डोनल्ड ट्रंप पोलैंड में 1000 अमरीकी सैनिक क्यों भेज रहे हैं

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अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पोलैंड के राष्ट्रपति आंद्रेज़ डूडा के साथ प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि अमरीका अपने एक हज़ार सैनिक पोलैंड भेजेगा.
ट्रंप ने कहा कि ये हज़ार सैनिक जर्मनी में मौजूद अमरीका की 52 हज़ार सैन्य टुकड़ियों में से ली जाएंगी जिनके साथ ड्रोन और बाक़ी मिलिट्री हथियार होंगे.
हालांकि उन्होंने पोलैंड में एक स्थायी अमरीकी मिलिट्री बेस बनाने को लेकर कुछ नहीं कहा.

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पोलैंड ने बेस बनाने के लिए 200 करोड़ डॉलर लगाने का ऑफ़र भी दिया था.
राष्ट्रपति डूडा ने तो यहां तक कहा कि बेस का नाम ट्रंप फोर्ट भी रखा जा सकता है.
ट्रंप ने कहा कि अमरीका इस आइडिया में दिलचस्पी रखता है लेकिन स्थायी बेस बनाने में हिचकता रहा क्योंकि रूस प्रतिक्रिया करेगा.
ट्रंप ने कहा, "मैं स्थायी या अस्थायी के बारे में बात नहीं कर रहा लेकिन बेस एक स्टेटमेंट ज़रूर होता."

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राष्ट्रपति डूडा की एक साल के अंदर ये दूसरा अमरीकी दौरा है. इस बार की यात्रा में नाटो में पोलैंड की सदस्यता की बीसवीं सालगिरह मनाई गई और देश में वामपंथ के खत्म होने की तीसवीं सालगिरह भी.
पत्रकारों से बात करते हुए राष्ट्रपति डूडा ने ट्रंप को उनकी पोलैंड के लिए सद्भाव और उसके मामलों पर अच्छी समझ के लिए शुक्रिया किया.

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अमरीका और पोलैंड का समझौता
दोनों देशों ने रक्षा क्षेत्र में आपसी सहयोग के लिए एक समझौता किया है.
इस समझौते में 100 अमरीकी टुकड़ियों के बेस और इंफ्रास्ट्रक्चर का इंतज़ाम करना होगा जो वहां अस्थायी रूप से रोटेशन में रहेंगे.
बीबीसी ने जब अमरीका के रक्षा मंत्रालय से पूछा कि नए समझौते के मुताबिक कितने आर्मी वाले पोलैंड भेजे जाएंगे.
पहले ही पोलैंड में 5 हज़ार टुकड़ियां रोटेशन से पोलैंड आती जाती रही हैं.

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इस नए समझौते का क्या है मतलब
बीबीसी के रक्षा मामलों के संवाददाता जोनाथन मार्कस कहते हैं कि पिछले साल से ही पोलैंड सरकार अमरीका को अपने यहां मिलिट्री बेस बनाने के लिए मना रही है.
इस आइडिया को फोर्ट ट्रंप नाम भी दे दिया गया. लेकिन इसमें कुछ दिक्कतें थी.
इसके लिए पैसा कौन देगा? पोलैंड ने 200 करोड़ डॉलर का ऑफर दिया लेकिन इससे तो बेस की सिर्फ शुरुआत ही की जा सकती थी.

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वहां पर सैन्य टुकड़ियां कहां से आएंगी? उन्हें अमरीका से वहां शिफ्ट करना काफ़ी मंहगा होता और अगर जर्मनी या इटली से लाया जाता तो अमरीका और इन देशों के आपसी रिश्तों में दिक्कत आ सकती है.
सबसे बड़ी बात तो ये कि स्थायी बेस बनाना नाटो और रूस के बीच 1997 में हुए एक समझौते का उल्लंघन होता.
अभी जो हुआ है वो नाकाफ़ी है. मांग से कम सैन्य टुकड़िया दी गईं और वे भी रोटेशन में. हालांकि ये टुकड़ियां पोलैंड के लिए मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करेंगी ताकि कभी भविष्य में ज़्यादा सैनिकों को भी शामिल किया जा सके.
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