तुर्की की मुद्रा लीरा में गिरावट का 'ईरान और फ़लस्तीन कनेक्शन'

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तुर्की, एक ऐसा देश है जिसका कुछ हिस्सा यूरोप और कुछ एशिया में पड़ता है. यूरोप और एशिया के बीच पुल का काम करने वाला ये देश इन दिनों आर्थिक संकट से जूझ रहा है.
यहां की मुद्रा लीरा में पिछले एक साल से लगातार गिरावट देखी जा रही है. वो भी तब, जब एक साल पहले तक इसका प्रदर्शन काफी अच्छा था.
इस गिरावट से अकेला तुर्की ही परेशान नहीं है, बल्कि अन्य देश भी इस बात को लेकर काफी चिंतित नज़र आ रहे हैं. यहां तक कि भारतीय मुद्रा रुपया जब डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होकर 70 पार कर गया, इसके पीछे भी तुर्की के हालात को वजह बताया गया.
तुर्की की मुद्रा लीरा में पिछले एक साल में 40 प्रतिशत गिरावट आई है. 16 प्रतिशत की गिरावट तो एक हफ्ते में आ गई. पिछले कुछ सालों से तुर्की की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है.

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पिछले साल ग्रोथ रेट सात फीसदी रही थी. लेकिन अब ऐसे हालात हो गए हैं कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप अर्दोआन को लोगों से अपील करनी पड़ी कि अगर उनके पास विदेशी मुद्रा और सोना है तो उसे तुरंत लीरा में बदलवाएं.
एक साल में ऐसा क्या हो गया कि उत्साहजनक प्रदर्शन कर रही तुर्की की मुद्रा लीरा अचानक कमज़ोर हो गई? तुर्की की अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं कि अमरीका के दबाव के कारण ऐसा हो रहा है.
वह बताते हैं, "तुर्की की अर्थव्यवस्था अच्छी होने के कई कारण रहे हैं. बहुत दिनों से तेल के दाम नीचे जाने का उसे फ़ायदा हो रहा था. इस देश से होकर तेल और की पाइपलाइनें जाती हैं. यूरोप के लिए तेल और गैस की पाइपलाइन यहां से होकर जाती हैं. ईरान भी यहीं से तेल और गैस सप्लाई करता है. और भी कई पाइपलाइनें यहां से होकर जाती हैं."
"ईरान की तेल और गैस पाइपलाइन यहां से होकर जाती हैं. और भी कई पाइपलाइन बन रही हैं. इसका फ़ायदा तुर्की को मिलता है. लेकिन जब से डोनल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने हैं, तभी से उन्होंने ईरान को लेकर अपनी नीति सख्त कर दी है. वह ईरान के साथ-साथ रूस, चीन और तुर्की पर भी दबाव बना रहे हैं. उन्होंने तुर्की पर अतिरिक्त टैक्स लगा दिए हैं. इससे तुर्की पर दबाव बढ़ा और उसकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमज़ोर हो गई. यही करेंसी क्रैश के तौर पर नज़र आ रहा है."

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अमरीका-तुर्की की दोस्ती में खटास क्यों
अमरीका और तुर्की पुराने सहयोगी रहे हैं. उनका आपसी सहयोग दूसरे विश्वयुद्ध के दौर से शुरू हुआ. तुर्की 1952 से नैटो का हिस्सा भी है. फिर दोनों के बीच रिश्ते क्या एक साल में ही बदल गए? जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मध्य-पूर्व मामलों के प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा बताते हैं कि इसकी शुरुआत आज से 16 साल पहले ही हो गई थी.
वो बताते हैं, "साल 2002 में जब तुर्की में अर्दोआन की पार्टी एकेपी (जस्टिस एंड डेवेलपमेंट पार्टी) पार्टी सत्ता में आई है, तब उसने लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की हमारी पार्टी इस्लामिक पार्टी है और तुर्की में जोमुस्तफा कमालअतातुर्क के ज़माने से सेक्युलरजिम है, वह ढकोसला है. अर्दोआन की पार्टी यहां इस्लामिक नज़रिए से हुकूमत चला रही है. साथ ही तुर्की में सेना अक्सर नागरिक सरकारों का तख्ता पलटती रहती थी."
