आख़िर उत्तर कोरिया के झुकने का सच क्या है?

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उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन ने दो अहम राजनयिक बैठकों के लिए तैयार होते हुए परमाणु और मिसाइल परीक्षणों को बंद करने की घोषणा की है.
विश्लेषक अंकित पांड्या बता रहे हैं कि उत्तर कोरिया को इस क़दम से क्या हासिल होगा?
इस घोषणा का अख़बारों की सुर्खियां बनना और उनमें इस क़दम की प्रशंसा करते हुए परमाणु परीक्षणों के अंत की बात किया जाना स्वाभाविक था.
लेकिन इस मुल्क का ऐतिहासिक रिकॉर्ड और परमाणु-मिसाइल कार्यक्रम की परिस्थिति पर नज़र डालें तो लगता है कि हमें अपेक्षाओं में बदलाव करना चाहिए.
उत्तर कोरिया की घोषणा का मतलब?
सबसे पहले शनिवार को आई उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण रोकने वाली घोषणा की बात करते हैं.

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ये घोषणा कहती है कि किम जोंग-उन स्वेच्छा से परमाणु परीक्षणों पर विराम लगा रहे हैं. इसके साथ ही उत्तर कोरिया साल 2006 से सभी परीक्षणों के गवाह रहे पुंगेरी परमाणु परीक्षण केंद्र को भी ख़त्म कर रहा है.
ऐसा इसलिए है क्योंकि किम जोंग उन मानते हैं कि उनके देश ने परमाणु हथियारों की डिज़ाइन पर महारत हासिल कर ली है.
हालांकि, इस दावे की पुष्टि करना मुश्किल है, लेकिन ये दावा अतिश्योकित बताए जाने और शक की नज़र से देखे जाने लायक बिलकुल भी नहीं है.
साल 1998 के समय वाले भारत और पाकिस्तान पर विचार कीजिए. दोनों मुल्कों ने छह परमाणु परीक्षण किए थे.
अब दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों में गिने जाते हैं जबकि दोनों ने छह परीक्षणों के बाद से अब तक कोई भी परीक्षण नहीं किया है.

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उपलब्ध स्त्रोतों से परमाणु हथियारों के डिज़ाइन से जुड़ी जानकारी का आठ साल तक अध्ययन करने और छह परीक्षण करने के बाद उत्तर कोरिया ऐसा ही महसूस कर सकता है.
शहर ख़त्म करने जितनी मारक क्षमता
साल 2016 और 2017 के सितंबर महीने में सामने आए उत्तर कोरिया के पांचवे और छठवें परीक्षण को बारीक निगाह से देखें तो पता चलता है कि इसने अहम मानकों को छुआ है.
उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया के मुताबिक़, 2016 के परीक्षण में एक कॉम्पैक्ट न्युक्लियर डिवाइस का इस्तेमाल किया गया था जिसे कम, मध्यम, इंटर-मीडियम और इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल पर लगाया जा सकता है.
इन मिसाइलों की मारक क्षमता दूसरे विश्वयुद्ध के आख़िरी दिनों में अमरीका द्वारा नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम से दो-तीन गुना ज़्यादा होगी.
लेकिन उत्तर कोरिया के लिए इतनी मारक क्षमता पर्याप्त है.

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चिंताजनक बात ये है कि उत्तर कोरिया के हालिया परमाणु परीक्षण बताते हैं कि इसके पास अत्यंत शक्तिशाली परमाणु हथियार बनाने की क्षमता है.
हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषक और कई राष्ट्रीय ख़ुफिया संस्थाएं अब तक इस मुद्दे पर एक राय नहीं हुई हैं कि उत्तर कोरिया ने अपने दावे के मुताबिक़ एक थर्मोन्यूक्लियर बम बनाने में महारत हासिल की है या नहीं.
लेकिन तीन सितंबर 2017 को हासिल हुआ सीस्मिक डेटा बताता है कि उत्तर कोरिया के पास एक शहर को ख़त्म करने जितनी मारक क्षमता वाला परमाणु बम है.
मूल बात ये है कि किम जोंग उन की हालिया चीन यात्रा उनकी ओर से शक्ति प्रदर्शन जैसा था.
उनकी चीन यात्रा ये भी बताती है कि उनके पास उत्तर कोरिया में इतनी ताक़त है कि उत्तर कोरिया से बाहर जा सकते हैं.

