ब्राजील चुनाव : मैदान में 'ट्रंप' और 'इमरान ख़ान'?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में गिने जाने वाले ब्राज़ील में अगले महीने होने जा रहे चुनाव का प्रचार अभियान चल रहा है.
ये देश बीते कुछ सालों से कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है. लोगों को उम्मीद है कि चुनाव उनके लिए नया सवेरा लेकर आएगा और देश फिर से आर्थिक प्रगति की राह पर चल निकलेगा.
क्षेत्रफल के हिसाब से ब्राज़ील दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा और आबादी के हिसाब से छठा सबसे बड़ा देश है. ये देश जैविक और भौगोलिक विविधताओं से भरा है और इन दिनों पूरी दुनिया की निगाहें इस देश पर टिकी हैं.


- दुनिया जहान में यह भी पढ़ें: अमीर, खुशहाल और उदार स्वीडन क्यों बदल रहा है?

पर्यावरण के लिए बेहद महत्व रखने वाले अमेज़न के वर्षावन में पेड़ों का अंधाधुंध कटान ही नहीं, बल्कि इस देश के राजनीतिक और आर्थिक हालात भी दुनिया के लिए चिंता का मामला बने हुए हैं.
एक समय तेज़ रफ़्तार से आर्थिक तरक्की कर रहा ब्राज़ील आज बुरी तरह लड़खड़ा रहा है. ऐसे में यहां होने जा रहे चुनावों से लोगों को बहुत उम्मीदें हैं.
ब्राज़ील में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, नेशनल कांग्रेस, राज्यों और फेडरल डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर और वाइस गवर्नर, राज्यों की विधानसभाओं और फ़ेडरल डिस्ट्रिक्ट लेजिस्लेटिव चैंबर के लिए चुनाव हो रहे हैं. इनमें सबसे अहम है राष्ट्रपति पद के लिए हो रहा चुनाव.

इमेज स्रोत, Getty Images
राजनीतिक-आर्थिक संकट
ब्राज़ील में राष्ट्रपति पद के लिए पिछला चुनाव साल 2014 में हुआ था. इसमें वर्कर्स पार्टी की डिलमा रूसेफ़ ब्राज़िलियन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार को हराकर दोबारा राष्ट्रपति चुनी गई थीं. रूसेफ़ से पहले उन्हीं की पार्टी के लूला डि सिल्वा 2003 से 2011 तक ब्राज़ील के राष्ट्रपति रहे थे. लूला ने उस समय पद छोड़ा था जब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी.
डिलमा रूसेफ़ को 2016 में महाभियोग के कारण हटा दिया गया था और इसके बाद उपराष्ट्रपति मिशेल तेमेर राष्ट्रपति बने थे. ब्राज़ील में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना बताते हैं कि इस घटनाक्रम के बाद ब्राज़ील में संकट पैदा हो गया.
वो बताते हैं, "2016 में ब्राज़ील की राष्ट्रपति डिलमा रूसेफ़ का इंपीचमेंट हुआ था. इसके बाद राजनीतिक और आर्थिक संकट खड़ा हो गया था. तेजी से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार कम हो गई और यह नेगेटिव में चली गई. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस साल भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर प्रदर्शन हुए. रूसेफ़ खुद अच्छी छवि की थीं और उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं था मगर उन्हें हटना पड़ा. इससे संकट पैदा हो गया."
शोभन बताते हैं कि इस समय ब्राज़ील में हो रहे चुनावों में अर्थव्यवस्था का मुद्दा सबसे अहम है क्योंकि लाखों-करोड़ों लोग इससे प्रभावित हुए हैं. बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं, देश में निवेश भी नहीं आ रहा. सभी दल इस बात को मान रहे हैं कि बड़ी चुनौती इस देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाकर विकास करना है.
- यह भी पढ़ें | जब महामहंगाई की मार ने इन मुल्कों को हिलाकर रख दिया

