तेल के खेल में अमरीका कितना बड़ा खिलाड़ी?

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- Author, उमीद शुकरी
- पदनाम, ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ, बीबीसी फारसी के लिए
अमरीका की शेल गैस इंडस्ट्री में हुई जबर्दस्त तरक्की ने उसे ऊर्जा आयातक देश से ऊर्जा निर्यातक देश में बदल दिया है.
शेल गैस एक तरह की प्राकृतिक गैस है जो अवसादी चट्टानों के बीच में पाई जाती है.
तेल या ऊर्जा की अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों पर इसका बहुत असर पड़ता है.
शेल गैस के क्षेत्र में ये क्रांति नई टेक्नॉलॉजी और रिसर्च के नए तौर-तरीकों के कारण आई.
इस क्रांति से पहले अमरीका अपनी तेल और ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी स्रोतों खासकर मध्य-पूर्व के देशों पर निर्भर था और उसकी ये निर्भरता लगातार बढ़ती ही जा रही थी.
अमरीका के ऑयल एंड एनर्जी इंस्टीट्यूट के साल 2018 के आंकड़ों के अनुसार, "अमरीका रोज़ाना लगभग 10 मिलियन बैरल से अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करता है."
"राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल के दौरान साल 2011 में अमरीका ने अपनी तेल खपत का 52 फीसदी हिस्सा दूसरे देशों ख़ासकर ओपेक के सदस्य देशों से आयात किया था."
"लेकिन अब 2018 में अमरीका प्रतिदिन लगभग चार मिलियन बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है. शेल गैस के विकास के साथ ही अब अमरीका एलएनजी (लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस) भी निर्यात करने लगा है."

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शेल गैस और अमरीकी विदेश नीति
राष्ट्रपति ओबामा के दौर में अमरीका की विदेश नीति पर शेल गैस का सबसे ज़्यादा असर देखने को मिला.
साल 2011 में अमरीका ने 'भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का एजेंडा' तैयार किया था.
इसमें शेल गैस के उत्पादन का ज़िक्र किया गया था. इसमें कहा गया था कि ये गैस भविष्य में अमरीका की ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होगी और ऊर्जा के इस स्रोत का विकास भविष्य में अमरीका की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने की गारंटी भी देगा.
राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में विदेशों से आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो गई.
पेट्रोल के इस्तेमाल में कमी लाने के लिए भी ज़रूरी क़दम उठाए गए और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाई गई.
फ़रवरी 2013 के अमरीकी कांग्रेस के 113वें अधिवेशन में एलएनजी के निर्यात के मुद्दे पर जमकर बहस की गई.

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तेल की राजनीति
अमरीकी सीनेट की ऊर्जा समिति के सदस्यों ने इस बात पर काफ़ी ज़ोर दिया कि अमरीका के कच्चे तेल और शेल गैस के उत्पादन में इजाफे ने ईरान के विरुद्ध अमरीकी प्रतिबंध को मज़बूत करने में योगदान दिया है.
फिर अमरीकी कांग्रेस ने मई महीने में एक प्रस्ताव पारित किया कि यूरोपीय संघ को एलएनजी का निर्यात बढ़ाया जाए ताकि वह रूस से कच्चे तेल के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सके.
इसी प्रकार अमरीकी कांग्रेस ने ये भी फ़ैसला किया कि दक्षिणी कोरिया और पूर्वी एशिया के अन्य सहयोगी देशों को भी अमरीका एलएनजी निर्यात करे.
अमरीका के ये सहयोगी देश मध्य पूर्व के देशों पर तेल के लिए निर्भर हैं और अमरीकी कांग्रेस के प्रस्ताव का यही मक़सद था कि वे मध्य पूर्व के देशों पर अपनी निर्भरता कम करें.
ईरान के साथ हुए परमाणु करार से बाहर निकलने का फैसला भी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका की ऊर्जा निर्यात की क्षमता हासिल कर लेने के बाद किया था.
एलएनजी गैस के निर्यात का मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप के लिए हमेशा से अहम रहा है.