"मगर एकेपी ने सेना पर नियंत्रण लगाया और उसका रसूख और दखल कम कर दिया. इसके साथ ही इन्होंने न्यायपालिका, मीडिया और बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया. जो धर्मनिरपेक्ष लोग इस्लामीकरण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, उन्हें या तो जेल में डाल दिया गया या फिर मार डाला गया है."
"विदेश नीति में भी बदलाव आया जब साल 2003 में अमरीका ने इराक पर हमला किया. उस समय वो तुर्की के जरिए सेना भेजना चाहता था मगर अर्दोआन ने इसका विरोध किया और जाने नहीं दिया. यह तुर्की का अपने नैटो सहयोगी अमरीका के खिलाफ सीधा कदम था. फिर उसने कई ऐसे कदम उठाए, जैसे कि ईरान से रिश्ते गहरे करना, इसराइल से रिश्ते तोड़ना, फिर जोड़ना या फिर अरब मुल्कों में मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन करना. वो लगातार ऐसी नीतियां अपना रहे हैं जो यूरोपीय संघ, अमरीका और नैटो के नज़रिए में, 50 साल तक उनके साथी रहे तुर्की की नीतियों से अलग हैं."
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2016 में तख्तापलट की कोशिश का असर
साल 2016 में तुर्की में एक सैन्य विद्रोह हुआ था, जिसमें अर्दोआन के तख्ता पलट की नाकाम कोशिश की गई थी. इसी साल तुर्की में लंबे समय से काम कर रहे अमरीका पादरी एंड्रयू ब्रनसन को गिरफ्तार कर लिया गया था.
उस दौरान अमरीका ने एंड्रयू को रिहा करने की मांग की थी और तुर्की ने यह मांग नहीं मानी तो उसने बाद में प्रतिबंध लगा भी दिए. प्रोफ़ेसर ओमेर अनस मानते हैं कि तख्तापलट की घटना के बाद भी अमरीका और तुर्की के बीच बहुत सी चीज़ें बदली हैं.
वो बताते हैं, "पादरी ब्रनसन के बारे में कहा जा रहा है कि वह दोनों देशों के बीच मुख्य मुद्दा हैं. लेकिन मेरे विचार से बात इतनी ही नहीं है. 2016 में जब राष्ट्रपति अर्दोआन को हटाने के लिए फौजी बगावत हुई थी, उस समय रूस ने जितना साफ मत जताया था और इस कोशिश की निंदा की थी. उस समय अमरीका ने, जो कि उसका नैटो सहयोगी भी है, इस विद्रोह के खिलाफ डांवाडोल पोजिशन ली थी. उन्होंने कहा था कि तुर्की के अंदर शांति और स्थिरता स्थापित होनी चाहिए. इससे तुर्की को लगा कि अमरीका इसका इंतजार कर रहा था कि अर्दोआन पद से हटा दिए जाते तो अमरीका को दिक्कत नहीं होती. इसी बात को लेकर अर्दोआन और उनकी पार्टी अमरीका को लेकर बहुत अविश्वास रखते हैं."
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प्रभाव तो यूरोप पर भी पड़ेगा
तुर्की और यूरोप के कई देशों के बीच गहरे कारोबारी रिश्ते हैं और उनके निवेशकों का एक-दूसरे के यहां भारी निवेश भी है. ऐसे में अगर लगातार तुर्की की मुद्रा गिरती रहती है तो उससे पश्चिमी अर्थव्यवस्था भी तो ख़ासी प्रभावित होगी.
फिर अमरीका के सख्त रुख के बीच यूरोपीय देश क्या कर रहे हैं? इस विषय पर प्रोफ़ेसर आफताब पाशा बताते हैं कि अभी तुर्की को सिर्फ चेतावनी दी जा रही है.
