मिस्र की नई राजधानी का क्या है चीन कनेक्शन?

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- Author, पाब्लो एस्परजा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क़ाहिरा से क़रीब पैंतालीस किलोमीटर पूर्व में रेगिस्तान केबीच में मिस्र की नई राजधानी खड़ी होनी शुरू हो गई है.ये एक महत्वाकांक्षी, बेहद महंगा और विवादित प्रोजेक्ट है.
मार्च 2015 में मिस्र की सरकार ने नई प्रशासनिक राजधानी बनाने का ऐलान किया था.
ये राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल सीसी की महत्वाकांक्षी योजना है और वो चाहते हैं कि जून 2019 में सरकार का मुख्यालय नई राजधानी में हैं. हालांकि अभी तक इस नए शहर का नाम नहीं रखा गया है.
तीन साल बाद काम जारी है और खाली प्लाटों पर होटल, रिहायशी इमारतें और कन्वेंशन सेंटर आदी बन गए हैं.
निर्माण की ये योजना पूरी हो जाने के बाद शहर के आसपास कृत्रिम झीलें बनाई जाएंगी. लंदन के सेंट्रल पार्क से दोगुना बड़ा पार्क बनाया जाएगा. शिक्षक संस्थानों, अस्पतालों, सैकड़ों मस्जिदें के अलावा पूरे मिस्र का सबसे बड़ा चर्च भी अस्तित्व में आएगा. थीम पार्क, एयरपोर्ट के अलावा कई बड़े होटल भी नई राजधानी में बनाए जा रहे हैं.

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मूलभूत ढांचे के अलावा इस नए शहर के केंद्र में राष्ट्रपति आवास, दूतावास, संसद और 18 मंत्रालयों के दफ़्तर होंगे. इस नए शहर को दो सो किलोमीटर लंबी सड़के राजधानी क़ाहिरा और देश के अन्य हिस्सों से जोड़ेंगी.
जब ये शहर पूरी तरह बनकर तैयार हो जाएगा तो यहां पचास लाख लोग के रहने के लिए तमाम सुविधाएं उपलब्ध होंगी.
ये नई राजधानी 700 वर्ग किलोमीटर इलाक़े में बस रही है जो न्यूयॉर्क सिटी शहर से कुछ ही छोटा है.
काहिरा के बाहरी मार्ग से कुछ दूर बन रहा ये नया शहर स्वेज़ के बंदरगाह और काहिरा के बीचोंबीच होगा. यानी ये देश के सबसे अहम राजनीतिक और व्यवसायिक ठिकानों के ठीक बीच होगा.
मिस्र सरकार के सूचना विभाग के मुताबिक़ नया शहर बनाने का मुख्य कारण काहिरा की बढ़ती भीड़ को कम करना है.

क्यों बन रहा है ये शहर?
मौजूदा राजधानी क़ाहिरा में क़रीब दो करोड़ लोग रहते हैं और एक अनुमान के मुताबिक़ साल 2050 तक ये संख्या चार करोड़ हो सकती है.
यही नहीं देश की आर्थिक क्षमता को और मज़बूत करना और रहने और काम करने के लिए एक नई जगह को विकसित करना भी इस शहर को बनाने का एक अहम उद्देश्य है.
लेकिन ये पहली बार नहीं है जब मिस्र ने अपनी सरकार को क़ाहिरा से बाहर ले जाने की कोशिश की है.
70 के दशक के अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात ने भी शहर बनाने की योजनाएं शुरू की थीं. उन्होंने 'सियूदाद सादात' शहर की नींव रखी थी जिसमें एक प्रशासनिक ज़िला बनाने की भी योजना थी. लेकिन ये मंसूबा पूरा नहीं हो सका.

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प्रोजेक्ट को लेकर शंका
आलोचकों को डर है कि नए शहर का अंजाम भी सादात सिटी जैसा न हो. वो दावा करते हैं कि ये एक अवास्तविक मंसूबा है जो कई साल से अस्थिर सरकार की छवि चमकाने के लिए लाया गया है.
2013 में एक सैन्य तख़्तापलट में पूर्व राष्ट्रपति और देश के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुए गए नेता मोहम्मद मोर्सी को हटाकर अल सीसी ने सत्ता अपने हाथ में ली थी. अप्रैल 2018 में हुए चुनावों में सीसी 97 फ़ीसदी मत हासिल कर फिर से राष्ट्रपति बन गए हैं.
क़ाहिरा की आइन शम्स यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर याह्या सेराग कहते हैं, "इस योजना को लेकर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं हैं. कुछ इसे सटीक बल बताकर इसका बचाव करते हैं, कुछ का मानना है कि नई राजधानी की ज़रूरत है लेकिन जहां बन रही है वहां नहीं बल्कि नील घाटी के पश्चिम में. जबकि कुछ लोगों की राय ये है कि नई राजधानी बनाने के बजाए देश के अन्य हिस्सों के विकास में संसाधनों का इस्तेमाल होना चाहिए."

