5 वजहें : क्यों सऊदी अरब पश्चिमी ताक़तों के लिए ज़रूरी है

सऊदी अरब

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अगर ये साबित होता है कि पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या में सऊदी अरब का हाथ है तो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने उसे कड़ी सज़ा भुगतने की धमकी दी है.

बीते दो अक्टूबर को तुर्की स्थित अंकारा में सऊदी के वाणिज्य दूतावास में ख़ाशोज्जी गए थे और उनके बाद ज़िंदा बाहर आने के कोई सबूत नहीं मिले हैं.

तुर्की का कहना है कि ख़ाशोज्जी की सऊदी के एजेंटों ने हत्या कर दी. दूसरी तरफ़ सऊदी अरब ने तुर्की के अधिकारियों के दावों को झूठ कह कर ख़ारिज कर दिया है.

सऊदी ने भी पश्चिमी ताक़तों की ओर से प्रतिबंध की आशंका को देखते हुए पलटवार करने की धमकी दी है. हालांकि एक हक़ीक़त ये भी है कि सऊदी अरब पर सख़्त कार्रवाई करना इतना आसान भी नहीं है, क्या है इसकी वजहें-

पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी

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1. तेल की आपूर्ति और क़ीमतें

पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों (ओपेक) के संगठन के अनुसार, सऊदी अरब के पास विश्व के तेल भंडारों का लगभग 18 फ़ीसदी हिस्सा है और ये दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है.

इस वजह से सऊदी की विश्व में ताक़त और प्रभाव है.

उदाहरण के लिए, अमेरिका या अन्य देश अगर सऊदी पर प्रतिबंध लगाते हैं तो सऊदी सरकार तेल उत्पादन कम कर सकती है. इसकी वजह से विश्व में तेल का दाम बढ़ जाएगा जब तक दूसरे निर्यातक देश इस कमी को पूरा नहीं कर पाते.

रविवार को प्रकाशित एक संपादकीय में, सऊदी सरकार के अल अरबिया टीवी के महाप्रबंधक तुर्कि अल्दखिल ने कहा कि सऊदी पर प्रतिबंध लगाने से एक ऐसी आर्थिक आपदा आएगी जो पूरी दुनिया को प्रभावित करेगी.

"अगर तेल की क़ीमत 80 डॉलर पहुंचने पर राष्ट्रपति ट्रंप इतने नाराज़ हो गए तो किसी को इस आशंका से इनकार नहीं होना चाहिए कि क़ीमत 100 डॉलर या 200 डॉलर या इससे दोगुनी भी हो सकती है."

सऊदी अगर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ाता है तो ये उपभोक्ताओं पर भारी पड़ेगी और पेट्रोल पंप पर क़ीमतें बढ़ेंगी.

2. सैन्य अनुबंध

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स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) के अनुसार, सऊदी अरब के पास 2017 में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रक्षा बजट था.

उस वर्ष देश ने अमेरिका के साथ 110 अरब डॉलर के हथियार सौदे पर हस्ताक्षर किए. साथ ही 10 सालों में 350 अरब डॉलर ख़र्च करने का विकल्प भी था.

व्हाइट हाउस के मुताबिक ये सौदा अमरीका के इतिहास में सबसे बड़ा था.

सऊदी अरब को हथियारों बेचने वाले अन्य देशों में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी शामिल हैं.

अल्दखिल के संपादकीय से पता चलता है कि किसी भी प्रतिबंध के ख़िलाफ़ सऊदी अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन और रूस का रूख़ कर सकता है.

3. सुरक्षा और आतंकवाद

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पश्चिमी ताक़तवर देशों ने ज़ोर देकर कहा है कि सऊदी अरब मध्य पूर्व में सुरक्षा बनाए रखने और चरमपंथ और आतंकवाद का मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरिज़ा मे ने सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए उसका बचाव किया है. बावजूद इसके कि यमन में सऊदी पर युद्ध अपराधों का आरोप लगाया जा रहा है, उन्होंने कहा कि "सऊदी ने ब्रिटेन की सड़कों पर लोगों को सुरक्षित रखने में मदद की है."

इस्लाम का जन्मस्थान सऊदी अरब, इस्लामी राज्य (आईएस) समूह से जूझ रहे अमेरिकी नेतृत्व वाले वैश्विक गठबंधन का सदस्य है और पिछले साल 40 अन्य इस्लामी राज्यों के साथ मिलकर इसने आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्लामी मिलिट्री काउंटर गठबंधन बनाया था.

अल्दखिल का अनुमान है कि ख़शोज्जी मामले में सऊदी पर कोई प्रतिबंध लगते हैं तो सऊदी और अमरीका समेत बाकी पश्चिमी देशों के बीच भरोसेमंद जानकारी साझा करना अतीत की बात हो जाएगी.

4. क्षेत्रीय गठबंधन

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ईरान के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए सऊदी अरब ने अमेरिका के साथ मिलकर काम किया है.

ये दोनों सुन्नी और शिया मुस्लिम देश दशकों से मध्य पूर्व में परोक्ष रूप से संघर्ष कर रहे हैं.

सीरिया में सऊदी अरब ने राष्ट्रपति बशर अल-असद को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे विद्रोही गुटों का समर्थन किया है, जबकि ईरान ने रूस के साथ-साथ युद्ध के ज्वार को अपने पक्ष में बदलने में मदद की है.

अपने संपादकीय में अल्दखिल ने चेतावनी दी कि अमेरिकी प्रतिबंधों और नए हथियार सौदों के परिणामस्वरूप सऊदी अरब और ईरान के बीच बेहतर संबंध और सुलह भी हो सकती है.

5. व्यापार और निवेश

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अल अरबिया के महाप्रबंधक अल्दखिल ने यह भी कहा कि अमेरिकी कंपनियां सऊदी बाज़ार तक पहुंचने से "वंचित" भी हो सकती हैं.

सऊदी अरब के साथ अमेरिका के व्यापार में 2017 में 46 अरब डॉलर का इजाफ़ा हुआ. अमेरिका के वाणिज्य मंत्रालय ने अनुमान लगाया कि द्विपक्षीय व्यापार की वजह से 2015 में अमेरिका में तकरीबन 1 लाख 65 हज़ार नौकरियां आईं.

अगस्त में, सऊदी अरब ने कनाडा के साथ सभी नए व्यापार पर रोक लगा दी क्योंकि कनाडा उसके घरेलू मामलों में "हस्तक्षेप" कर रहा था. कनाडा ने हिरासत में लिए गए नागरिक और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को छोड़ने की बात कही तो सऊदी ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन माना.

सऊदी ने कनाडा के अनाज के आयात पर भी रोक लगा दी और कनाडा के विश्वविद्यालयों में सरकारी छात्रवृत्ति पर पढ़ रहे हजारों सऊदी छात्रों को वापस आने का आदेश दे डाला.

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