"जबसे एकेपी पार्टी आई है, तुर्की की कंपनियां भारी मात्रा में अमरीकी डॉलरमेंकर्ज लेकर निवेश कर रही है. यूरोपी बैंकों ने भी उन्हें कर्ज दिया है. ऐसे में वे कोशिश कर रहे हैं कि लीरा में गिरावट से जो नुकसान हुआ है, उसे कम करें. अगर गिरावट जारी रही तो वे कंपनियां खुद को दीवालिया घोषित करके डॉलर में लिया गया कर्ज वापस नहीं करेंगी. इससे यूरोप और अमरीकी बैंकों को भी नुकसान होगा. अर्दआन ने ऐसे कदम उठाए हैं जैसे कदम उठाने के बारे में तुर्की की पिछली 50 साल की सरकारों ने सोचा तक नहीं था. यूरोप और मिडल ईस्ट में काफी अहम स्थिति है तुर्की की. इसीलिए यूरोप और अमरीका उसके ऊपर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहते क्योंकि इससे उनका और साथियों का नुकसान बढ़ेगा. वे दरअसल चेतावनी दे रहे हैं कि सुधर जाइए वरना और बुरे दिनों का सामना करना पड़ेगा."
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क्या बाहरी हालात ही जिम्मेदार हैं?
अर्दोआन इस साल जून में हुए चुनावों में 52 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल करके दोबारा राष्ट्रपति चुने गए थे. अर्दोआन 2014 में तुर्की का राष्ट्रपति बनने से पहले 11 साल तक तुर्की के प्रधानमंत्री थे. लेकिन अब 2017 में हुए एक जनमत संग्रह करे आधार पर तुर्की में प्रधानमंत्री का पद ख़त्म कर दिया गया है और उसकी सभी कार्यकारी शक्तियां राष्ट्रपति को स्थानानांतरित कर दी गई हैं. यानी अर्दोआन, तुर्की के सबसे शक्तिशाली शासक हैं. लेकिन उनकी अपनी नीतियां भी कुछ ऐसी रही हैं, जिनके कारण उनकी आलोचना हो रही है. जैसे कि अपने दामाद अल बैराग को वित्त मंत्री बनाना.
प्रफेसर ओमेर अनसबताते हैं, "ये बात भी सही है कि अर्दोआन ने अपने दामाद को वित्त मंत्री बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी है लेकिन इस बात को लेकर बाजार और बहुत से लोगों की राय अच्छी नहीं हैं. उन्हें विश्वास नहीं है कि अल बैराग इस जिम्मेदारी को पूरी कर पाएंगे. उस वक्त में, जब उनकी पहले से आलोचना हो रही है,. ऊपर से संकट आ गया है, ऐसे में देखना होगा कि वह कैसे देश को इस संकट से निकाल पाएंगे. लेकिन अभी तक उनके पास कोई योजना नहीं दिख रही कि वह तुरंक तुर्की को इस संकट से निकाल पाएं."
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हालात खरा होते देख अर्दोआन ने देशवासियों से सहयोग की अपील भी की है. क्या उन्हें जनता समर्थन मिलेगा? प्रोफेसर आफताब कमाल पाशा बताते हैं कि इसकी संभावना कम है.
वह कहते हैं, "पिछले चुनावों में उनको लगभग 52प्रतिशत ही वोट मिले यानी आधे तुर्क ही उन्हें समर्थन नहीं देते. ऐसा जनमतसंग्रह और अन्य कई चुनावों में सामने आया है. तुर्की ध्रुवीकृत हो गया है सेक्युलर और इस्लामिस्टों के बीच. अर्दोआन जो समर्थन जनता से मांग रहे हैं, वह पर्याप्त नहीं होगा. उन्हें उन्हीं लोगों का समर्थन मिलेगा जिन्होंने उन्हें वोट दिए थे. फिर ऊपर से रूस, चीन और ईरान भी उनकी मद नहीं कर पाएंगे. इसीलिए अमरीका इन तीनों पर भी दबाव डाल रहा है. वे चाहते हैं कि तुर्की जिस तरह से पचास साल तक उनकी कही सुनता चला आ रहा था, वह फिर से वैसा ही करने लगे. मगर अर्दोआन इसके लिए तैयार नहीं हैं. वह तुर्क राष्ट्रवाद के घोड़े पर सवार हैं और इससे उतरना नहीं चाहते."

