'दुकानदार ट्रंप' के टशन से कब तक टक्कर ले पाएगा ईरान

    • Author, वात्सल्य राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ईरान की राजधानी तेहरान पर नाराज़ दिखने वाले लोगों की भीड़ बढ़ने लगी है. लोगों के कई समूह अमरीका के ख़िलाफ नारेबाज़ी कर नाराज़गी ज़ाहिर करते दिख रहे हैं.

नाराज़गी अमरीका की ओर से ईरान पर लगाए गए ताज़ा प्रतिबंधों को लेकर है.

ईरान की सरकार भी अपनी नाराज़गी छुपा नहीं रही है. राष्ट्रपति हसन रुहानी ने प्रतिबंधों को ठेंगा दिखाने का एलान कर दिया है.

उन्होंने कहा है, "(प्रतिबंध के बाद भी) ईरान तेल बेचता रहेगा. इस बार हम गर्व के साथ प्रतिबंधों को तोड़ेंगे."

बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहते जुलाई 2015 में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच परमाणु संधि हुई थी. क़रीब छह महीने पहले ट्रंप ने इस समझौते से हटने का एलान किया था.

अमरीका ने ईरान से हटाए गए सभी प्रतिबंधों को दोबारा बहाल कर दिया है. कई नए प्रतिबंध भी लगाए गए हैं.

दुनिया भर में परमाणु कार्यक्रमों पर नज़र रखने वाली संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) के मुताबिक ईरान 2015 के समझौते का पालन कर रहा था.

अमरीकी प्रतिबंधों का असर

इस समझौते में शामिल रहे यूरोपीय देशों ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने कहा है कि वो समझौते से जुड़े हुए हैं लेकिन अमरीकी प्रतिबंधों का असर दिखने लगा है.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और अमरीका की डेलावयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि ट्रंप प्रशासन ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ना चाहता है.

"इतने सख़्त प्रतिबंध ईरान पर कभी लागू नहीं हुए थे. ये ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से तबाह करने की कोशिश है."

अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने प्रतिबंधों के असर का ज़िक्र करते हुए कहा कि ईरान से होने वाले तेल के निर्यात में प्रतिदिन 10 लाख बैरल की गिरावट आ चुकी है.

आंकड़े बताते हैं कि ईरान की मुद्रा रेयाल लगातार गिर रही है. महंगाई बढ़ रही है और साथ में लोगों का गुस्सा भी भड़क रहा है.

चीन, भारत और दक्षिण कोरिया समेत ईरान से तेल ले रहे आठ देशों को मिली आंशिक छूट के बीच ट्रंप ने कहा कि वो ईरान से हो रहे तेल निर्यात को तुरंत रोक सकते हैं लेकिन 'इससे बाज़ार सदमे में आ जाएगा. तेल की कीमतें तुरंत बढ़ जाएंगी.'

दुनिया के प्रति बेफ़िक्र हैं ट्रंप

हालांकि, चीन की राजधानी बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता कहते हैं कि ट्रंप दावा भले ही कर रहे हों लेकिन वो दुनिया की कोई परवाह नहीं करते.

सैबल दासगुप्ता कहते हैं, "अमरीका को पुराने चश्मे से नहीं देखना चाहिए. डोनल्ड ट्रंप की जो राजनीति है, उसमें अमरीका फर्स्ट यानी हमारे स्वार्थ में आज क्या है, वो अहम है. ट्रंप कल का इतना नहीं सोचते हैं, आज क्या मिल रहा है, कितना मिल रहा है. बिल्कुल दुकानदार वाली बात हो गई है. हमारी छवि खराब हो रही है, डोनल्ड ट्रंप के राज में इसकी चिंता नहीं जाती है."

उधर, मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि ट्रंप के शासनकाल में अमरीका की छवि बदल गई है और ये ज़रूरी नहीं कि हर देश उनकी बताई राह पर ही चले.