इमेज स्रोत, Getty Images
मुद्दे और भी हैं
आज ब्राज़ील में हालात बेहद ख़राब हैं. बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ गई है, लाखों लोगों की नौकरियां छूट गई हैं, जिनके पास नौकरी है उनकी तनख्वाह कम हो गई है और ऊपर से महंगाई आसमान छू रही है.
ब्राज़ील ने पिछले सौ सालों में कभी ऐसे हालात नहीं देखे. दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर कनैडियन, यूएस ऐंड लैटिन अमेरिकन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर डॉक्टर अब्दुल नफ़े बताते हैं कि ख़राब अर्थव्यवस्था के अलावा ब्राज़ील में और भी मुद्दे हैं जो बेहद गंभीर हैं.
वो बताते हैं, "ब्राज़ील में भ्रष्टाचार आसमान छू चुका है. संस्थागत तरीके से बिलियन डॉलर इधर-उधर हुए हैं. एक और बड़ा मुद्दा है -हिंसा. ब्राज़ील में इतनी हिंसा है कि हर साल 64 हजार लोग मर रहे हैं. इतनी हिंसा तो उन देशों में होती है जहां युद्ध चल रहा होता है."
डॉक्टर अब्दुल नफ़े बताते हैं कि ब्राज़ील में नफ़रत भी बहुत फैल गई है.
वो कहते हैं, "ऐसा लग रहा है कि ब्राज़ील में असहिष्णुता और नफ़रत का रेला सा निकलकर आया है. ब्लैक और महिलाएं निशाने पर हैं. इसके अलावा वामपंथी कहना यहां आज के समय में सबसे बड़ी गाली बन गई है."
- यह भी पढ़ें | ब्राज़ीली गाय की रगों में गुजरात के साँड़ का ख़ून

इमेज स्रोत, Getty Images
चुनाव में भी हिंसा
ब्राज़ील में हिंसा के चलन की बात करें तो चुनाव भी इससे अछूते नहीं रहे हैं. सोशल लिबरल पार्टी (पीएसएल) के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ज़ाइल बोल्सनारो पर कुछ दिन पहले चुनाव प्रचार के दौरान एक शख्स ने चाकू से वार कर दिया.
वो अस्तपाल में हैं जहां उनका इलाज चल रहा है. मगर बोल्सनारो पर ख़ुद भी हिंसा और नफ़रत को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना बताते हैं कि संदिग्ध हमलावर के वकीलों और रिश्तेदारों का कहना है कि जिस शख्स ने बोल्सनारो पर हमला किया, वो उनकी बातों से नाराज़ था क्योंकि उनके भाषणों में काले लोगों मूल निवासियों को निशाना बनाया जाता है.
वो कहते हैं कि राष्ट्रपति बने तो सभी को बंदूक रखने का अधिकार दिया जाएगा ताकि वे आत्मरक्षा कर पाएं. लोग इन्हें ब्राज़ील का ट्रंप कहते हैं मगर इनकी राजनीति ट्रंप से ज्यादा आक्रामक है. कहा जा रहा है कि अफ्रीकी मूल के हमलावर ने ऐसे ही भाषणों से नाराज होकर हमला किया है."
- यह भी पढ़ें | कहानी दुनिया के 'सबसे इकलौते आदमी' की

इमेज स्रोत, Getty Images
'ट्रॉपिकल ट्रंप' बोल्सनारो
ब्राज़ील बहुसांस्कृतिक देश है. यहां पर मूलनिवासी, अफ़्रीकी गुलामों के वंशज और यूरोप से आकर बसे लोग रहते हैं. मगर राष्ट्रपति चुनाव के ओपिनियन पोल में फिलहाल सबसे आगे चल रहे पीएसएल के शाइर बोल्सनैरो मूलनिवासियों, काले लोगों और महिलाओं के खिलाफ आक्रामक भाषण दे रहे हैं. डॉक्टर अब्दुल नफ़े मानते हैं कि इसी कारण बोल्सनारो को तेज़ी से लोकप्रियता भी मिल रही है.
वो कहते हैं, "बोल्सनारो पर जो हमला हुआ, नहीं होना चाहिए था. अभी वह अस्पताल में हैं मगर वो भी दो उंगलियां उठाकर कहते हैं कि मैं ही जीतूंगा और गन कंट्रोल खत्म कर दूंगा. वह मानते हैं कि ब्राज़ील की समस्याएं हिंसा से दूर होंगी."
"वो ट्रंप की तरह की मुश्किल मुद्दों का आसान-आसान हल सुझाते हैं और इसी कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी और हमले के बाद तो और बढ़ गई है. सभी ओपिनियन पोल में वो नंबर वन लीड कर रहे हैं और वर्कर्स पार्टी काफी पीछे रह गई है."
- यह भी पढ़ें | ब्राजील में पैदा हो रहे हैं छोटे सिर वाले बच्चे

