अमरीका क्या सहयोगी कुर्द लड़ाकों को तुर्की के क़हर से बचा पाएगा?

डोनल्ड ट्रंप

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले महीने अमरीका राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि सीरिया में चरमपंथी संगठन आईएसआईएस के खिलाफ लड़ रहे अमरीकी सैनिकों को वापस बुलाया जाएगा.

ट्रंप ने यह फैसला सीरिया के पड़ोसी देश और नेटो के अपने सहयोगी राष्ट्र तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन से बातचीत के बाद लिया था. मगर इस फैसले के एक महीने से भी कम समय में तुर्की और अमरीका के बीच नया विवाद पैदा हो गया है.

तुर्की ने ऐलान किया है कि वह सीरिया में आईएसआईएस के ख़िलाफ़ बड़ा अभियान छेड़ेगा. मगर आशंका जताई जा रही है कि इसकी आड़ में तुर्की वहां पर मौजूद कुर्द लड़ाकों पर हमले कर सकता है.

चूंकि कुर्द लड़ाकों ने सीरिया में आईएसआईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमरीकी सेना का सहयोग किया था, ऐसे में अमरीका तुर्की को चेताया है कि अगर उसने कुर्दों पर हमले किए तो तुर्की को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया जाएगा.

एक तरफ़ तुर्की है जो रणनीतिक रूप से अमरीका का अहम सहयोगी है, वहीं दूसरी तरफ़ कुर्द लड़ाके हैं, जिनके बिना अमरीका आईएसआईएस के ख़िलाफ़ जंग में इतनी क़ामयाबी हासिल नहीं कर पाता.

कुर्द लड़ाकों को ट्रेनिंग और हथियार अमरीका से मिले हैं. ऐसे में तुर्की और कुर्द लड़ाकों के बीच संघर्ष छिड़ा तो यह अमरीका के लिए असहज करने वाली स्थिति होगी.

सीरिया में अमरीकी सैन्य वाहन

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इमेज कैप्शन, अमरीका ने भारी हथियारों को सीरिया से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है

इस स्थिति को कैसे टाला जा सकता है, यह समझने के लिए यह जानना पड़ेगा कि तुर्की क्यों कुर्द लड़ाकों पर हमला करना चाहता है.

तुर्क और कुर्द

एक समय उस्मानी साम्राज्य के केंद्र रहे तुर्की में 20 फ़ीसदी आबादी कुर्दों की है. कुर्द संगठन आरोप लगाते हैं कि उनकी सांस्कृति पहचान को तुर्की में दबाया जा रहा है. ऐसे में कुछ संगठन 1980 के दशक से ही छापामार संघर्ष कर रहे हैं.

अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि इस मामले को समझने के लिए इतिहास में जाना होगा.

वह बताते हैं, "तुर्की में दो नस्लीय पहचानें हैं- तुर्क और कुर्द. कुर्द आबादी लगभग 20 प्रतिशत है. पहले वे सांस्कृतिक स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे मगर अब कई सालों से वे आज़ादी की मांग कर रहे हैं. वे कुर्दिस्तान बनाना चाहते हैं."

मध्य-पूर्व के नक्शे में नज़र डालें तो तुर्की के दक्षिण-पूर्व, सीरिया के उत्तर-पूर्व, इराक़ के उत्तर-पश्चिम और ईरान के उत्तर पश्चिम में ऐसा हिस्सा है, जहां कुर्द बसते हैं.

कुर्द हैं तो सुन्नी मुस्लिम, मगर उनकी भाषा और संस्कृति अलग है. प्रोफ़ेसर मुक़्तरदर ख़ान बताते हैं कि कुर्द मांग करते है कि संयुक्त राष्ट्र के आत्मनिर्णय के अधिकार पर उन्हें भी अलग कुर्दिस्तान बनाने का हक़ मिले. ध्यान देने वाली बात यह है कि अमरीका ने 2003 में इराक़ पर हमला किया था. तभी से उत्तरी इराक़ में कुर्दिस्तान लगभग स्वतंत्र राष्ट्र की तरह काम कर रहा है.