वो कहते हैं, "ट्रंप प्रशासन का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वो रसूख नहीं रहा जो ओबामा प्रशासन का था. अब अमरीका से कई मुल्क नाराज़ हैं तो हो सकता है कि अमरीका को वो सहयोग न मिले जो पहले मिला था."

मध्य पूर्व की राजनीति पर नज़र रखने वाले कई विश्लेषकों का दावा है कि अमरीका ने जो प्रतिबंध ईरान पर लगाए हैं, उनसे नुकसान उन देशों को भी हो रहा है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं.

भारत और ईरान का रिश्ता अहम

मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आगा कहते हैं कि ईरान से आने वाले तेल में कटौती होती है तो कीमतों में उछाल आता है और इससे भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर होता है.

आग़ा कहते हैं, "तेल की कमी होने से दाम बढ़ेंगे. ये तय बात है. पहले से ही दाम बढ़ना शुरू हो गए हैं. एक डॉलर बैरल पर बढ़ता है तो हमें एक महीने या उससे थोड़े ज़्यादा वक़्त में एक अरब डॉलर का नुकसान हो जाता है. हमारा जो लक्ष्य है आठ से दस फ़ीसदी आर्थिक प्रगति का उस पर असर होगा."

बीते कुछ सालों में ईरान के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने में जुटे चीन ने भी अमरीकी प्रतिबंधों पर खेद जताया है और कहा है कि उसे उम्मीद है कि ईरान के साथ उसका वैध कारोबार जारी रहेगा.

विश्लेषकों की राय है कि भारत और चीन दोनों ही ईरान के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को तुरंत नहीं तोड़ सकते हैं. क़मर आग़ा की राय है कि भारत के लिए चाबहार पोर्ट परियोजना रणनीतिक और व्यापारिक दोनों लिहाज़ से अहम है.

आग़ा कहते हैं, "हमारे लिए तो ईरान रणनीतिक तौर पर भी अहम है. ये सेंट्रल एशिया का गेटवे है . भारत जिस चाबहार पोर्ट का निर्माण कर रहा है वो गुजरात के कांदला पोर्ट से केवल छह सौ किलोमीटर दूरी पर है. हमको पांच से छह दिन लगेगा वहां तक सामान पहुंचाने में फिर चाबहार से सेंट्रल एशिया या अफ़ग़ानिस्तान हमारा सामान चला जाता है."

भारत भी एक बड़ा खिलाड़ी

सैबल दासगुप्ता के मुताबिक चाबहार पोर्ट उन अहम कारणों में से एक है जिन्हें लेकर चीन ने ईरान से रिश्तों को मज़बूती देने की कोशिश की है.

वो कहते हैं, "चाबहार पोर्ट को काउंटर करने के लिए चीन ने ईरान से दोस्ती की. चीन चाहता है कि चाहबार में पाकिस्तान को शामिल किया जाए. बड़े पैमाने पर बड़े-बडे़ खेल हो रहे हैं और इसमें भारत भी कोई पीछे नहीं है."

सैबल दासगुप्ता ये दावा भी करते हैं कि अमरीका आर्थिक तौर पर चीन और ईरान दोनों को ही दबाना चाहता है लेकिन वो ये भी नहीं चाहता कि चीन तेल ख़रीदने में ईरान की जगह रूस को चुने. इससे रूस बुलंद हो सकता है.

लेकिन अमरीका भारत, चीन और ईरान को आंशिक राहत देने से ज़्यादा छूट नहीं देना चाहता. विश्लेषक ये दावा भी करते हैं कि शिया बहुल होने के नाते ईरान को स्वाभाविक तौर पर अमरीका के क़रीब होना चाहिए. लेकिन स्थिति इसके उलट है. ख़ासकर 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से.

क़मर आग़ा कहते हैं मध्य पूर्व में ईरान ने अलग राह चुनी हुई है जो ट्रंप को रास नहीं आती. वो इसराइल से लेकर सऊदी अरब तक अमरीका के हर सहयोगी के ख़िलाफ़ है. सीरिया में भी वो अमरीकी नीति के विरोध में चलता है.