इमेज स्रोत, Getty Images
विरोध में महिलाएं
ब्राज़ील में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार शोभन सक्सेना बताते हैं कि बेशक दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाली पार्टी पीएसएल के उम्मीदवार बोल्सनैरो ओपिनियन पोल्स में आगे हैं मगर वर्कर्स पार्टी के उम्मीदवार फर्नांदो हदाद की लोकप्रियता भी तेज़ी से बढ़ रही है और लोग बोल्सनारो के विरोध में लामबंध हो रहे हैं.
शोभन बताते हैं, "वर्कर्स पार्टी पिछले 16 में से 14 साल तक सत्ता में रही है. यहां पीएसडीपी नाम की पार्टी है जो खुद को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी कहती है मगर है दक्षिण पंथी झुकाव वाली पार्टी. डिलमा रूसेफ़ के इंपीचमेंट में इस पार्टी की मुख्य भूमिका थी. इस तरह पीएसल के बोल्सनारो भी दक्षिणपंथ में यकीन रखते हैं. वो चाहते हैं कि ब्राज़ील में राज्यों को बहुत छोटा कर दिया जाए. और भी कुछ पार्टियां हैं यहां. मगर वर्कर्स पार्टी के फर्नांदो हदाद की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है."
"वहीं ब्राज़ील में महिलाओं ने फेसबुक पर बोल्सनारो के खिलाफ एक फेसबुक ग्रुप बनाया है जिससे लाखों महिलाएं जुड़ गई हैं क्योकि बोल्सनारो ने तो संसद में भी महिलाओं के लिए गलत टिप्पणी की थी. इन महिलाओं का कहना है कि वे बोल्सनारो के खिलाफ प्रचार करेंगी. ऐसे में मुख्य मुकाबला बोल्सनारो और हदाद के बीच ही होने की उम्मीद लगाई जा रही है."
- यह भी पढ़ें | ब्राज़ील के इस द्वीप पर 12 साल बाद जन्मा बच्चा

इमेज स्रोत, Getty Images
लूला की पार्टी को मिल पाएगी हमदर्दी?
लूला डिसिल्वा 2003 से 2011 तक देश के राष्ट्रपति रहे. 2011 में उन्होंने उस समय पद छोड़ा था जब उनकी अप्रूवल रेटिंग 85 प्रतिशत थी. मगर पिछले दो-तीन सालों में उनके खिलाफ़ भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाया गया और नौ साल की सजा सुनाई गई. वो इस समय कैद में हैं.
शोभन सक्सेना बताते हैं, "ओपिनियन पोल को देखें तो वो नंबर एक पर चल रहे थे और आज चुनाव होता तो वह जीतते भी. क्योंकि लोग मानते हैं कि उनके ऊपर बिना सबूतों के केस चलाया गया, इस मकसद से कि उन्हें कैसे बाहर किया जाए."
"लूला दावेदार थे और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव लड़ने की इजाजत भी मांगी थी. संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भी माना था कि लूला को रिहा करके चुनाव लड़ने की इजाजत देनी चाहिए मगर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने जब उन्हें इजाजत नहीं दी तो उन्होंने फर्नांदो हदाद को अपनी पार्टी का उम्मीदवार घोषित किया. "
हदाद साओ पॉलो के मेयर रह चुके हैं और उन्हें शहर को बदलकर रख दिया था. वो शिक्षा मंत्री भी रह चुके हैं. वकील, प्रोफेसर और अर्थशास्त्री हैं. माना जा रहा है कि वह दूसरे दौर में जाएंगे. दरअसल ब्राज़ील में यह तय माना जा रहा है कि ब्राज़ील के अगले राष्ट्रपति का चुनाव पहले दौर में नहीं हो पाएगा क्योंकि कोई भी उम्मीदवार पहली बार 50 प्रतिशत वोट हासिल नहीं कर पाएगा. ऐसे में पहले दौर में सबसे ज्यादा वोट लेने वाले दो उम्मीदवारों के बीच 27 अक्तूबर को फिर से मुकाबला होगा और तभी फैसला हो पाएगा.
- यह भी पढ़ें | कुत्ते के लिए ब्राजील के राजदूत का पद ठुकराया?

