन 2014 तक इस मर्ज़ के 307 मामले दर्ज किए गए थे.

जून 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ने सुझाव दिया था कि हर पाकिस्तानी नागरिक को दूसरे देश में जाने पर हवाई अड्डे पर ही पोलियो का टीका दिया जाए, ताकि पोलियो की बीमारी दूसरे देशों में न फैले.

पाकिस्तान के अधिकारियों ने पोलियो के ख़िलाफ़ 'जंग' छेड़ने का ऐलान कर दिया. टीका लगाने वाली टीमों को ज़्यादा सुरक्षा दी जाने लगी. संवेदनशील इलाक़ों में टीकाकरण करने जाने वाले लोगों को और भी सुरक्षा दी जाने लगी. पुलिस की टीमें उनके साथ भेजी जाने लगीं.

टीका लगाने का विरोध करने वाले सैकड़ों बच्चों की जान ख़तरे में डालने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया.

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चैप्टर 3: टीकाकरण का विरोध करने वाले

पाकिस्तान में टीकाकरण का विरोध एक दशक से भी ज़्यादा पुराना है. वहां मां-बाप के दिलों में पोलियो के टीकाकरण को लेकर डर बैठा हुआ है.

इसकी शुरुआत वर्ष 2000 से हुई थी. टीकाकरण अभियान शुरू हुए तब एक बरस ही हुआ था, जब पाकिस्तान में एक नया तालिबानी कमांडर उभरा.

मुल्ला फ़ज़लुल्लाह, कट्टरपंथी नेता था. उसने 2007 में पाकिस्तान की स्वात घाटी पर क़ब्ज़ा जमा लिया और अपने इलाक़े में टीकाकरण पर पाबंदी लगा दी.

वो, पाकिस्तानी तालिबान का नेता बन गया था. उसी ने 2012 में स्कूली छात्रा मलाला यूसुफ़ज़ई की हत्या का फ़रमान दिया था.

2007 में मुल्ला फ़ज़लुल्लाह रेडियो मुल्ला के नाम से मशहूर हो गया था. क्योंकि उसने स्वात घाटी में अपने भाषण के प्रसारण के लिए कई रेडियो ट्रांसमिटर लगा दिए थे. वो पोलियो के टीके लगाने के ख़िलाफ़ तक़रीरें देता था. रेडियो मुल्ला कहता था कि पोलियो टीकाकरण असल में पश्चिमी देशों की साज़िश है ताकि वो मुसलमानों की नसबंदी कर दें.

पाकिस्तान में तालिबान के पूर्व प्रमुख मुल्ला फ़ज़लुल्लाह

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में तालिबान के पूर्व प्रमुख मुल्ला फ़ज़लुल्लाह लाउडस्पीकर पर टीकाकरण विरोधी संदेश देते रहे हैं.

मुल्ला फ़ज़लुल्लाह के इस वाहियात दावे से बहुत तनाव फैल गया. इसे 2011 में हुई एक और घटना ने हवा दे दी.

मई 2011 में अमरीका पर 9/11 हमले की साज़िश रचने वाले अल-क़ायदा नेता ओसामा बिन लादेन को अमरीकी कमांडो ने मार गिराया. इसके कुछ दिनों बाद ही एक पाकिस्तानी डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया.

डॉक्टर शकील अफ़रीदी पर आरोप था कि उसने ओसामा बिन लादेन का ठिकाना तलाशने में सीआईए की मदद की थी. इसके लिए उसने अवैध टीकाकरण अभियान का सहारा लिया था. इसके लिए वो घर-घर जाकर बच्चों को पोलियो का टीका लगा रहा था, ताकि ओसामा बिन लादेन को तलाश सके. इस घटना से भी पोलियो के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के अभियान को तगड़ा झटका लगा.

इसके बाद 2012 में अमरीका ने ड्रोन हमलों की मदद से पाकिस्तान के क़बाइली इलाक़े में आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया. तब तालिबान के कमांडरों ने उत्तरी और दक्षिणी वज़ीरिस्तान में पोलियो टीकाकरण अभियान पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी. उन्होंने आरोप लगाया कि पोलियो टीकाकरण से जुड़े कार्यकर्ता अमरीका के लिए जासूसी कर रहे थे.