कुर्द

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प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, "तुर्की इस बात से डरा हुआ है कि कुर्दों का एक राष्ट्र सा लगभग बना हुआ है, ऊपर से कुर्द लड़ाकों को आईएस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमरीका से हथियार भी मिले हैं. हो सकता है कि वे इतने शक्तिशाली हो जाएं कि सीरिया में आईएस से जीते हिस्से को इराक़ के कुर्दिस्तान से जोड़कर बड़ा सा कुर्द राष्ट्र बना लें. ऐसा हुआ तो तुर्की के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा."

तुर्की को यह चिंता पहले भी थी. शुरू में जब आईएस के ख़िलाफ़ अमरीका ने क़ुर्दों से सहयोग लेना चाहा था, तब भी तुर्की ने इसका विरोध किया था. ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि जैसे ही अमरीका सीरिया से अपनी सेनाएं हटाएगा, तुर्की वहां पर कार्रवाई करके कुर्द इलाक़ों को ख़त्म कर देगा और उनके नियंत्रण वाली ज़मीन छीन लेगा.

कौन हैं कुर्द लड़ाके?

तुर्की की चिंता है कि उसके बगल में कुर्द राष्ट्र बना तो उसके लिए अपने यहां रह रही कुर्द आबादी को संभालना मुश्किल हो जाएगा.

यही कारण है कि तुर्की के क़रीबी सहयोगी देश अमरीका ने सीरिया में तथाकथित इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए वाईपीजी नाम के जिस कुर्द संगठन की सहायता ली, आज वह उसी को खत्म कर देने पर तुला हुआ है.

कुर्द महिला

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इमेज कैप्शन, कुर्द महिलाओं ने भी सीरिया में आईएसआईएस से लोहा लिया है

तुर्की की अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस बताते हैं कि तुर्की का मानना है कि सीरिया में सक्रिय कुर्द संगठन 'वाईपीजी' उसके यहां चरमपंथी संगठन घोषित किए गए कुर्द अलगाववादी संगठन 'पीकेके' का हिस्सा है.

ओमेर अनस बताते हैं, "पिछले पांच सालों से अमरीका और तुर्की के बीच सीरिया में जिन मुद्दों पर सबसे ज्यादा विरोध बना हुआ है, उनमें सबसे बड़ा मुद्दा वाईपीजी या कुर्द लड़ाके हैं. इन बलों का ताल्लुक सीधे तौर पर पीकेके से है. तुर्की में सक्रिय पीकेके यूरोपीय संघ और अमरीका में भी एक चरमपंथी संगठन के तौर पर दर्ज है. ऊपर से मसला यह है कि सीरिया के कुर्द संगठन वाईपीजी का पीकेके से रिश्ता यदा-कदा ज़ाहिर होता रहता है. उनकी विचारधारा भी पीकेके से मेल खाती है और उनकी अहम लीडरशिप भी पीकेके से आती है."

अमरीकी सीनेटर्स ने भी यह बात मानी है कि जो कुर्द बल सीरिया में अमरीका के सहयोग से आईएस के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं, उनमें बड़ी तादाद उनकी है जो पीकेके से संबंधित रहे हैं ऐसे में यही बड़ा मुद्दा है जिसने तुर्की और अमरीका के बीच खाई पैदा कर दी है.

ओमेर अनस बताते हैं कि कुर्द लड़ाकों को लेकर तुर्की की चिंताएं उस समय चरम पर पहुंच गईं, जब उन्होंने सीरिया में आईएस से छुड़ाए इलाके को अलग देश बनाने की कोशिश की. तुर्की में इस बात को लेकर भी बेचैनी है कि तुर्की के दक्षिणी हिस्से में कुर्द लड़ाके जिस अलग कुर्द देश का गठन करना चाहते हैं, उसे लेकर यूरोपीय संघ और अमरीका स्पष्ट रुख नहीं जता रहे. ऐसे में तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन ने 2015 में ही एलान कर दिया था कि वह किसी भी नए देश की स्थापना अपने बगल में नहीं होने देंगे.