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शहर नियोजन में विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर याह्या कहते हैं कि मुझे तीसरी राय ज़्यादा सही लगती है. इतने बड़े निवेश को क्षेत्रीय प्रोजेक्टों में लगाना चाहिए.
इस योजना पर पैंतालीस अरब डॉलर से अधिक ख़र्च होंगे और इसकी आर्थिक उपयोगिता को लेकर अभी से सवाल उठ रहे हैं.
मिस्र ने साल 2016 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 12 अरब डॉलर का क़र्ज़ लिया था और यहां सकल घरेलू उत्पाद के मुक़ाबले राजकोषीय बजट घाटा 10.9 प्रतिशत है.

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2018-2019 में मिस्र की अर्थव्यवस्था के 3.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है. हाल के सालों की आर्थिक अस्थिरता के कारण मिस्र की अर्थव्यवस्था के सामने कई तरह के संकट हैं.
वहीं दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि इतनी बड़ी योजना देश में आर्थिक स्थिरता लाएगी और बड़ी तादाद में नौकरियां पैदा करेंगी. डेवलपर्स का दावा है कि इस निर्माण कार्य से दस लाख से अधिक नौकरियां पैदा होंगी.
प्रोफ़ेसर सेराग कहते हैं, "हर चीज़ के दो पहलू होते हैं. इस परियोजना से निर्माण क्षेत्र में नौकरियां पैदा हो रही हैं. लोग भी इस बात पर ग़ौर करते हैं. हाल के सालों में आर्थिक समस्याएं झेलने वाले देश के लिए ये बेहद अहम है."

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इस शहर को बना कौन रहा है?
लेकिन अरबों डॉलर के इस शहर को बना कौन रहा है? नए शहर के विकास के लिए सरकार ने द न्यू एडमिनिस्ट्रेटिव कैपिटल फॉर अर्बन डेवलपमेंट या एसीयूडी नाम की एक सार्वजनिक कंपनी का गठन किया है.
इस कंपनी का 51 प्रतिशत मालिकाना हक़ सेना के पास है बाकी 49 प्रतिशत देश के हाउसिंग मंत्रालय के पास है.
सरकार के नए शहर में आ जाने के बाद क़ाहिरा में खाली होने वाली इमारतों का प्रबंधन भी इसी कंपनी के पास होगा.
राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के कार्यकाल में देश की अर्थव्यवस्था में सेना का अहम योगदान था. अब राष्ट्रपति सीसी के कार्यकाल में ये और अधिक बढ़ गया है.
मिस्र की सेना के पास दर्जनों कंपनियां हैं जो होटल, निर्माण, ऊर्जा, ग्रीनहाउस और मेडिकल उपकरणों जैसे क्षेत्रों में काम करती हैं.

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मिस्र की सेना, निजी कंपनियों के साथ-साथ इस प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका भी बेहद निर्णायक है.
2016 के बाद से मिस्र की सरकार चीन की कंपनी चाइना फॉर्च्यून लैंड डेवलपमेंट कंपनी से बीस अरब डॉलर का निवेश हासिल करने के लिए बातचीत कर रही है.
नई राजधानी के व्यवसायिक ज़िले को चाइना स्टेट कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग कार्पोरेशन बना रही है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां करीब तीन अरब डॉलर का निवेश चीनी बैंकों ने किया है.

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पर्यावरण के नज़रिए से भी सवाल
शहरी विकास और पर्यावरण के नज़रिए से भी इस प्रोजेक्ट को लेकर विश्लेषकों की राय बंटी है.
राजधानी क़ाहिरा में यातायात की समस्या बेहद गंभीर है. इसके अलावा आवासों और प्रदूषण की समस्या भी बड़ी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सबसे प्रदूषित हवा के मामले में क़ाहिरा भारत की राजधानी दिल्ली के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मेगासिटी है.
क़ाहिरा की जनसंख्या बेहद तेज़ी से बढ़ रही है. यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के मुताबिक साल 2017 में क़ाहिरा की आबादी में पांच लाख नए लोग और जुड़ गए.

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नई राजधानी को प्रोमोट कर रहे लोगों का तर्क है क़ाहिरा से भीड़ कम करने के लिए ये ज़रूरी क़दम है. क़ाहिरा और नई राजधानी इलेक्ट्रिक ट्रेन के ज़रिए एक दूसरे से जुड़े होंगे.
वो इस प्रोजेक्ट का बचाव करते हैं. हालांकि इसका मरुस्थल के बीच में होना इस तर्क पर सवाल उठाता है.
प्रोफ़ेसर सेराग कहते हैं, "राजधानी के लिए ज़रूरी मूलभूत ढांच क्या सतत होगा, ख़ासतौर से इस क्षेत्र में पानी की आपूर्ति को देखते हुए? ऐसे कई सवाल उठेंगे. मिस्र में पानी की कमी है. मेरा मानना है कि इसके स्थान को लेकर ये सवाल ज़रूर उठेगा."
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