पाकिस्तानी सेना अपने ही लोगों का क्यों कर रही दमन

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- Author, एम इलियास ख़ान
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, डेरा इस्माइल ख़ान
9/11 के आतंकवादी हमले के बाद चरमपंथियों के ख़िलाफ़ छिड़ी लंबी जंग में पाकिस्तान में दसियों हज़ार लोग मारे गए.
हत्या के सबूत और सेना की प्रताड़ना के साथ अब वो पीड़ित आवाज़ें भी सामने आ रही हैं. इस मामले के पीड़ितों तक बीबीसी को पहुंचने में कामयाबी मिली है.
साल 2014 का शुरुआती महीना था जब टीवी न्यूज़ नेटवर्कों पर पाकिस्तानी तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई में इस समूह के अहम और सीनियर कमांडर के एक हवाई हमले में मारे जाने की घोषणा की गई.
अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के पास उत्तरी वज़ीरिस्तान के आदिवासी इलाक़े में अदनान रशीद और उनके परिवार के पाँच सदस्यों की मौत की ख़बर आई.
रशीद पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स के पूर्व तकनीशियन थे और यह एक जाना-पहचाना नाम था. रशीद ने मलाला यूसुफ़ज़ई को एक असामान्य सा ख़त लिखा था. मलाला को 2012 में तालिबान ने सिर में गोली मारी थी. तब मलाला स्कूल में पढ़ती थीं.
अपने ख़त में रशीद ने इस बात को सही ठहराने की कोशिश की थी कि मलाला के साथ ऐसा क्यों हुआ था. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की हत्या की कोशिश के मामले में भी रशीद जेल जा चुके थे.

तालिबान के बहाने आम लोग निशाने पर
न्यूज़ चैनलों ने सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से 22 जनवरी 2014 को बताया कि हमज़ोनी इलाक़े में रशीद के ठिकानों को निशाने पर लिया गया.
9/11 के बाद अमरीका ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो वज़ीरिस्तान और बाक़ी के बड़े पर्वतीय आदिवासी इलाक़ों को पाकिस्तानी सेना ने अपने नियंत्रण में लिया. तब तालिबानी लड़ाके और अल-क़ायदा के जिहादी सीमा पार कर पर्वतीय इलाक़ों में छुप जाते थे.
बाहरियों को और यहां तक कि पत्रकारों की भी यहां पहुंच नहीं है. ऐसे में सुरक्षाबलों के दावों की तहक़ीक़ात कर पुष्टि करना बहुत मुश्किल होता है. जो वज़ीरिस्तान से ख़बरें करते हैं उनमें ये चीज़ें उभकर सामने नहीं आती हैं कि सेना ने ख़ुद को कभी सज़ा दी है.
एक साल बाद पता चला कि हवाई हमले में जिस ठिकाने को निशाने पर लिया गया था वो ग़लत था. रशीद का एक वीडियो सामने आया तब पता चला कि मौत की बात ग़लत थी.
दरअसल, पाकिस्तानी सेना ने शीर्ष के चरमपंथी को मारने के बजाय एक स्थानीय व्यक्ति के घर को उड़ा दिया था. सुरक्षा बलों ने कभी नहीं स्वीकार किया कि उसने ग़लत हमला किया था.
इसकी तहक़ीक़ात के लिए बीबीसी डेरा इस्माइल ख़ान पहुंचा. यह शहर सिंधु नदी के तट पर है. यहां उस व्यक्ति से मुलाक़ात की जिसका घर पाकिस्तानी सेना ने उड़ा दिया था.
नज़ीरुल्लाह तब 20 साल के थे. वो याद करते हुए बताते हैं, ''रात के 11 या उसके आसपास का वक़्त था.'' नज़ीरुल्लाह की हाल ही में शादी हुई थी.
उनके लिए यह बड़ी बात थी कि शादी के बाद एक कमरा मिला हुआ था. खातेई कलाय गाँव में स्थित नज़ीरुल्लाह के घर में एक और कमरा था जिसमें बड़े परिवार के बाक़ी सदस्य सो रहे थे.
नज़ीरुल्लाह कहते हैं, ''ऐसा लगा कि घर में धमाका हुआ है. मेरी और पत्नी की नींद अचानक से खुली. हवाओं में बारूद की गंध तेज़ घुली थी. हम दोनों दरवाज़े से बाहर आए तो देखा कि हमारे कमरे की छत ध्वस्त हो चुकी थी. कोने का हिस्सा केवल बचा था और वहीं हमलोगों का बिस्तर था.''
दूसरे कमरे की छत भी गिर गई थी. पूरे अहाते में आग लगी थी. नज़ीरुल्लाह को मलबे के भीतर से रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी और उन्होंने पत्नी के साथ लोगों को आग से बचाने की कोशिश की. नज़ीरुल्लाह ने मलबे से घायलों और मृतकों को निकाला था.