कुर्द

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इमेज कैप्शन, इराक़ के उत्तर में कुर्दिस्तान काफ़ी हद तक स्वतंत्रता से काम कर रहा है

कुर्दों के नरसंहार की आशंका

इस बात की आशंका बनी हुई है कि अमरीकी सैनिकों के हटते ही कुर्द लड़ाकों को कमज़ोर करने के लिए तुर्की अपना अभियान छेड़ देगा. प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि ऐसा हुआ तो कुर्दों पर एक बार फिर वैसा ही संकट पैदा हो जाएगा, जैसा 1992 में हुआ था.

प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान बताते हैं, "1992 में जब दूसरा खाड़ी युद्ध हुआ था तब जब जॉर्ज बुश सीनियर ने कुवैत को सद्दाम हुसैन से आज़ाद करने के लिए हमला किया था. तब उन्होंने कुर्दों से कहा था कि वे भी सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ लड़ें. अमरीका ने वादा किया था कि सद्दाम को हटाने के बाद वे कुर्दों को स्वायत्तता देंगे. मगर अमरीका ने वादा नहीं निभाया."

बाद में अमरीका हटा तो प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान के मुताबिक 50 हज़ार से लेकर 3 लाख़ कुर्दों को रासायनिक हथियार इस्तेमाल करके सद्दाम की सेनाओं ने मार डाला. ऐसे में यह डर सता रहा है कि अगर अमरीका ने सीरिया छोड़कर वाईपीजी लड़ाकों को अकेला छोड़ दिया तो एक बार फिर 1992-93 का इतिहास दोहराया जाएगा.

आशंका है कि एक बार फिर कुर्दों का नरसंहार होगा और इस बार वे तुर्की के हाथों मारे जाएंगे. अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन भी चाहते हैं कि तुर्की इस बात की गारंटी दे कि वह कुर्दों पर हमला नहीं करेगा, मगर अमरीका ने बड़े हथियारों को सीरिया से हटाना शुरू कर दिया है.

सीरिया में अमरीकी सैनिक

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इमेज कैप्शन, अमरीकी सैनिकों के हटते ही कुर्दों के नरसंहार की आशंका जताई जा रही है

तुर्की मज़बूत स्थिति में

सवाल यह भी उठता है कि तुर्की किस आधार पर सीरिया की सीमा में घुसकर आईएस के बजाय कुर्दों पर हमला कर सकता है? तुर्की की अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस बताते हैं कि तुर्की को एक समझौते के कारण यह अधिकार मिला हुआ है.

वह बताते हैं, "तुर्की और सीरिया के बीच में 90 के दशक में समजौता हुआ था, जिसके तहत तुर्की को यह अधिकार है कि अगर पीकेके सीरिया के किसी इलाक़े, ख़ासकर उसके उत्तर पूर्व इलाक़े में ख़ुद को मज़बूत करता है तो तुर्की को वहां सैन्य कार्रवाई करने का अधिकार होगा."

दरअसल तुर्की ने पहले भी इसी तरह का अभियान चलाने की कोशिश की थी, मगर उस समय ईरान और अन्य खाड़ी देशों ने समझौता करवाकर जंग टाल दी थी. उसी समय सीरिया और तुर्की के बीच यह समझौता हुआ था. इस समझौते की शर्तों के तहत सीरिया अपने यहां पीकेके के नेटवर्क को अपने यहां पनपने नहीं दे सकता.

ऐसे में अगर तुर्की इस द्विपक्षीय समझौते के आधार पर सीरिया में सेनाएं भेजकर पीकेके या वाईपीजी को हटाने की कोशिश कर सकता है.

कुर्द

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अमरीका की'मजबूरी'

प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, "कुर्दों को 1992 में भी अमरीका से उम्मीद थी. मगर ऐसा हुआ नहीं. ट्रंप ने तो बिना सोचे-समझे अर्दोआन के साथ बात करके सीरिया से हटने का फैसला कर लिया. लेकिन उनके प्रशासन में कुछ लोग हैं जो समझते हैं कि इससे मध्य पूर्व में अमरीका पर विश्वास ख़त्म हो सकता है. इससे सऊदी अरब भी चिंता कर सकता है कि जैसे आपने कुर्दों को इस्तेमाल करके छोड़ दिया, कल को आप हमारे साथ भी ऐसा कर सकते हैं."