वो कहते हैं, "ईरान मध्य पूर्व में अमरीका की नीति के ख़िलाफ़ है. अपने मिसाइल कार्यक्रम के ज़रिए वो इसराइल की सैन्य सर्वोच्चता को भी चुनौती देता है. ट्रंप प्रशासन में काफ़ी लोगों की ये राय है कि ईरान में सरकार बदलनी चाहिए. इससे (सीरिया में) असद की सरकार भी बदल जाएगी. इराक़ में जो ईरान का प्रभाव है, वो ख़त्म हो जाएगा. यमन में जो हूती विद्रोहियों का वो समर्थन करते हैं, वो नहीं हो पाएगा. हिज्बुल्लाह को मिलने वाला समर्थन भी ख़त्म हो जाएगा. लेबनान में हिज्बुल्लाह कमज़ोर हो जाएंगे. अफ़ग़ानिस्तान में भी ईरान एक फ़ैक्टर है. ये देखते हुए अमरीका का मानना है कि ईरान की सरकार को इतना कमज़ोर कर दो कि वो ख़ुद ही गिर जाए."

सैबल दासगुप्ता भी इस राय का समर्थन करते हैं. वो कहते हैं कि अमरीका चाहता है कि ईरान का मौजूदा शासन बदल जाए.

"अमरीका का दीर्घकालिक हित देखें तो वो चाहते हैं कि ईरान में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था लागू हो जाए और वहां रुढ़िवादी तबके का राज ख़त्म हो जाए. लोकतांत्रिक चुनाव हों लेकिन ये हो नहीं पा रहा है. अमरीका की कश्मकश यही है. ईरान के पास तेल भी है और भारत और चीन समेत कई देशों के साथ दोस्ती भी है."

ईरान का राष्ट्रवाद

ट्रंप प्रशासन के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि प्रतिबंधों की ताज़ा खेप के बाद ईरान के लोग सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं.

हक़ीक़त ये है कि ईरान के कट्टरपंथी भी इन प्रतिबंधों को सरकार बदलने के मौक़े के तौर पर देख रहे हैं लेकिन विश्लेषकों की राय में सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामनेई मौजूदा वक़्त को सरकार बदलने के लिए ठीक नहीं मान रहे हैं.

क़मर आग़ा दावा करते हैं कि ईरान के अंदर राष्ट्रवाद गहरे तक जड़े जमाए हुए हैं. जब भी ईरान पर हमला होता है ये देश एकजुट होकर पलटवार करता है.

क़मर आग़ा कहते हैं, "ईरान की सरकार अभी तक तो बहुत मज़बूत है. वहां विपक्ष के पास कोई बड़ा नेता नहीं है. लोगों में नाराज़गी है और पहले कई प्रदर्शन भी हुए थे. लोगों को लगता है कि ईरान के पास बाहर से धन आया, व्यापार बढ़ा. तेल के रुके हुए पेमेंट मिले लेकिन उसका असर उनको दिख नहीं रहा था. इसका फ़ायदा वहां रुढ़िवादी तबके को मिला है."

क़मर आग़ा ये दावा भी करते हैं कि असंतोष इतना ज़्यादा नहीं है कि फ़िलहाल सरकार बदल जाए.

हालांकि, हक़ीकत ये भी है कि हसन रुहानी के लिए सरकार चलाना भी आसान नहीं है. ईरान ने पाबंदियों का सामना पहले भी किया है लेकिन इस बार के प्रतिबंध सबसे कड़े हैं. अमरीका ने कई और प्रतिबंध लागू करने की चेतावनी भी दी है.

भारत और चीन फ़िलहाल ईरान के साथ संबंधों की डोर तोड़ने को तैयार नहीं लेकिन उनके लिए अमरीकी दबाव को पूरी तरह दरकिनार करना भी आसान नहीं होगा.

ऐसे में ईरान की मौजूदा सरकार ट्रंप प्रशासन के टशन से कैसे और कब तक टक्कर लेगी, इस पर पूरी दुनिया की नज़र है.

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