ये पाबंदी तब जाकर हटी, जब पाकिस्तान की फौज ने तालिबान के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों को उनसे छीनने में कामयाबी हासिल की. लेकिन, इसके बाद मुल्लाओं ने धर्म की आड़ में टीकाकरण के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान छेड़ दिया और टीकाकरण के ख़िलाफ़ अविश्वास बढ़ाने का काम किया.

मौलवियों ने टीकाकरण के ख़िलाफ़ फ़तवे जारी किए. उनका दावा था कि टीके में जो रसायन है, वो इस्लाम में हराम है. क्योंकि उसमें सुअर का तेल मिला है. टीका लगने से बच्चे नपुंसक हो जाएंगे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे आरोपों से साफ़ इनकार करता है. लेकिन, मौलवियों का आरोप था कि महिला टीकाकरण कार्यकर्ता इस्लाम को बदनाम कर रही हैं और मुस्लिम मर्दों को उनसे ज़बरदस्ती निकाह कर लेना चाहिए.

पाकिस्तानी मौलवी हमीदुल्ला हमीदी
इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी मौलवी हमीदुल्ला हमीदी ने फ़ैसला कया कि वो कभी टीकाकरण का विरोध नहीं करेंगे

ऐसे फ़तवे जारी करने वालों में एक है मुल्ला हमीदुल्ला हमीदी.

हमीदी अपनी उम्र के तीसरे दशक में है. वो अपने सहन में एक सायेदार जगह पर बैठते है. सूरज बहुत तेज़ तप रहा है. लेकिन, ठंडी हवा से आस-पास के अनार के पेड़ों की टहनियां हिल रही हैं. उनमें सुर्ख़ फूल लगे हुए हैं.

अपनी कहानी बताते हुए मुल्ला हमीदुल्ला थोड़ा नर्वस लगते हैं.

हमीदुल्ला कहते हैं कि, "मैंने अपने घर के बुज़ुर्गों से सुना था कि टीका बुरी चीज़ हैं. ये मुसलमानों का ख़ात्मा करने की पश्चिमी देशों की साज़िश है. इससे मुसलमान बच्चे नपुंसक हो जाएंगे. एक दिन पोलियो अभियान से जुड़े एक अधिकारी ने मुझे एक किताब दिखाई, जिसमें हर फ़िरक़े के बड़े मुफ़्तियों ने टीकाकरण के लिए फ़तवे दिए थे."

पाकिस्तानी मौलवी हमीदुल्ला हमीदी
इमेज कैप्शन, हमीदुल्ला हमीदी कहते हैं कि वो लोगों को टीकाकरण के फायदे समझाने के लिए इस्लाम की धार्मिक पुस्तकों का सहारा लेते हैं.

ज़्यादातर फ़तवे टीकाकरण के हक़ में थे, न कि उसके ख़िलाफ़.

इसके बाद मुल्ला हमीदी ने एक फ़ैसला लिया. उन्होंने अपने गांव के सभी मर्दों को मस्जिद में इकट्ठा किया और उन्हें बताया कि वो उन सभी मुफ़्तियों से ख़ुद मिलने जा रहें है, जिन्होंने इस टीकाकरण के पक्ष में फ़तवे दिए हैं.

इसके बाद मुल्ला हमीदी ने कराची, पेशावर, लाहौर, क्वेटा और दूसरे इलाक़ों का दौरा किया. वो मुस्लिम धार्मिक विद्वानों से भी मिले और उनसे इस बारे में मशविरा किया.

इस दौरे से लौटने के बाद मुल्ला हमीदी ने एक बड़ा फ़ैसला लिया. हमीदी ने बताया कि, "मैंने लोगों को दोपहर की नमाज़ पढ़वाई फिर ऐलान किया कि मुझे टीकाकरण से जुड़े सारे सवालों के जवाब मिल गए हैं. मैंने उन्हें बताया कि मुस्लिम विद्वानों को यक़ीन है कि पोलियो का टीका नुक़सानदेह नहीं है. हमें अपने बच्चों को बचाने के लिए ये टीका दिलवाना चाहिए, ताकि वो विकलांग न हों."

इसके बाद हमीदी ने अपने बच्चों को भीड़ के सामने ही पोलियो की वैक्सीन पिलाई.

मुल्ला हमीदी ने बताया कि वहां मौजूद सभी पुरुषों ने मेरे इस क़दम के बाद भरोसा दिया कि वो कभी भी टीकाकरण का विरोध नहीं करेंगे.

लेकिन, हमीदी के लिए असली चुनौती वो लोग थे, जो उसके गांव से बाहर, दूसरे गांवों में रहते थे.