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ईरान और रूस
ये मुमकिन है कि अमरीकी प्रतिबंध के कारण ईरान से कच्चे तेल के निर्यात में प्रतिदिन एक मिलियन बैरल के हिसाब से कमी आ सकती है.
लेकिन ये भी मुमकिन नहीं लगता कि है कि विश्व बाज़ार में अमरीका का कच्चा तेल और गैस ईरान से होने वाली कमी की भरपाई कर सकता है.
इसकी एक वजह तो ये भी है कि ईरान के कच्चे तेल की केमिकल प्रॉपर्टी अमरीका शेल गैस से अलग है.
अमरीका दुनिया भर के देशों को एलएनजी और अन्य ऊर्जा स्रोत बेचकर उनके साथ संबंधों में विस्तार करना चाहता है और उसे नई दिशा देना चाहता है.
यूरोपीय संघ के देश अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए रूस पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं और इस वजह से अमरीका यूरोप के ऊर्जा बाज़ार पर विशेष ध्यान दे रहा है.
अमरीका यूरोप में अपना एलएनजी निर्यात बढ़ा रहा है और साथ ही अपने गैस सप्लाई लाइन के दक्षिणी कॉरिडोर को जल्दी पूरा करने में लगा हुआ है ताकि यूरोप की ऊर्जा निर्भरता रूस पर कम हो सके.
पूर्वी एशिया का बाज़ार ख़ास कर के दक्षिणी कोरिया और जापान बड़ी मात्रा में ईरान से लिक्विफ़ाइड गैस खरीदते हैं.
अब ईरान पर प्रतिबंध के कारण अमरीकी एलएनजी कोरिया की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम रोल निभाएगा.
कोरिया और जापान की ईरान से आयातित तेल और लिक्विफ़ाइड गैस पर निर्भरता के मद्देनज़र अब ईरान पर प्रतिबंध के मामले में अमरीकी एलएनजी की भूमिका खुलकर सामने आएगी.

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दक्षिण कोरिया
दक्षिण कोरिया ईरान के लिक्विफ़ाइड गैस का बहुत बड़ा ख़रीदार है.
ईरान का 55 प्रतिशत से अधिक लिक्विफ़ाइड गैस अकेले कोरिया आयात करता है.
ईरानी तेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार दक्षिण कोरिया ने साल 2017 में ईरान से प्रतिदिन लगभग 428 बैरल लिक्विफ़ाइड गैस खरीदा.
लेकिन अमरीका के ईरान वार्ता से बाहर निकलने के बाद दक्षिण कोरिया की ज्यादातर बड़ी कंपनियों ने ईरान से आयात में कमी की है.
ऊर्जा मामलों पर कंसल्टेंसी देने वाली फर्म एसएंडपी प्लैट्स के रिपोर्ट्स के अनुसार दक्षिण कोरियाई कंपनी हान्वा टोटल पेट्रोकेमिकल ईरान के लिक्विफ़ाइड गैस की सबसे बड़ी खरीदार है.
इस कंपनी ने साल 2018 के पहले छह महीने में ईरान से 15.92 मिलियन बैरल लिक्विफ़ाइड गैस खरीदा.
लेकिन अगस्त महीने में हान्वा टोटल पेट्रोकेमिकल ने ईरान से अपने आयात में एक-तिहाई की कमी की है और अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए क़तर और अमरीका की तरफ़ रुख़ किया है.

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जापान
पूर्वी एशिया में जापान तेल का एक बहुत बड़ा ख़रीदार है.
जापान के तेल विभाग के आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 में प्रतिदिन 182,216 बैरल कच्चा तेल ईरान से आयात किया गया था.
लेकिन इस साल इसमें 24.2 फीसदी की कमी आई है.
साल 2018 में जापान की सभी तेल रिफ़ाइनरियों का 5.3 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आया था.
अमरीका के ईरान वार्ता से बाहर आ जाने के बाद जापान ने ईरान से तेल की आयात में कमी करने के लिए ये क़दम उठाया है.
जापान अपनी ज़रूरतों का 5.5 फीसदी कच्चा तेल ईरान से आयात करता है.
जापान के आर्थिक और व्यापार मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार जापान ने अगस्त के महीने में ईरान से प्रतिदिन 177,475 बैरल के हिसाब से यानी हर महीने 3.39 मिलियन बैरल तेल आयात किया है.
यही कारण था कि जापान ने अमरीका से ईरान को माफ़ करने की बात की थी मगर ट्रंप ने इस को ठुकरा दिया था.
ऐसा अंदाजा है कि अमरीकी एलएनजी और लिक्विफ़ाइड गैस के निर्यात से जापान में ईरान के तेल के बाज़ार को काफ़ी धक्का लगेगा.