अब सवाल उठता है कि अगर तुर्की ने कुर्द लड़ाकों पर हमला किया तो अमरीका क्या करेगा? क्या वह आर्थिक प्रतिबंध लगाकर या इस तरह की धमकियां देकर तुर्की को रोक पाएगा? प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि इसकी संभावना बहुत कम है.

वह कहते हैं, "तुर्की इस कार्रवाई को लेकर बहुत गंभीर है. पूरे मध्य-पूर्व में तुर्की सबसे बड़ा राष्ट्रवादी देश है. उनके लिए अपनी तुर्क पहचान और राष्ट्रवाद इस्लामवाद से भी ज्यादा अहम है. वैसे भी अर्दोआन को राष्ट्रपति चुनाव में एमएचपी नाम की सेक्युलर नेशनलिस्ट पार्टी का समर्थन लेना पड़ा है जो कुर्दों की धुर विरोघधी है. ऐसे में अर्दोआन राष्ट्रवादी राष्ट्रपति बन चुके हैं. उन्होंने कुर्दों से संवाद ख़त्म कर दिया है. तुर्की में हर वर्ग वाईपीजी के ख़िलाफ है. वे अपने यहां कुर्द संगठन पीकेके और वाईपीजी में कोई भेद नहीं करते."

लेकिन मध्य पूर्व मामलों के जानकार ओमेर अनस मानते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सीरिया से सैनिक हटाने का फैसला अचानक नहीं लिया, बल्कि इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि अमरीका कुर्दों से नाराज़ था.

वह बताते हैं, "सीरिया में वाईपीजी और पीकेके से संबंधित समूहों पर जब अमरीका ने दबाव बनाना चाहा तो उन्होंने तुरंत सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद से समझौता करना चाहा. इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली मगर अमरीका इस बात से नाराज हुआ. अब ट्रंप ने जो सेना हटाने का एलान किया है, वह दरअसल अर्दोआन और ट्रंप के बीच उत्तर-पूर्व सीरिया के प्रबंधन को लेकर हुए समझौते के तहत किया गया है. यह अचानक लिया गया फैसला नहीं बल्कि सोची समझी रणनीति के तहत उठाया गया कदम है. इसीलिए इसमें समय भी लग रहा है."

ट्रंप और अर्दोआन

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तुर्की को झुका पाएगा अमरीका?

अमरीका ने पिछले साल तुर्की पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे उसकी मुद्रा लीरा में ऐतिहासिक गिरावट आ गई थी. मजबूरी में तुर्की को झुकना पड़ा था और उस अमरीकी पादरी को रिहा करना पड़ा था, जिसे अपने यहां तख्तापलट की साज़िश रचने के आरोप में हिरासत में लिया था.

इस तरह से भले ही अमरीका ताकतवर लगता हो, मगर प्रोफेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि तुर्की के हाथ में भी कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिनकी मदद से वह अमरीका को बैकफुट पर डाल सकता है.

मुक्तदर ख़ान बताते हैं, "तुर्की, अमरीका का अहम नेटो सहयोगी है. रूस पर निशाना बनाने के इरादे से सबसे करीबी परमाणु हथियार अमरीका ने तुर्की में तैनात किए हैं. रूस से जंग होने की स्थिति में अमरीका सबसे बड़ा एयरबेस तुर्की में है. अमरीका के एफ 35 नाम के सबसे नए फाइटर जेट के इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स सिर्फ़ तुर्की की कंपनियां बनाती हैं. ऐसे में वे एक-दूसरे पर सुरक्षा के मामले में निर्भर हैं."

इसी तरह से तुर्की के पास एक ऐसी चाबी है, जिसकी मदद से वह कभी भी यूरोप को दबाव में डाल देते हैं. यह चाबी है- शरणार्थी.

प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान बताते हैं, "तुर्की एक तरह से इराक़ और सीरिया के शरणार्थियों के लिए ट्रैफिक कंट्रोलर बना हुआ है. जब तुर्की को यूरोप पर दबाव बनाना होता है, वो नल खोल देते हैं और हज़ारों शरणार्थी तुर्की होते हुए यूरोप की ओर चलने लगते हैं. यूरोप परेशान हो जाता है तो अमरीका पर दबाव बनता है. अर्दोआन के पास ऐसी चीज़ें हैं जिनके माध्यम से वह पश्चिमी ताकतों पर दबाव डाल सकते हैं."