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'ईरान और फ़लस्तीन कनेक्शन'
इस पूरे विवाद का एक और भी पहलू हैं, जैसे कि सीरिया में चल रहा गृहयुद्ध. दरअसल सीरिया के कुर्द विद्रोहियों को अमरीका ने सीधा समर्थन दिया था. तुर्की में भी कुर्दों की संख्या अच्छी खासी हैऔर वे नस्ल के आधार पर सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग हैं.जब से सीरिया के कुर्द विद्रोहियों ने अलग कुर्दिस्तान राष्ट्र की मांग उठाना शुरू किया, तुर्की को यह बात पसंत नहीं आई.
प्रोफेसर ओमेर अनस बताते हैं, "तुर्की को लगता है किसीरिया मेंजैसा अमरीका को करना चाहिए था, उसने वैसा नहीं किया. अमरीका ने सीधे कुर्द बागियों को सीधा समर्थन दिया है और उसने ऐसा करते समय अपने नैटो सहयोगियों को विश्वास में नहीं लिया है. इस कारण बहुत से बड़े हथियार कुर्द विद्रोहियों को दिए गए. कुर्द विद्रोही सीरिया के साथ न रहकर अलग राष्ट्र बनाने की कोशिश करने लगे तो तुर्की अपने देश की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गया. इस कारण तुर्की ने साफ कर दिया कि वह इन कुर्द विद्रोहियों के खिलाफ अकेले ही कार्रवाई करेगा, चाहे अमरीका उनका साथ दे या न दे."
इस मामले में ईरान और साथ-साथ इसराइल और फलस्तीन का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है. प्रोफेसर ऑफतालब कमाल पाशा मानते हैं कि तुर्की ने हाल ही में इस्लामिक देशों के बीच अपना प्रभाव बढ़ाया है, ऐसे में वह इसराइल और फलस्तीन के मामले पर अमरीका के लिए दिक्कतें पैदा कर सकता है. साथ ही तुर्की चाहे तो ईरान पर लगे प्रतिबंधों को बेअसर कर सकता है.
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प्रोफेसर आफताब कमाल पाशा कहते हैं, "इस्लामिक देशों से सहानुभूति करकेतुर्की नेप्रभाव बढ़ाया है. अमरीका जिस तरीके से फलस्तीनी मामले को हल करना चाहता है, उसे लेकर तुर्की की पोजिशन ऐसी बन गई है कि अगर वह अमरीका की ओर से पेश की गई डील के खिलाफ आवाज उठाता है तो सऊदी अरब, अमरीका और इसराइल समेत कई देशों को दिक्कत हो जाएगी. तो एक तरह से फलस्तीन के मसले पर उसे मजबूर करने के लिए आर्थिक दबाव बनाकर मजबूर कर रहे हैं."
ईरान पर लगे प्रतिबंधों को लेकर भी तुर्की पर वे दबाव बना रहे हैं क्योंकि तुर्की चाहे तो ईरान पर लगे प्रतिबंधों में होने वाले लीकेज को तुर्की ही बेअसर कर सकता है. क्योंकि अभी ईरान जो चीज चाहता है, उसे वह चीन और रूस से तुर्की के जरिए पा सकता है. इसीलिए तुर्की पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही है.
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पिछले दो साल से तुर्की इस बात पर काम कर रहा है कि जितना जल्दी हो सके खुद को पश्चिमी अर्थव्यवस्था के हटाकर एशियाई इकनॉमी के तौर पर उभारे. यही कारण है कि अर्दोआन लगातार चीन, रूस और भारत की तरफ देख रहे हैं और ब्रिक्स का हिस्सा बनने के लिए भी इच्छा जता चुके हैं.
मगर जानकारों का मानना है कि एक-दूसरे के गहरे दोस्त रहे तुर्की और अमरीका शायद ऐसे मोड़ पर आ गए हैं, जब वे अपने रास्ते अलग करने वाले हैं. फिर भी तुर्की को परीक्षा के दौर से गुजरना होगा क्योंकि अभी उसके पास ऐसे दोस्त नहीं हैं जो हर मामले में उसका खुलकर साथ दें. ऐसे में जब तक अमरीका और तुर्की के बीच तनातनी खत्म नहीं होती, लीरा में सुधार की संभावना कम नजर आती है और इससे बाकी अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो सकती हैं.
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