वुसअतुल्लाह ख़ान का ब्लॉग: संयुक्त राष्ट्र में भारत-पाकिस्तान का सर्कस ना हो तो...

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- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
बचपन में पूरा साल इस इंतज़ार में गुज़रता था कि कब ईद आएगी और मैं ईदगाह के बराबर वाले मैदान में लगने वाला लकी ईरानी सर्कस देखने जाऊंगा.
सर्कस क्या था पूरा पैकेज था. बड़े खेमे के बाहर एक फट्टे पर हिजड़े नाचा करते थे. खेमे के अंदर एक रस्से से लटकते ज़िमनास्ट उड़कर दूसरे रस्से को इतनी ऊंचाई पर पकड़ते कि दिल उछलकर हलक में आ जाते.
दो हाथी लकड़ी की एक बड़ी पीढ़ी पर अपने अगले पैर जमाकर ज़ोर से चिंघाड़ते और फिर सूंड़ उठाकर सलामी पेश करते.
और फिर रिंग का चक्कर काटकर इन्हीं सूंड़ों में तमाशाइयों से नोट पकड़कर महावत के हवाले करते.
मगर मुझे सबसे ज़्यादा मज़ा उन दो मसखरों को देखकर आता, जिनके चेहरों पर लाल-सफ़ेद पेंट पुता हुआ होता और वो रिंग में कलाबाज़ियां करते हुए आते.
एक दूसरे को ज़लील करने वाले जुमले बोल-बोलकर एक दूसरे के पेट पर चमड़े के कोड़े मारते और तमाशा देखने वालों के पेट में हंस-हंसकर बल पड़ जाते.
अब मैं भी बूढ़ा हो गया हूं और लकी ईरानी सर्कस भी नहीं लगता. इसके बदले अब में पूरा साल सिर्फ़ एक महीने का बहुत बेचैनी से इंतज़ार करता हूं.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा का इंतज़ार
मैं इंतज़ार करता हूं कि कब सितंबर आएगा और कब संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की वार्षिक बैठक होगी, जिसमें भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री एक-दूसरे के मुंह पर कालिख फेकेंगे और उनके जाने के बाद एक देश के मंत्रालय के जूनियर अफ़सर दूसरे देश का कच्चा चिट्ठा खोलने और घटिया साबित करने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे.
जैसे ही आम सभा की महीने भर की वार्षिक बैठक ख़त्म होगी, बचे हुए तीर, भाले, नेज़े, तलवारें, मुगदर लपेट-लपाटकर दिल्ली और इस्लामाबाद लौट जाएंगे और फिर अगले साल की तैयारी के लिए इन हथियारों को ज़हर में बुझाने या सान को तेज़ करने के लिए रख छोड़ेंगे.

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ऐसा नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र वार्षिक सम्मेलन में मुक़ाबला सिर्फ़ भारत-पाकिस्तान के बीच ही होता है. बल्कि ईरान, इसराइल, सऊदी अरब, चीन, अफ़ग़ानिस्तान, फ़लस्तीन, रूस, अमरीका, उत्तर कोरिया जैसे देश भी एक दूसरे की जमकर ख़बर लेते हैं.
मगर जैसा मनोरंजन भारत और पाकिस्तान बाक़ी देशों के लिए रचाते हैं, उसकी तो बात ही अलग है. अगर भारत-पाकिस्तान न्यूयॉर्क में हर साल अपना सर्कस ना लगाएं, तो आम सभा में लंबे-लंबे भाषणों के सिवा क्या बचेगा?
यही लोगों से दिनभर की मुलाकातों का हासिल है, दिलों में नफ़रतें आबाद करना और सो जाना.
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