मुल्ला हमीदी को उन गांवों में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था. कई बार तो जान से मारने की धमकियां भी दी गईं.

पाकिस्तान
इमेज कैप्शन, बलूचिस्तान में लंबे वक्त से टीकाकरण का विरोध होता रहा है

हमीदी ने बताया कि, "एक बार एक स्थानीय आदमी से मेरी बहस हो गई. वो तालिबान का समर्थक था. जैसे ही मैं घर लौटा, मेरा फ़ोन बजना शुरू हो गया. एक आदमी ने मुझे चेतावनी दी कि मैं टीकाकरण के अभियान से दूर ही रहूं. अगर मैंने उसकी चेतावनी को हल्के में लिया तो मेरी जान को ख़तरा हो सकता है."

मुल्ला हमीदी को कई महीनों तक ऐसे धमकी भरे फ़ोन आते रहे. वो बहुत परेशान हो गए. लेकिन, चिंता के पलों में भी मुल्ला हमीदी को कभी ये ख़याल नहीं आया कि वो टीकाकरण को लेकर जागरूकता फैलाने से पीछे हटें.

मुल्ला हमीदी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि, "मैं मुसलमान हूं. मुझे मौत से डर नहीं लगता. मुझे पता है कि जब तय है, तब मौत आएगी ही."

मुल्ला हमीदी का मिशन बहुत अहम है. उनका अपना क़स्बा क़िला अब्दुल्ला बलोचिस्तान सूबे में है. इस इलाक़े में तालिबान बहुत ताक़तवर है. क्योंकि ये इलाक़ा अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लगा हुआ है. इस इलाक़े में पोलियो के टीके के विरोध का लंबा इतिहास रहा है.

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हमीदी का कहना है कि स्थानीय लोगों के दिल में ये बात बैठा दी गई है कि टीकाकरण अभियान से जुड़ी एनजीओ के पीछे ईसाईयों का गुप्त एजेंडा है. वो लोगों को ईसाई बनाना चाहते हैं.

लेकिन, मुल्ला हमीदी का ये भी कहना है कि ज़्यादातर लोग इसलिए टीके का विरोध करते हैं क्योंकि वो चाहते हैं कि टीका लगवाने के बदले में उन्हें इनाम मिले.

हमीदी कहते हैं कि, 'बच्चों के मां-बाप चाहते हैं कि उन्हें बच्चों को टीका लगवाने का कुछ फ़ायदा सरकार दे. वो सड़कें, स्कूल और अस्पताल चाहते हैं. कुछ को तो पैसे की तलब भी है.'

विरोध के बावजूद, जब से मुल्ला हमीदी ने टीकाकरण का समर्थन करना शुरू किया, तब से क़िला अब्दुल्ला में पोलियो के मामले सामने आने में बहुत कमी आई है. 2017 से यहां पोलियो का कोई मरीज़ नहीं पाया गया है.

मुल्ला हमीदी मस्जिदों से होने वाले ऐलान के दौरान क़ुरान और दूसरे इस्लामिक धर्म ग्रंथों के हवाले से लोगों को साफ़-सफ़ाई का सबक़ देते हैं. उन्हें समझाते हैं कि बीमारी रोकने के लिए टीकाकरण बहुत ज़रूरी है.

मुल्ला हमीदी कहते हैं कि, "मेरा काम बहुत मुश्किल है. लेकिन जब भी मेरी कोशिश से एक बच्चे की जान भी बचती है, तो मुझे ये एहसास होता है कि इसके लिए मैंने जो जोख़िम लिया वो सही था."

चैप्टर 4: टीकाकरण के दूत

अबरार अपने बनावटी पैरों की मदद से बहुत संभल कर चलता है. तंग गलियों से गुज़रते वक़्त वो अपने शरीर का पूरा ज़ोर बैसाखी पर डाल कर चलता है. उसके हाथ में संतरी रंग का एक फ़ोल्डर है. वो एक दरवाज़े पर दस्तक देता है. कराची की भयंकर गर्मी में अबरार पसीने से तर-बतर है.

पोलियो के कारण अबरार ने अपने दोनों पैर गंवा दिए
इमेज कैप्शन, पोलियो के कारण अबरार ने अपने दोनों पैर गंवा दिए

एक लंबी दाढ़ी वाला इंसान दरवाज़ा खोलता है. ये उस इलाक़े के उन तमाम लोगों में से एक है, जिन्होंने अपने बच्चों को पोलियो का टीका लगवाने से मना कर दिया था.

