तेल पर क्या वाक़ई इस क़दर लाचार है मोदी सरकार

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, दिल्ली
तेल की क़ीमत बढ़ने का सिलसिला थम नहीं रहा है और केंद्र की मोदी सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं.
मंगलवार को महाराष्ट्र के परभणी शहर में तेल की क़ीमत 90.02 रुपए प्रति लीटर पहुंच गई. मुंबई में पेट्रोल 88.26 रुपए प्रति लीटर है और दिल्ली में 80.87 रुपए. दिल्ली में डीजल 72.97 रुपए प्रति लीटर है और मुंबई में 77.47 रुपए.
सोमवार को विपक्ष ने तेल की बढ़ती क़ीमतों के ख़िलाफ़ भारत बंद का आयोजन किया था. देश भर में बंद का असर भी दिखा. बंद के दौरान कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी भी दिल्ली में सड़क पर उतरे. राहुल ने तेल की बढ़ती क़ीमतों पर मोदी सरकार को जमकर निशाने पर लिया.
राहुल ने कहा, ''मोदी पर 2014 में लोगों ने काफ़ी भरोसा किया था पर अब चीज़ें साफ़ हो गई हैं. पूरे देश में मोदी घूमते थे और पेट्रोल डीज़ल की महंगाई की बात करते थे. आज क़ीमतें आसामन छू रही हैं तो मोदी चुप हैं.''
कांग्रेस के जवाब में केंद्र में बीजेपी सरकार के मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ़्रेस की और कहा कि तेल की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय कारणों से बढ़ रही है और सरकार इस पर कुछ नहीं कर सकती है.

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लाचार सरकार?
क्या सरकार वाक़ई इतनी लाचार है कि वो कुछ नहीं कर सकती है? क्या मसला केवल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की बढ़ती क़ीमत है?
अगर पेट्रोल की क़ीमत 90 रुपए प्रति लीटर है तो इसमें आधा सरकार की तरफ़ से लगाए जाने वाले टैक्स हैं. इसमें केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क लगाती है तो राज्य सरकारें वैट लगाती हैं.
तेल इंडस्ट्री की अर्थव्यवस्था की अच्छी समझ रखने वाले और वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''ये बिल्कुल सच है कि हर साल भारत में कच्चे तेल की जितनी खपत है उसका 80 फ़ीसदी से ज़्यादा हम आयात करते हैं. ये भी सच है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत लगातार बढ़ रही है. इसके साथ ही भारतीय मुद्रा रुपया अमरीकी मुद्रा डॉलर की तुलना में लगातार कमज़ोर हो रहा है. मतलब हम तेल के आयात पर जो पैसे ख़र्च करते हैं वो ज़्यादा करने पड़ रहे हैं. ज़ाहिर है इसका असर देश की घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.''

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ठाकुरता कहते हैं, ''पर ये एक सच्चाई है. दूसरी सच्चाई यह है कि मोदी सरकार ने तेल की क़ीमतें तब भी कम नहीं कीं जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत 30 डॉलर प्रति बैरल थी. भारत की सारी सरकारें तेल बेचकर राजस्व कमाती रही हैं. मतलब राजस्व का बड़ा हिस्सा सरकार टैक्स लगाकर जुटाती रही है. तेल पर केंद्र सरकार 30 फ़ीसदी से 40 फ़ीसदी उत्पादन शुल्क लगाती है. तेल से राजस्व इसलिए भी ज़्यादा आता है क्योंकि अब भी तेल सरकारी कंपनियां ही बेच रही हैं. अगर केंद्र सरकार उत्पादन शुल्क में प्रति लीटर दो रुपए की कटौती कर देती है तो सरकार के राजस्व कलेक्शन में 28 से 30 हज़ार करोड़ रुपए की कमी आएगी.''
ठाकुरता कहते हैं, ''जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 115 डॉलर प्रति बैरल थी. आठ महीने बाद जनवरी 2015 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत एकदम से गिरकर 25 डॉलर प्रति बैरल हो गई. इसके बाद तेल की क़ीमत धीरे-धीरे बढ़ी और आज 72 से 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हो गई है.''

