You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पाकिस्तान: 2013 के चुनावों से कितने अलग हैं ये चुनाव
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लाहौर
इस बात को 19 साल हो चुके हैं जब पाकिस्तान में एक सेना प्रमुख ने चुनी हुई सरकार का तख़्तापलट कर सत्ता अपने हाथ में ले ली थी.
इसके बाद से देश ने दो बार लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों को शासन करते हुए देखा है. लेकिन, पाकिस्तान की राजनीति में अनिश्चितता के बादल हमेशा छाए रहते हैं.
ख़ासकर की पिछले साल पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ श़रीफ़ को उनके पद से हटाए जाने के बाद से अनुमान लगाए गए थे कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी और एक बार फिर से सत्ता पर सेना हावी हो जाएगी.
लेकिन, इन सभी राजनीतिक अटकलों और संकट के बावजूद संसद ने अपना कार्यकाल पूरा किया और देश में फिर से लोकतंत्रिक रूप से चुनाव हो रहे हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि इस व्यावहारिक अनिश्चितता के बावजूद पिछले बार से इस बार के चुनावों में कई बातें अलग हैं.
राजनीतिक विश्लेषक रसूल बख़्श कहते हैं कि 2013 के मुक़ाबले इस बार पाकिस्तान का माहौल पूरी तरह अलग है.
रसूल बख़्श ने कहा, "आम धारणा के उलट उस वक़्त इमरान ख़ान की पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उतनी मज़बूत नहीं थी जितनी अब है. तब नवाज़ श़रीफ़ के निर्वासन से लौटने के बाद पहले चुनाव थे और उनकी लोकप्रियता अपने चरम पर थी. पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का समर्थन गिर रहा था. इस बार पीटीआई उस स्थिति में है जहां पिछली बार नवाज़ श़रीफ़ की पार्टी थी.''
मौजूदा चुनाव में धार्मिक दल
पत्रकार सबहत ज़िकरिया मानते हैं कि न सिर्फ़ राजनीतिक माहौल अलग है बल्कि 2013 के आम चुनावों के मुक़ाबले सुरक्षा हालात भी अब बहुत अलग हैं.
सबहत कहते हैं, "हालिया हमलों से ये लगता है कि एक ख़तरे का माहौल बना हुआ है लेकिन इसका पैमाना 2013 जैसा नहीं है. साथ ही पिछली बार की तरह सुरक्षा हालात भी उतने चिंताजनक नहीं हैं. अब स्थितियां काफी सुधर गईं हैं."
राजनीतिक टिप्पणीकार सलमान ग़नी इस बात से सहमति जताते हैं. वो कहते हैं, "हमारी सुरक्षा एजेंसियों और पिछली सरकार को इसका श्रेय जरूर मिलना चाहिए."
लेकिन, सलमान इन चुनावों में कुछ नकारात्मक बातें भी देखते हैं. उनका कहना है, "यह मुद्दों की राजनीति नहीं रही. ये निजी पसंद/नापसंद और बदले का मामला ज़्यादा है."
विश्लेषक रसूल बख़्श मानते हैं कि मौजूदा चुनावों में दक्षिणपंथी धार्मिक दलों का फिर से उभार होने लगा है.
रसूल बख़्श बताते हैं कि 80-90 के दशकों से यहां धार्मिक दल हमेशा राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा रहे हैं. लेकिन, तब कई धार्मिक दल ख़ुद चुनाव लड़ने की बजाए पीएमएल-एन का समर्थन किया करते थे. लेकिन, इस बार तहरीके-लब्बैक या रसूल अल्लाह और जमात-उद-दावा समर्थित अल्लाह हू अकबर-तहरीक जैसे दल ख़ुद मैदान में हैं.
रसूल बख़्श का कहना है, "लोग शिकायत करते हैं कि भड़काऊ भाषण देने वाले और सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने वाले भी चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन समस्या ये है कि उन्हें संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. जब तक ऐसे लोग दोषी नहीं ठहराए जाते तब तक चुनाव आयोग उन्हें चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता. संभव है कि इन्हें बहुत ज़्यादा वोट न मिलें लेकिन ये दूसरी बड़े दलों ख़ासकर नवाज़ श़रीफ़ की पार्टी पीएमएल-एन के वोट ज़रूर काटने वाले हैं."
मीडिया और सोशल मीडिया
रसूल बख़्श का मानना है कि प्रमुख दल धर्म की राजनीति से बचना चाहते हैं लेकिन वो ऐसे दलों की अतिवादी बातों का विरोध न करके कुछ क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर उनके साथ गठबंधन कर रहे हैं.
वो ये भी मानते हैं, "पिछले पांच सालों में चुनाव अभियान पूरी तरह बदल गया है. ख़ासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. वो न सिर्फ़ मतदाताओं को संवदेनशील बना रहा है बल्कि अलग-अलग नेताओं और दलों को भी मौक़ा दे रहा है ताकि वह अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचा सकें."
"इसके अलावा राजनीतिक दलों ने लोगों तक पहुंच बनाने के लिए सोशल मीडिया का भी काफ़ी इस्तेमाल किया है. सभी बड़े दलों के सक्रिय मीडिया सेल हैं. वह ख़ुद अपने संदेशों का प्रचार कर रहे हैं और विपक्ष के एजेंडे का विरोध कर रहे हैं."
"इस बार राजनीतिक दलों ने टेलीविज़न विज्ञापनों पर भी बहुत पैसा लगाया है, जो टीवी पर दूसरे विज्ञापनों से ज़्यादा नज़र आ रहे हैं."
सलमान ग़नी कहते हैं कि पिछले चुनावों की तरह ही इस बार भी लाहौर का माहौल अपने उफ़ान पर है. पंजाब और विशेषकर लाहौर में असली जंग होने वाली है. ये दोनों जगहें नवाज़ श़रीफ़ की पार्टी के गढ़ माने जाते हैं.
हालांकि, सलमान ग़नी को ये भी लगता है कि इस बार लोग ख़ासे निराश भी हैं. कई लोग चुनाव में हिस्सा नहीं ले रहे हैं. उन्होंने नवाज़ श़रीफ़ को सज़ा दिए जाने के चलते चुनाव से दूरी बनाई हुई है. इसलिए बीते साल की तुलना में इस बार चुनावों का रंगरूप काफ़ी अलग है.
सबहत ज़िकरिया का मानना है कि 2018 के चुनावों में कई लोग बदलाव के नारों में ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
इस बार महिलाओं को चुनाव प्रक्रिया में शामिल करने पर काफ़ी ध्यान दिया जा रहा है और ये उम्मीद है कि इन चुनावों में ज़्यादा महिलाएं अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)