अबरार को पोलियो की बीमारी 3 बरस की उम्र में ही हो गई थी. उसके दोनों पैर काटने पड़े थे.

अबरार का कहना है कि उसके अनपढ़ मां-बाप को टीके लगवाने की अहमियत का अंदाज़ा ही नहीं था.

अबरार
इमेज कैप्शन, अबरार लोगों से मिलते हैं और उन्हें टीकाकरण न करवाने से होने वाले नुक़सान के बारे में बताते हैं. वो उनकी सोच बदलने की कोशिश करते हैं.

अबरार, कराची के बल्दिया टाउन में रहते हैं. ये स्वात घाटी से बहुत दूर है. लेकिन, यहां पर तीन सौ परिवार रहते हैं, जो काम-धंधे की तलाश में क़रीब पचास साल पहले स्वात घाटी से कराची आकर बसे थे. उनके साथ टीकाकरण से इनकार की संस्कृति भी कराची चली आई.

शहर के सीवर में पोलियो का वायरस मौजूद है. जिस जगह पर बल्दिया टाउन बस्ती आबाद है, वो पोलियो के संक्रमण के जोखिम से भरा इलाक़ा माना जाता है. ये उस हाइवे के क़रीब है, जो बलूचिस्तान से होते हुए अफ़ग़ानिस्तान तक जाता है.

पाकिस्तान के बाल्दिया शहर में एक पिता जिन्हें टीके पर भरोसा नहीं
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के बाल्दिया शहर में एक पिता जिन्हें टीके पर भरोसा नहीं. ये अबरार की दलीलों से सहमत नहीं हैं.

जिस शख़्स ने अबरार की दस्तक पर दरवाज़ा खोला था, वो उसकी बातों से मुतमईन नहीं होता है.

तब अबरार अपने हाथ में पकड़े हुए फोल्डर से एक पर्चा निकालता है. वो शख़्स उस पर्चे पर एक नज़र डालता ज़रूर है, लेकिन अबरार के तर्कों का उस पर कोई असर नहीं होता.

वो अबरार से कहता है कि, "इस पर्चे में क्या लिखा है, मुझे उस पर कोई भरोसा नहीं. मुझे बस इतना पता है कि टीका लगने से मेरे बच्चे की रोगों से लड़ने की ताक़त ख़त्म हो जाएगी. आख़िर तुम लोग हमें अकेला क्यों नहीं छोड़ देते? तुम्हें हमारे बच्चों की इतनी फ़िक्र क्यों हो रही है भला?"

बीबीसी

मुंह से दी जाने वाली पोलियो की वैक्सीन के कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं. लेकिन, अबरार को अक्सर ऐसे शक भरे सवालों का सामना करना पड़ता है. फिर भी निराशा उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही है. वो उस आदमी को कुछ और दस्तावेज़ दिखाता है और फिर आगे बढ़ जाता है.

आख़िर, पाकिस्तान के उन अभिभावकों को कैसे समझाया जाए, जो अपने बच्चों को टीका न दिलवाने पर अड़े हुए हैं?

मरगला की हसीन हरी-भरी पहाड़ियों की तराई पर एक ऐसी इमारत है, जिसे भेदना कमोबेश नामुमकिन लगता है. इसके चारों तरफ़ बैरियर लगे हैं. हथियारबंद सुरक्षाकर्मी तैनात हैं. खोजी कुत्ते भी मौजूद हैं. वहां आने वाले हर शख़्स की गहन तलाशी ली जाती है, तब जाकर उन्हें अंदर जाने दिया जाता है.

ये आप को आर्मी की बैरक लग सकती है. लेकिन, असल में ये पाकिस्तान का नेशनल इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर है. यही इमारत देश के पोलियो उन्मूलन अभियान का मुख्यालय भी है.

इस अभियान के अगुवा हैं बाबर अता, जो पाकिस्तान के सबसे वरिष्ठ सरकारी अधिकारी हैं. वो अपने दफ़्तर में तमाम चार्ट और ग्राफ से घिरे हुए बैठे हैं और अधिकारियों से बात कर रहे हैं. उनके कमरे की एक दीवार पर विशाल नक़्शा है. उसमें रंगीन पिनें लगी हैं, जो पाकिस्तान के उन इलाक़ों को बताती हैं, जहां पोलियो का सबसे ज़्यादा ख़तरा है.