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वो कहते हैं, ''सवाल यह उठ रहा है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत कम थी तब भारतीयों को इसका फ़ायदा क्यों नहीं दिया गया? इसका पूरा फ़ायदा भारत सरकार ने अपनी झोली भरने में उठाया. केंद्र की मोदी सरकार ने इन तीन-साढ़े तीन सालों में अपने राजस्व में 10 लाख करोड़ जुटाया. इसका फ़ायदा जो उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए था वो नहीं मिला. केंद्र सरकार राज्यों से कह रही है टैक्स कम करे, लेकिन ख़ुद नहीं कर रही.''
2011-12 में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति बैरल थी और तब तेल क़ीमत आज की तुलना में कम थी जबकि आज की तारीख़ में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत 75 डॉलर प्रति बैरल है फिर भी ज़्यादा है.
जिस क़ीमत पर डीलरों को सरकर तेल देती है वो काफ़ी कम होती है, लेकिन उत्पाद शुल्क और राज्य सरकारों के वैट के बाद क़ीमतें दोगुनी हो जाती हैं.

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सरकार आख़िर इतना ज़्यादा टैक्स क्यों लगाती है?
केंद्र और राज्य सरकारों के राजस्व का बड़ा हिस्सा पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले टैक्स से आता है. मध्य प्रदेश पेट्रोल पर सबसे ज़्यादा 40 फ़ीसदी वैट लगाता है. सभी राज्य सरकारों ने पेट्रोल पर 20 फ़ीसदी से ज़्यादा वैट लगा रखा है.
गुजरात और ओडिशा को छोड़ बाक़ी राज्यों ने डीजल पर कम वैट रखा है. हालांकि गोवा में डीजल पर ही ज़्यादा वैट है. राज्यों के बजट में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले वैट का योगदान क़रीब 10 फ़ीसदी है.
राज्य सरकारें तेल को जीएसटी के दायरे में लाने को तैयार नहीं हैं. जीएसटी की अधिकतम दर 28 फ़ीसदी है और इसमें राज्यों का शेयर 14 फ़ीसदी होगा. ज़ाहिर है वैट से मिलने वाले राजस्व में भारी कमी आएगी. इसीलिए डीजल और पेट्रोल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है.
दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार के उत्पाद शुल्क को देखें तो कुल टैक्स राजस्व में इसका हिस्सा 23 फ़ीसदी है और उत्पाद शुल्क से हासिल होने वाले राजस्व में डीजल-पेट्रोल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क का हिस्सा 85 फ़ीसदी है.

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इसके साथ ही केंद्र के कुल कर राजस्व में इसका हिस्सा 19 फ़ीसदी है. सितंबर 2014 से पांच बार तेल पर संघीय टैक्स में बढ़ोतरी हुई और यह बढ़ोतरी 17.33 रुपए प्रति लीटर तक गई. पिछले साल अक्तूबर में इसमें दो रुपए प्रति लीटर की कटौती की गई थी.
भारत में पेट्रोलियम से जुड़े उत्पाद में डीजल की खपत 40 फ़ीसदी है. सार्वजनिक परिवहनों में डीजल सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है. डीजल के बारे में भारत में कहा जाता है कि इसका महंगाई दर पर 'ट्रिकल डाउन इफेक्ट' पड़ता है. मतलब डीजल महंगा हुआ तो ज़रूरत के कई सामान महंगे हो जाएंगे.
परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, ''अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत कम होने का फ़ायदा सरकारें ले रही हैं और ज़्यादा होने की क़ीमत जनता चुका रही है. सरकार कूटनीति के स्तर पर भी नाकाम दिख रही है. आप अमरीका को मनाने में क्यों सफल नहीं हो रहे कि वो ईरान से तेल आयात करने से ना रोके? ईरान आपको रुपए पर भी तेल देता है. आप सऊदी और इराक़ को रुपए से तेल देने पर क्यों नहीं तैयार नहीं कर पा रहे हैं?''

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कई विशेषज्ञों का मानना है कि तेल बेचने वाले देशों के संगठन ओपेक की मनमानी के कारण भी कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ रही है.
बीजेपी नेता और तेल मामलों पर पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले नरेंद्र तनेजा का कहना है कि तेल बेचने वालों की तरह तेल ख़रीदने वालों का भी संगठन होना चाहिए ताकि मनमानी क़ीमतों को काबू में किया जा सके.
क्या मोदी सरकार ने लुभावने विज्ञापन दिए थे इसलिए ज़्यादा सवाल उठ रहे हैं? इस पर तनेजा कहते हैं कि उनकी सरकार में कोई अनिर्णय की स्थिति नहीं है, इसलिए वादों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है.
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