उर्दू प्रेस रिव्यू: इमरान ख़ान ने कहा, पाकिस्तान पास क़र्ज़ की क़िस्त चुकाने के भी पैसे नहीं

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था से जुड़ी ख़बरें सबसे ज़्यादा प्रमुखता से पन्नों पर दिखीं.

पाकिस्तान ने देश की मौजूदा आर्थिक बदहाली के लिए ज़िम्मेदार लोगों का चयन करने के लिए एक संसदीय समिति गठन करने का फ़ैसला किया है.

अख़बार जंग के अनुसार प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इस बारे में फ़ैसला किया गया.

अख़बार के अनुसार संसदीय कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद केंद्र सरकार उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का फ़ैसला करेगी.

पाकिस्तान इन दिनों बदतरीन आर्थिक बदहाली के दौर से गुज़र रहा है.

इससे पहले इमरान ख़ान ने लोगों से अपील की थी कि वो डरें नहीं और दावा किया कि केवल छह महीने में अर्थव्यवस्था ठीक हो जाएगी.

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार 50 लाख नए घर बनाने की योजना का उद्घाटन करते हुए इमरान ख़ान का कहना था कि अगर पाकिस्तान से सिर्फ़ मनी लॉंड्रिंग रोक दी जाती तो पाकिस्तान को बाहर से क़र्ज़ लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

उन्होंने कहा कि 10-12 अरब डॉलर की तत्काल ज़रूरत को पूरा करने के लिए साथी देशों के अलावा आईएमएफ़ (इंटरनेशनल मॉनेट्री फ़ंड) से संपर्क किया गया है.

इमरान का कहना था, ''तहरीक-ए-इंसाफ़ सरकार को 18 अरब डॉलर का घाटा पिछली सरकार से तोहफ़े में मिला है. आने वाले दिनों में पाकिस्तान के पास इतने पैसे नहीं हैं कि क़र्ज़ की क़िस्त अदा की जा सके. हमें क़र्ज़ इसलिए चाहिए कि पिछले क़र्ज़ की क़िस्त अदा कर सकें.''

उधर, आईएमएफ़ से क़र्ज़ मांगने की बात सामने आने के बाद पाकिस्तान में एक नई बहस छिड़ गई है.

पाकिस्तान के केंद्रीय वित्त मंत्री असद उमर ने कहा है कि उन्होंने कभी भी आईएमएफ़ के पास न जाने की बात नहीं कही थी.

उनके अनुसार बेलआउट पैकेज के लिए किसी न किसी के पास तो जाना ही था.

पाकिस्तानी वित्त मंत्री ने अमरीका के इस आरोप को भी ग़लत क़रार दिया है कि सीपेक (चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) क़र्ज़ों के कारण पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बिगड़ी है और उसे आईएमएफ़ के पास जाना पड़ रहा है.

अख़बार जंग के अनुसार पाकिस्तानी वित्त मंत्री असद उमर ने कहा कि चीन और सऊदी अरब ने कभी भी क़र्ज़ देने के लिए सख़्त शर्तें नहीं रखी हैं.

इमरान के वादे पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित

इमरान ख़ान की सरकार 50 लाख नए घर बना पाएगी या नहीं ये तो फ़िलहाल कहना मुश्किल है, लेकिन पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश ने इस पर चिंता जताई है.

दरअसल नए घर बनाने के लिए कच्चे घरों में रहने वालों को सरकार वहां से हटाना चाहती है जिसका बस्तियों में रहने वाले लोग विरोध कर रहे हैं.

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान लिया है और ख़ुद मुख्य न्यायाधीश इसकी सुनवाई कर रहे हैं.

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार सुनवाई के दौरान चीफ़ जस्टिस मियां साक़िब निसार ने सख़्त लहजे का इस्तेमाल करते हुए कहा, ''कच्ची बस्तियों में रहने वाले भी इंसान हैं कोई कीड़े मकौड़े नहीं. जबतक उनको कोई दूसरा घर नहीं मिल जाता उन्हें बेदख़ल नहीं किया जा सकता है.''

अख़बार के अनुसार चीफ़ जस्टिस ने आगे कहा कि अगर कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोगों की हालत के बारे में जानना है तो हिचकी फ़िल्म देखनी चाहिए.

50 लाख घर बनाने के इमरान ख़ान के फ़ैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए चीफ़ जस्टिस का कहना था,

''50 लाख घर बनाना ख़ाला जी का घर नहीं. सिर्फ़ एलान से नहीं बनेंगे. कबूतरों का पिंजरा बनाते समय भी देखा जाता है कि इसमें कितने कबूतर आएंगे.''

'मंडेला बनने की कोशिश कर रहे हैं शहबाज़'

भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ़्तार मुस्लिम लीग (नून) के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ़ भी सुर्ख़ियों में बने रहे.

इमरान ख़ान ने शहबाज़ शरीफ़ पर जमकर हमला करते हुए कहा, ''शहबाज़ शरीफ़ नेल्सन मंडेला बनने की कोशिश कर रहे हैं. और उनके साथी इसलिए शोर मचा रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने पकड़े जाने का डर है.

इमरान ख़ान ने भ्रष्टाचार निरोधी संस्था नेशनल एकाउंटिबिलीटी ब्यूरो (नैब) के कामकाज की भी आलोचना की.

इमरान का कहना था, ''मुझे कुछ मामले में नैब अध्यक्ष से मतभेद है. उनकी रफ़्तार बहुत सुस्त है. आपको जो मदद चाहिए वो आपको दी जाएगी.''

जजों की निगरानी

पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश मियां साक़िब निसार ने ख़ुद न्यायपालिका पर भी नज़र रखने और जजों की निगरानी करने की बात कही है.

निचली अदालतों के काम करने के तौर-तरीक़ों की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश का कहना था, ''लोग चीख़-चीख़ कर मर रहे हैं, तड़प रहे हैं, बिलख रहे हैं, इंसाफ़ नहीं मिल रहा है. लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं. अब जजों का भी हिसाब होगा.''

निचली अदालत के जजों की आलोचना करते हुए जस्टिस साक़िब निसार का कहना था, ''जज हज़रात जितनी भारी तन्ख़्वाह लेते हैं उतना काम भी करें. सरकार में बैठे लोग अपना काम ठीक से करें ताकि हमें हस्तक्षेप न करना पड़े.''

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