नज़ीरुल्लाह के परिवार के चार सदस्य इस हमले में मारे गए थे. इनमें उनकी तीन साल की एक बेटी भी थी. इसके अलावा उनकी भतीजी सुमाया और उनकी मां की मौत हुई थी.
मलबे से चार लोगों को बचाया गया था. इस हमले के बाद नज़ीरुल्लाह का परिवार डेरा इस्माइल ख़ान आ गया और यहां की ज़िंदगी उनके लिए ज़्यादा शांतिपूर्ण है.
पाकिस्तान के इस हिस्से के लोग अपना घर-बार छोड़कर जाते रहे हैं. पिछले दो दशकों में इस आदिवासी इलाक़े में भारी अशांति की स्थिति रही है.
स्थानीय प्रशासन और स्वतंत्र रिसर्च ग्रुप के मुताबिक़ 2002 से चरमपंथियों की हिंसा के कारण उत्तरी-पश्चिमी पाकिस्तान से 50 लाख से ज़्यादा लोग अपना घर-बार छोड़ने पर मजबूर हुए. ये लोग या तो शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं या तो शांतिपूर्ण इलाक़ों में किराए के घर में रह रहे हैं.
इस जंग में कितने लोगों की मौत हुई है इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है. लेकिन एकेडमिक और स्थानीय प्रशासन के अनुमान के मुताबिक़ 50 हज़ार से ज़्यादा नागरिक, चरमपंथी और सुरक्षाबल मारे गए. स्थानीय एक्टिविस्टों का कहना है कि सेना के हवाई हमले में बड़ी संख्या में आम लोग मारे गए हैं.
ये वीडियो और डॉक्युमेंट्री सबूत जुटा रहे हैं ताकि अपने दावों को मज़बूती से रख सकें. इन एक्टिविस्टों को नए अधिकार समूह पश्तून तहाफ़ज़ मूवमेंट (पीटीएम) के साथ जोड़ा जाता है. पीटीएम का उभार पिछले साल तब हुआ जब आदिवासियों के साथ प्रताड़ना की रिपोर्ट लगातार आर रही थी.
पीटीएम के टॉप के नेता मंज़ूर पश्तीन कहते हैं, ''अपनी प्रताड़ना और अपमान के ख़िलाफ़ खड़े होने का साहस करने में हमें 15 सालों का वक़्त लगा. हमने जागरूता फैलाई कि सेना कैसे हमारे संवैधानिक अधिकारों का दमन कर रही है.'' हालांकि पीटीएम दबाव में है.
पीटीएम का कहना है कि उत्तरी वज़ीरिस्तान में 26 मई को सेना की खुली गोलीबारी में उनके 13 कार्यकर्ता मारे गए थे. पीटीएम के कार्यकर्ता प्रदर्शन करने के लिए सड़क पर उतरे थे.