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ईरान के साथ कारोबार में रिस्क
ईरान के ऊर्जा एवं तेल उद्योग के विरुद्ध एक के बाद एक प्रतिबंध से ईरान के तेल और गैस के उत्पादन में तो कमी आई ही है, साथ ही विश्व के तेल बाज़ार में ईरान का निवेश और भागीदारी भी घटी है.
और इसका नतीज़ा ये निकला है कि ईरान के ऊर्जा और तेल उद्योग में निवेशकों के लिए रिस्क बहुत बढ़ गया है.
ईरान में तेल और गैस के उत्पादन में कमी और संभावित निर्यात में गिरावट के मद्देनज़र उसे विश्व बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थानों से कर्ज़ लेने में काफ़ी कठिनाइयां आ रही हैं.
तेल और गैस से मिलने वाली विदेशी मुद्रा ईरान के विकास के लिए ज़रूरी तो है ही, अब इसमें कमी के कारण घरेलू मोर्चे पर भी इसका बुरा असर पड़ने का अंदेशा है.
अब जब कि विश्व में गैस और एलएनजी के बहुत सारे उत्पादक हो गए हैं.
और ऐसे में तेल और गैस के बाज़ार में ईरान की भागीदारी केवल एक प्रतिशत रह गई है तो ये स्थिति ईरान के विरोधियों के लिए इस मार्केट में उसकी जगह पर कब्ज़ा करने का अच्छा मौका है.

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ओबामा के दौर में...
अमरीका की कच्चे तेल और शेल गैस के उत्पादन में इजाफे के कारण ईरान को अब नए बाज़ार की ज़रूरत बहुत बढ़ गई है.
हालांकि अमरीका की शेल गैस और और ईरान के कच्चे तेल की रासायनिक विशेषताएं भिन्न हैं और एलएनजी के क्षेत्र में भी ईरान को अमरीका से कोई मुक़ाबला नही है, क्योंकि अभी ईरान एलएनजी का उत्पादन ही नहीं करता है.
अभी ये भी पता नहीं है कि ईरान के पास कब इतना पैसा और ज़रूरी टेक्नॉलॉजी होगी जब वह अपनी आधी तैयार एलएनजी प्लांट को पूरा कर पाएगा?
राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल में प्रतिबंध के कारण ईरान का एलएनजी प्लांट अधूरा रह गया था.
और अभी एसी कोई उमीद भी नहीं हैं कि निकट भविष्य में ईरान एलएनजी का उत्पादन शुरू कर पाएगा और एलएनजी के बाज़ार में भागीदार बन पाएगा.

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ट्रंप प्रशासन की सख्ती
ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर जो पाबंदियां लगाई हैं, उसके बुरे असर आने वाले वक्त में दिखेंगे.
इससे ईरान का तेल का बाज़ार घटेगा, फिर उत्पादन में कमी आएगी और परिणामस्वरूप ईरान में विदेशी निवेश प्रभावित होगा.
इसका प्रभाव अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों होगा.
भारत और तुर्की को अमरीकी एलएनजी की निर्यात ईरान के लिए एक और ख़तरे की घंटी है.
इससे उसके क्षेत्रीय बाज़ार पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा.
अब ईरान अगर अपने क्षेत्रीय और विश्व बाज़ार को बचाना चाहता है तो उसके सामने केवल एक ही उपाय है कि वह क्षेत्रीय देशों और विश्व के बड़े देशों से बातचीत के लिए आगे आए और इसी में उसका दो तरफ़ा फ़ायदा है.

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ईरान के पास रास्ते
बिना विदेशी पूंजी और टेक्नॉलॉजी के ईरान के लिए विश्व तेल बाज़ार में अपने आप को बरक़रार रखना बहुत मुशकिल है.
खासकर ऐसे हालात में जब कि नए खिलाड़ी आधुनिक टेक्नॉलॉजी के साथ मैदान में आ रहे हैं.
और यह भी कि प्रतिबंध के कारण ईरान के लिये विदेशी टेक्नॉलॉजी और पूंजी हासिल करना मुश्किल हो गया है.
अभी प्रतिबंध के कारण ईरान जिन देशों के बाज़ार से हाथ धो बैठा है, प्रतिबंध उठा लिए जाने के बाद दोबारा उसी बाज़ार को फिर से हासिल करना आसान नहीं होगा.
इस लिए ईरान की विदेश नीति और ऊर्जा नीति के विशेषज्ञों को ये बातें ध्यान में रख कर भविष्य के लिए नीति निर्धारण करना पड़ेगा.
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