अर्दोआन

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इसके अलावा अमरीका ख़ुफिया जानकारियों और अन्य इस्लामिक आंदोलनों की जानकारियों आदि को लेकर तुर्की पर बहुत ज़्यादा निर्भर है. ऐसे में प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि अमरीका अगर प्रतिबंध लगाएगा तो तुर्की को नुक़सान बेशक होगा, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी नहीं कि बहुत ज़्यादा दबाव झेल सके. लेकिन हालात ऐसे हैं कि आंतरिक राजनीतिक दबाव के कारण वह कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा.

समस्या का हल क्या है

क्या इस समस्या का कोई शांतिपूर्ण हल भी है? मध्य-पूर्व मामलों के जानकार ओमेर अनस बताते हैं कि इस समस्या को शांति से भी सुलझाया जा सकता है और यह हल तुर्की और अमरीका को मिलकर खोजना होगा.

वह बताते हैं कि वाईपीजी और पीकेके के लड़ाकों को आम कुर्दों से अलग करना होगा क्योंकि सभी कुर्द इन संगठनों से नहीं जुड़े.

ओमेर अनस कहते हैं, "अमरीका ने जब आर्थिक रूप से तबाह करने की धमकी दी तो तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन के सलाहकार इब्राहिम कालिन ने कहा कि अमरीका सभी कुर्दों, वाईपीजी और पीकेके को एक समझकर गलती कर रहा है. वाईपीजी और पीकेके सभी कुर्दों का प्रतिनिधित्व नहीं करते."

उनका यह बयान सही भी है क्योंकि सीरिया में बड़ी संख्या में कुर्द हैं. तीन लाख कुर्द शरणार्थी तो तुर्की और अन्य जगहों पर ही रह रहे हैं. यानी वे पीकेके और वाईपीजी में शामिल नहीं है. ऐसे तुर्की इस बात को लेकर नाराज़ है कि वाईपीजी और पीकेके पर कार्रवाई करने की बात को यह समझा जा रहा है कि वह कुर्दों पर हमला कर रहा है. इसलिए वह यूरोप और अमरीका पर तबाव बना रहा है कि यह कहना बंद करे कि कुर्द और पीकेके-वाईपीजी एक ही हैं.

कुर्द महिला

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ओमेर अनस बताते है कि भले ही राष्ट्रपति आर्दोआन पर राजनीतिक दबाव ज्यादा है और विकल्प कम, मगर उन्हें अमरीका के साथ मिलकर इस समस्या को हल करना चाहिए. वह कहते हैं, "मेरे विचार से अर्दोआन चाहते हैं कि वह अमरीका के साथ मिलकर मामले को सुलझाएं और इसीलिए वह इंतज़ार कर रहे हैं. अगर उन्हें इंतज़ार करना होगा तो वह इंतज़ार करेंगे. वह सैन्य कार्रवाई करने में जल्दबाज़ी नहीं दिखा रहे और उन्हें ऐसा करना भी नहीं चाहिए."

सीरिया में तथाकथित इस्लामिक स्टेट का प्रभाव खत्म करने में कुर्दों की अहम भूमिका रही है और कुर्द महिलाओं तक ने इस जंग में हिस्सा लिया है. ऐसे में अमरीका की साख भी दांव पर लगी हुई है. अगर अमरीका इस भावी संघर्ष को रोकने में नाकाम रहता है तो सीरिया में एक और मानवीय संकट पैदा हो जाएगा.

जानकारों का कहना है कि अमरीका, यूरोपीय संघ और तुर्की बैठकर इस मसले को सुलझाते हैं तो बेहतर होगा. फिर भी कुर्दों पर मंडरा रहे नरसंहार को टालने की ज़िम्मेदारी अमरीका पर ज़्यादा है. अगर वह ऐसा नहीं कर पाता दूसरा मौक़ा होगा जब वह कुर्दों को भरोसा देकर बाद में उन्हें अकेला छोड़ देगा.

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