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हालांकि सेना का कहना है कि पीटीएम के तीन कार्यकर्ता मारे गए थे क्योंकि इन्होंने सेना के चेकपॉइंट पर हमला किया था. पीटीएम हमले की बात से इनकार कर रहा है.
पीटीएम के उठाए कई मामलों की बीबीसी ने स्वतंत्र रूप से जांच की और इसे लेकर पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता से सवाल पूछा तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. सेना का कहना है कि इस तरह के आरोप पूरी तरह से एकतरफ़ा हैं.
पाकिस्तान की सरकार की तरफ़ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई जबकि इमरान ख़ान विपक्ष में थे तो आदिवासियों से प्रताड़ना के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं.
9/11 के बाद तालिबान पाकिस्तान कैसे पहुंचा?
न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में सितंबर 2001 में अल-क़ायदा के हमले के बाद ही सारी चीज़ें शुरू होती हैं. जब अमरीका ने अक्टूबर 2001 में हमला किया तो अल-क़ायदा नेता ओसामा बिन लादेन को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा. ओसामा को तालिबान ने शरण दी थी.
1996 में अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर तालिबान ने क़ब्ज़ा किया तो पाकिस्तान उन तीन देशों में से एक था जिसने तालिबान के शासन को मान्यता दी थी. पाकिस्तान ने ऐसा अफ़ग़ानिस्तान में भारत के प्रभाव को कम करने के लिए किया था.
पाकिस्तान दशकों से अमरीकी सैन्य मदद पर निर्भर रहा है. जब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने आतंकवाद ख़िलाफ़ अमरीका की जंग में शामिल होने की घोषणा की तो तालिबान ने पाकिस्तान के अर्ध-स्वायत्त इलाक़ा उत्तरी और दक्षिणी वज़रिस्तान में अपना ठिकाना बनाया.

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लेकिन अफ़ग़ान तालिबान ने सरहद पार अकेले नहीं किया. इनके साथ बाक़ी चरमपंथियों का धड़ा भी आया. इनमें से कुछ का तो पाकिस्तानी स्टेट से कुछ ज़्यादा ही दुश्मनी थी.
वैश्विक प्रसार की चाहत रखने वाले इन ने समूहों ने वज़रिस्तान में हमले करना शुरू किया. इसके बाद अमरीका ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि वो इन चरपंथियों के ख़िलाफ़ और कठोर कार्रवाई करे.
ऐसे में हिंसा और बढ़ी. रक्षा विश्लेषक और मिलिटरी इंक: इनसाइड पाकिस्तान मिलिटरी इकॉनमी की लेखक आयशा सिद्दिक़ा का कहना है कि पाकिस्तान इस लड़ाई में ख़ुद को फँसा हुआ पा रहा था.
एक तरफ़ चरमपंथियों पर कार्रवाई का दबाव था तो दूसरी तरफ़ अमरीकी मदद का लालच. 2014 में पाकिस्तान ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में एक नया ऑपरेशन शुरू किया.

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'तालिबान और सेना के काम में फ़र्क़ नहीं'
2001 में जब तालिबान इन आदिवासी इलाक़ों में आया तो स्थानीय लोग इनके स्वागत को लेकर बड़े सतर्क थे. स्थानीय लोगों का बहुत कम समय में मोहभंग हो गया. तालिबान ने आदिवासी समाज में इस्लामिक गतिविधियों को जबरन थोपना शुरू कर दिया.
शुरू में स्थानीय युवक इनके साथ हथियारबंद दस्ते में शामिल हुए. इसका नतीजा यह हुआ कि चरमपंथी नेटवर्कों के कारण आदिवासियों के बीच ही लकीर खींचने लगी. इससे गुटों के बीच आपसी दुश्मनी बढ़ी.
दूसरे चरण में तालिबान ने आदिवासी समाज के जाने-पहचाने लोगों को ख़त्म करना शुरू किया ताकि उनके उभार में कोई बाधा नहीं बने. 2002 के बाद से कम से कम 1000 आदिवासी नेताओं की तालिबान ने हत्या कर दी.
अगर ग़ैर-आधिकारिक आँकड़ों की बात करें तो यह आँकड़ा 2,000 के पास जाता है. ऐसी ही हत्याएं 2007 में हुई और आदिवासियों के बीच ग़ुस्सा बढ़ने लगा कि तालिबान किस तरह उनके समाज के लिए नासूर बन रहा है.