पाकिस्तान में पोलियो अभियान के प्रभारी बाबर अता
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में पोलियो अभियान के प्रभारी बाबर अता कहते हैं कि सरकार की कोशिश है कि वो टीकाकरण के बारे में अभिभावकों को जागरूक करें.

पाकिस्तान में 4 करोड़ से ज़्यादा बच्चे पांच साल से कम उम्र के हैं. पाकिस्तान की सरकार का कहना है कि हर साल 5 लाख से ज़्यादा बच्चों को टीका नहीं लग पाता है.

लेकिन, बाबर अता का मानना है कि इससे भी ज़्यादा बच्चों को हर साल टीका नहीं लग पाता. क्योंकि अगर पाकिस्तान में पोलियो का वायरस अभी भी मौजूद है, तो इसका यही मतलब है कि बड़ी तादाद में बच्चों को पोलियो का टीका नहीं लग पा रहा है.

बीबीसी

जिन बच्चों को टीका लगाया जाता है, उनके नाखून पर स्याही से निशान बना दिया जाता है. लेकिन, पोलियो के टीकाकरण अभियान के दूत अबरार ने मुझे बताया था कि सरकारी अधिकारी बहुत से ऐसे बच्चों के भी स्याही का निशान बना देते हैं, जिनके टीका नहीं लगता, ताकि वो ये बता सकें कि उन्होंने ज़्यादा बच्चों को पोलियो की दवा पिलाई.

बाबर अता भी मानते हैं कि ऐसा हो रहा है. वो कहते हैं कि, 'मैं पाकिस्तान के पोलियो अभियान से पिछले आठ साल से जुड़ा हुआ हूं. मैंने ही झूठी स्याही लगाने का ये फ़र्ज़ीवाड़ा पकड़ा था.'

बाबर अता कहते हैं कि सीआईए ने जो फ़र्ज़ी टीकाकरण अभियान चलाया था, उसकी वजह से आज बहुत से पाकिस्तानी टीकाकरण को शक की नज़र से देखते हैं.

पाकिस्तान टीकाकरण

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बाबर अता कहते हैं कि, 'सीआईए के अभियान की वजह से लोगों में अविश्वास पैदा हुआ है. वो सवाल करते हैं कि आख़िर पश्चिमी देशों, और ख़ास तौर से अमरीका को पोलियो की दवा पिलाने में इतनी दिलचस्पी क्यों है? हमें अगर इस अभियान को कामयाब बनाना है तो पश्चिमी देशों से इसके ताल्लुक़ को ख़त्म करना होगा.'

बाबर अता इस बात पर अडिग हैं कि सरकार टीकाकरण अभियान को लेकर कोई भी फ़ेक न्यूज़ बर्दाश्त नहीं करेगी. कुछ हफ़्ते पहले ही मैं उनसे मिली थी. जब उन्होंने एलान किया था कि सरकार ने पेशावर में सात कर्मचारियों को निलंबित कर दिया था. क्योंकि वो टीकाकरण के ख़िलाफ़ लोगों को लामबंद कर रहे थे.

गुलनाज़

बाबर अता को लगता है कि पोलियो अभियान को कामयाब बनाने के लिए मां-बाप के दिल-दिमाग़ जीतने होंगे.

वो कहते हैं कि, 'हमें आवाम का भरोसा जीतना होगा. ये मां-बाप का अधिकार है कि वो सवाल करें और ये सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो उनके सवालों के सही जवाब ईमानदारी से दे.'

पोलियो अभियान की कामयाबी, गुलनाज़ जैसी स्वास्थ्य कर्मचारियों के कंधों पर टिकी है, जो मां-बाप के डर से लड़ती हैं. और पोलियो के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की जंग में डर के पीछे-पीछे अक्सर हिंसा चली आती है.

गुलनाज़ कहती हैं कि, 'मुझे अब बिल्कुल भी डर नहीं लगता. क्योंकि इस जंग में मैं अकेले नहीं हूं. बहुत से ऐसे लोग हैं, जो मुझसे भी मुश्किल हालात में काम कर रहे हैं और मुझसे अच्छा काम कर रहे हैं. मुझे ऐसे साथियों से बहुत ताक़त मिलती है. अल्लाह मेरे साथ है. मुझे ये काम पसंद है. मेरे दिल को इससे तसल्ली मिलती है.'

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