इमेज स्रोत, Getty Images
लोकतंत्र को बचाने की कोशिश
ब्राज़ील में 1964 से 1985 तक सेना का शासन रहा था ऐसे में यहां लोकतंत्र की जड़े उतनी मजबूत नहीं कही जा सकतीं. मगर जानकार बताते हैं कि पिछले 15-20 सालों से विभिन्न वामपंथी दलों के सत्ता में आने के कारण यहां की सिविल सोसाइटी मजबूत हुई है और वह प्रयास कर रही है कि लोकतंत्र को बचाया जाए.
शोभन सक्सेना कहते हैं, "महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ दल हैं जो ब्राजील को लोकतंत्र की ओर ले जाना चाह रहे हैं तो कुछ उसे इतिहास की तरफ़. बोल्सनारो आर्मी के कैप्टन रह चुके हैं और उनकी ओर से उपराष्ट्रपति के लिए नामित उम्मीदवार जरनल रह चुके हैं. इन्हें देश की आर्मी और सुरक्षा एजेंसियों का सहयोग मिल रहा है. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये आर्मी के उम्मीदवार हैं. जैसा कि पाकिस्तान में हुआ है, इमरान खान को लेकर ऐसा ही कहा जा रहा है कि उन्हें सेना का बहुत सहयोग मिला है. इसी तरह बोल्सनारो को देखा जाता है. मगर बाकी पार्टियां कोशिश कर रही है लोकतंत्र को मजबूत करके देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाया जाए."
- यह भी पढ़ें | क्या गुलामों को आज़ाद करा पाया है ब्राजील ?

इमेज स्रोत, Getty Images
किस ओर बढ़ रहा ब्राज़ील?
जेएनयू के प्रोफेसर डॉक्टर अब्दुल नफ़े बताते हैं कि ये चुनाव काफी अहम हैं क्योंकि विचारक मान रहे हैं कि ब्राज़ील में समरता और विकास का जो माहौल लूला के समय था, उसे बदल दिया गया है. और अगर ऐसा ही जारी रहा तो बहुत कुछ बदल जाएगा.
ब्राज़ील के बदलते राजनीतिक हालात को देखते हुए डॉक्टर अब्दुल नफ़े मानते हैं कि ब्राज़ील में आने वाले समय में और कई परिवर्तन आ सकते है.
वो कहते हैं, "सबसे बड़ा परिवर्तन विदेश नीति में आएगा. लूला ओर डिलेमा की नीति में साउथ-साउथ कोऑपरेशन पर ज़ोर था. इसीलिए भारत, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ वो ब्रिक्स में सक्रिय रहा. मगर यह खत्म हो सकता है. एक और बड़ा बदलाव यह होगा कि यहां के ताकतवर लोग और बड़ी कंपनियां ट्रंप के करीब आएंगी क्योंकि आप देखें तो अमरीका ने चीन पर आयात शुल्क बढ़ाया है मगर ब्राज़ील से आयात पर कोई शुल्क नहीं बढ़ाया. तो कहीं न कहीं आपस में समझौता है. एक और बात ये हो सकती है कि ब्राज़ील की चीन पर निर्भरता भी बढ़ सकती है क्योंकि यहां के ऊर्जा और लौह क्षेत्र में उसका निवेश बढ़ेगा."
7 अक्तूबर को 16 साल या इससे अधिक उम्र के 14 करोड़ लोग पांच अलग-अलग स्तर के प्रतिनिधियों को चुनने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के ज़रिए वोट डालेंगे.
इस उम्मीद के साथ कि उन्हें मंदी, हिंसा और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिले. सभी पार्टियां अपने हिसाब से जनता में ये विश्वास पैदा करने में जुटी हैं कि इन सभी समस्याओं से वे ही मुक्ति दिला सकती हैं.
जनता के मन में क्या है, ये तस्वीर तो 7 अक्तूबर हो साफ़ हो जाएगी मगर नए प्रतिनिधि उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं या नहीं, इसके लिए उन्हें इंतज़ार करना होगा.



(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