उत्तरी वज़ीरिस्तान में रज़माक इलाक़े में आदिवासी समाज के मोहम्मद आमीन कहते हैं, ''जब इन्होंने मेरे भाई को अगवा कर मार दिया तब हमारे इलाक़े में हम कमज़ोर नहीं थे. लेकिन इन्हें सेना का समर्थन मिला था इसलिए हमलोग कुछ कर नहीं पाए.'' आमीन के भाई का शव एक ट्रक में मिला था.
पीटीएम के कार्यकर्ता कई मामलों के दस्तावेज़ तैयार कर रहे हैं जिनमें सुरक्षाकर्मियों ने स्थानीय लोगों के साथ बर्बरता की है. मिसाल के तौर पर मई 2016 में उत्तरी वज़रिस्तान टेटी मदाखेल इलाक़े में एक सैन्य ठिकाने पर हमला और इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने पूरे गाँव की तलाशी ली थी.
चश्मदीदों का कहना है कि सेना के जवानों ने लोगों को डंडे से पीटा और रोते हुए बच्चों के मुंह पर कीचड़ फेंके गए. इसमें एक गर्भवती महिला की मौत हो गई थी. एक व्यक्ति अब भी ग़ायब है. यहां कई लोगों की आपबीती काफ़ी भयावह है.
सतार्जन भी उन्हीं लोगों में एक हैं. वो कहते हैं, ''उस वक़्त मेरे घर में केवल मेरा भाई इदार्जन, उसकी पत्नी और दोनों बहुएं मौजूद थीं.''
सेना के जवानों ने दरवाज़ा खटखटाया. सतार्जन के भाई ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, उन लोगों ने उसे बांध दिया और आंखों पर एक पट्टी बांध दी. उसके बाद उन लोगों ने परिवार के बाक़ी पुरुष सदस्यों के बारे में पूछा. सेना के जवानों ने घाटी से उसके चारों बेटों को भी पकड़ लिया.

घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने बाद में सतार्जन को बताया कि चारों लड़कों को पीटा गया और उसके बड़े भतीजे रिजवरजान के सिर पर वार किया गया.
उन सभी को आर्मी के एक पिक-अप ट्रक में फेंक दिया गया और इलाक़े के आर्मी कैंप की तरफ़ ले जाया गया.
ट्रक के ड्राइवर ने सतार्जन को बताया कि रिजरवान आधी लाश बन चुका था और बैठने की हालत में नहीं था इसलिए उसे कैंप नहीं ले जाया गया.
ड्राइवर ने बताया, उन्होंने मुझसे ट्रक रोकने के लिए कहा, जब मैंने ट्रक रोका तो उन्होंने रिजरवान को सिर में गोली मारी और शव को सड़क पर फेंक दिया.
सतार्जन उस वक़्त दुबई की एक फैक्ट्री में काम कर रहे थे. जो कुछ हुआ, उसके बारे में जानकर वह घर के लिए निकल पड़े. उन्होंने एक फ्लाइट ली, फिर कुछ दूर बस से सफर किया और उसके बाद 15 किमी पैदल चलकर उस गांव पहुंचे जहां रिजरवान का शव बरामद हुआ था.
स्थानीय लोगों ने सतार्जन को बताया कि कर्फ्यू की वजह से वह रिजवान के शव को उसके घर तक नहीं ले जा सके इसलिए उनके शव को वहीं एक पहाड़ी पर दफ़्न कर दिया.

