'पाकिस्तान में हर सवाल का जवाब- ज़ुल्म तो मुसलमानों पर हो रहा है': ब्लॉग

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- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, लाहौर से वरिष्ठ पत्रकार
पाकिस्तान में जब भी कुछ अच्छा काम होता है तो लोगों को वो दस काम याद आ जाते हैं जो अभी नहीं हुए हैं.
भारतीय पायलट को चाय पिलाकर, वीडियो बनाकर छोड़ दिया; सबने कहा बहुत अच्छा किया. इंटरनेट पर बैठे कुछ सूरमाओं को छोड़ कर सबने कहा- बहुत अच्छा किया, इससे दुनिया में हमारी बहुत नेक नामी हुई.
हमें भी एक देश के तौर पर अपने ऊपर प्यार सा आ गया कि देखो हम भले लोग हैं, दुनिया हमें जो भी कहे, हम भले लोग हैं.
लेकिन, साथ ही कुछ दबी-दबी, तिलमिलाती हुई आवाज़ें आनी शुरू हुईं कि भारतीय पायलट को छोड़ दिया अच्छा किया लेकिन जो अपने पकड़े हुए हैं, उन्हें क्यों नहीं छोड़ते.
हमारे यहां कुटिल बहस का एक आम अंदाज़ ये है कि अगर आप कहेंगे कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ अच्छा सलूक नहीं किया जाता ,तो मैं कहूंगा कि पूरी दुनिया में जो मुसलमानों पर ज़ुल्म ढाए जा रहे हैं. उस पर आप बात क्यों नहीं करते.
मैं कहूंगा कि बर्मा के भिक्षु रोहिंग्या मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं तो आप कहेंगे कि वो जो चीन के एक सूबे में मुसलमान हैं, क्या वो आपको मुसलमान नहीं लगते. (चीन के बारे में बात करते हुए आप और मैं अपना लहज़ा धीमा कर लेंगे)
मैं कहूंगा कि चंद रिटायर्ड जेहादी बुज़ुर्गों की वजह से पूरी दुनिया हमें दहशतगर्द कहती है. इस पर आप मुझे कोई सर्वे निकाल कर दिखाएंगे और साबित करेंगे कि पूरी दुनिया तो अमरीका को सबसे बड़ा दहशतगर्द मानती है.

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भारतीय पायलट की भी बाइज्ज़त घर वापसी पर आवाज़ें उठने लगीं कि ये तो अच्छा किया लेकिन वो जो बलोच नौजवानों को कहीं बंद करके भूल गए हैं, उन्हें क्यों रिहा नहीं किया जाता. वो तो जंगी जहाज़ों में बैठ कर हम पर हमलावर नहीं हुए थे!
वो जो पश्तून ख़ानदान अपने प्यारों की तस्वीरें उठाए कब से मारे-मारे फिर रहे हैं, उनकी फ़रियाद क्यों नहीं सुनते?
वो जो मुहाजिर (भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान) और सिंधी सियासी कार्यकर्ता लापता कर दिए गए उनका पता कौन देगा?
इन जायज़ लेकिन मासूमाना मांगों का एक सादा सा जबाव ये है कि रियासत अगर सब को ही रिहा कर दे तो उसके पास करने को बचेगा क्या?
उन ज़िंदा जानों से उठते हुए नारे और चीखें रियासत को अपने होने का अहसास दिलाती हैं.

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कभी बड़ी और उभरती हुई ताक़त को देखा है? अमरीका, चीन, रूस और तुर्की में क़ैदियों की आबादी का अंदाज़ा है कुछ?
अब पाकिस्तान सऊदी अरब तो है नहीं जहां शहज़ादे का मूड अच्छा हो तो वो एक दोपहर के लिए क़ैदखानों के दरवाज़े खोल दे.
लेकिन, पाकिस्तानी रियासत की मजबूरियों को सामने रखते हुए भी एक क़ैदी ऐसा है जिसे छोड़ने पर गौरव करना चाहिए.
इसलिए भी कि मुल्क की सबसे बड़ी अदालत उस क़ैदी को मासूम क़रार दे चुकी है. क़ैदी की रिहाई का परवाना कब का जारी हो चुका. क़ैदी के बरी होने के ख़िलाफ़ राज्य की ओर से बग़ावत करने वालों का मुंह भी रातों रात ढांप दिया गया है.
तो अब आसिया बीबी आज़ाद क्यों नहीं है? उसके बच्चे बाहर हैं और वो यक़ीनन उनके पास जाना चाहती होगी. हमने क्यों उसे काल कोठरी से निकाल कर कहीं और बंद कर दिया है?

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हुक़ूमत को शायद डर है कि वो मुल्क से बाहर जाएगी तो बोलेगी, हमारे ख़िलाफ़ ज़हर उगलेगी, हमारी बदनामी की वजह बनेगी.
लेकिन ठंडे दिल से सोचिए कि आसिया बीबी बाहर जा कर क्या कहेगी कि उसके साथ ज़ुल्म हुआ, कि उसे एक झूठे इल्ज़ाम पर सज़ा-ए-मौत सुनाई गई और फिर दस साल तक काल कोठरी में रखा गया.
कि जब वो काल कोठरी में थी तो पाकिस्तान के सियासी और समाजी हलक़ों ने उस ज़ुल्म पर कोई आवाज़ नहीं उठाई, जिसने उठाई उसको गोलियों से भून दिया गया.
ऐसा क्या कहेगी आसिया बीबी, जो पहले नहीं मालूम दुनिया को?
वो जो भी कहेगी, आख़िर में उसे कहना पड़ेगा कि उसके साथ बहुत ज़ुल्म हुआ लेकिन उसे इंसाफ़ भी आख़िर में उसी देश की सर्वोच्च अदालत से मिला.
अगर हुक़ूमत को फिर भी बदनामी का डर है तो आसिया बीबी के साथ फिर वही करे जो भारतीय पायलट के साथ किया. यानी उसे चाय पिलाए और एक वीडियो रिकॉर्ड कराए जिस में आसिया बीबी कहे कि पाकिस्तान एक अज़ीम क़ौम है. और उसके बाद अगर वो मुल्क से बाहर जाकर हमारी शान में कोई गुस्ताख़ी करे तो हम सब एक स्वर में कह ही सकते हैं कि इसे छोड़िए, पूरी दुनिया मुसलमानों पर ज़ुल्म ढा रही है.
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