इसके बाद वह अपने गांव की तरफ़ निकले जहां उनका घर बिल्कुल वीरान हो चुका था. सतार्जन के भाई की पत्नियों और भतीजों को रिश्तेदार अपने घर लेकर चले गए थे.
सतार्जन को अंदाज़ा था कि उनके घर की महिलाओं को पूरी कहानी मालूम भी नहीं होगी क्योंकि कर्फ्यू की वजह से गांवों के बीच सफर की मनाही थी और उस इलाक़े में कोई मोबाइल टावर भी नहीं है.
जब सतार्जन ने अपनी भाभी से बात की तो उन्हें बस इतना ही पता था कि उनके पति को आर्मी पकड़कर ले गई है और छोटे भाई लापता हैं.
मैं उस वक़्त पसोपेश में था कि उन्हें बताऊं या नहीं. फिर मैंने सोचा कि भाइयों और बेटों के लौटने के बाद रिजरवान के बारे में बुरी ख़बर देना ज़्यादा आसान होगा.
सतार्जन ने एक कहानी बना ली और कहा कि आर्मी ने घर पर छापा मारा और लड़कों को सुरक्षित कराची लेकर गए हैं. सतार्जन ने भाभी को यक़ीन दिलाया कि उनके पति को जल्द ही छोड़ दिया जाएगा.
अपने भाइयों और तीन भतीजों की सेना से कोई खोज-ख़बर ना मिलने पर वह 26 अप्रैल 2015 को रामक के परिवार के पास चले गए. हफ्ते महीनों में बदल गए और महीने सालों में.
वह अकेले नहीं है. स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2002 से लेकर अब तक क़रीब 8000 लोगों को आर्मी उठाकर ले जा चुकी है.

इस बीच सतार्जन से घर की औरतें सवाल पूछती रहती हैं कि वह अपने गांव क्यों नहीं आ सकतीं.
सतार्जन बताते हैं, मैं उन्हें कहता हूं कि शाक्तोई में हमारे घर को आर्मी ने तोड़ दिया है जो कि आधा सच भी है. लेकिन असली वजह ये है कि अगर वे वहां जाती हैं तो पड़ोसी संवेदना जताने लगेंगे और उन्हें सच मालूम पड़ जाएगा.
वो कहते हैं कि अच्छा होगा कि उन्हें यही पता चल जाए कि उनके भाइयों और भतीजों को जेल में क़ैद किया गया है या फिर मार दिया गया है लेकिन इस तरह से अंधेरे में रहना बहुत ही दर्दनाक है.
वो कहते हैं, मैं अपनी भाभी को ये भी नहीं बता सकता हूं कि उनके बच्चे लापता हैं या मर चुके हैं. मैं दो जवान बीवियों को यह नहीं बता सकता हूं कि वह विधवा हो चुकी हैं.
ये कहानियां हैरान करने वाली ज़रूर हैं लेकिन असामान्य नहीं. पीटीएम का आरोप है कि आदिवासी इलाक़ों में से 100 से ज़्यादा लोग इसी तरह की कहानी सुना सकते हैं. लेकिन आधिकारिक तौर पर कभी इनका संज्ञान नहीं लिया जाता.
ये युद्ध के वे नतीजे हैं जिन्हें छिपाने के लिए पाकिस्तान सारी हदें पार कर गया. अफ़गान सीमा पर संघर्ष को लेकर सालों से सूचनाएं रोकी जाती रही हैं.
जब पीटीएम ने पिछले साल इस गतिरोध को तोड़ा तो इसकी मीडिया कवरेज पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए. मीडिया में जिन लोगों ने प्रतिबंधों को मानने से इनकार कर दिया, उनको धमकियां दी गईं और आर्थिक तौर पर दबाव बनाया गया.
सेना ने पीटीएम की देशभक्ति पर खुले तौर पर सवालिया निशान लगाए और अफ़ग़ानिस्तान-भारत की दुश्मन इंटेलिजेंस एजेंसियों से जुड़े होने का आरोप लगा मढ़ दिया.
सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाने और डॉक्युमेंट्री बनाने वाले कुछ पीटीएम कार्यकर्ताओं को जेल में भी डाल दिया गया है.
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