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इसी तरह परमाणु परीक्षण बंद करने की घोषणा भी उनके आत्मविश्वास में एक नई उड़ान का संकेत है.
किम जोंग-उन के सामने हैं दूसरी योजनाएं
मिसाइल परीक्षणों के संदर्भ में किम ने कहा है कि अब वो आगे इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज मिसाइल (आईसीबीएम) का परीक्षण नहीं करेंगे.
एक ओर उनका ये क़दम बेहद चौंकाने वाला है.
उत्तर कोरिया की प्रक्षेपित की गई कुल मिसाइलों में से सिर्फ़ तीन मिसाइलें ही ऐसी हैं जो अमरीका तक न्यूक्लियर हमला कर सकती हैं.
इनमें से कोई भी परीक्षण ऐसा नहीं है जो उस पथ का अनुपालन करता हो जो परमाणु हमले के लिए ज़रूरी है.
दरअसल, ये परीक्षण उत्तर कोरिया की ज़रूरत हैं ताकि वो अपने इस आत्मविश्वास को बनाए रख सके कि वो अमरीका पर हमला कर पाने में सक्षम है.

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लेकिन उत्तर कोरिया के पास कुछ और भी योजनाएं हो सकती हैं.
मसलन, उत्तर कोरिया ने ख़ुद को तकनीकी स्तर पर इतना समृद्ध बना लिया है कि वो अमरीका को आतंकित कर सकता है.
लेकिन उत्तर कोरिया की मिसाइल ताक़त लॉन्चर्स की कमी के चलते भी सीमित है.
फ़िलहाल उत्तर कोरिया के पास अपनी मिसाइलों को लॉन्च करने के लिए सिर्फ़ छह लॉन्च व्हीकल हैं.
2017 में अपने अभिभाषण के दौरान किम जोंग उन ने कहा था कि उनकी परमाणु ताक़त 'पूरी' हो चुकी है. ऐसे में इस बात पर यक़ीन करना आसान हो जाता है कि वो मिसाइल लॉन्चर्स बनाना चाहेंगे और परमाणु हथियारों के घटकों और नियंत्रण प्रणाली को समृद्ध करना चाहेंगे.

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परीक्षणों पर रोक तोड़ना कितना आसान
परमाणु परीक्षणों पर बैन की भी अपनी एक सीमा है.
इस बयान को पुंग्यी-री टेस्ट साइट से जारी करके इसकी प्रामाणिकता बढ़ाई जा सकती थी. उदाहरण के लिए उत्तर कोरिया इस टेस्ट साइट की सुरंगों को ध्वस्त कर सकता था. लेकिन इसने सिर्फ एक स्टेटमेंट जारी करके कहा कि इस साइट को ख़त्म किया जाएगा.
लेकिन जब तक उत्तर कोरिया अपनी मिसाइलों पर निर्भर रहेगा तब तक वह छोटी सी चेतावनी के साथ ही ये बैन तोड़ सकता है.
साल 1994 में अमरीका के साथ हुए परमाणु हथियारों के परीक्षण रोकने के लिए किया गया समझौता टूटने के बाद उत्तर कोरिया ने 1999 में मिसाइल टेस्टिंग प्रतिबंध पर सहमति जताई थी, लेकिन 2006 में उसने एक बार फिर इसे तोड़ दिया.

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इन प्रतिबंधों के परे किम जोंग उन ने हालिया सेंट्रल कमिटी मीटिंग में मूल राष्ट्रीय रणनीतिक परियोजना की सफलता का बखान किया है जिसे ब्युंग्जिन लाइन कहा जा रहा है.
इस कॉन्सेप्ट का मतलब शक्तिशाली राष्ट्रीय परमाणु क्षमता के विकास के साथ एक समृद्ध अर्थव्यवस्था का विकास शामिल है.
बीते शनिवार को किम-जोंग उन ने इशारा किया है कि परमाणु परीक्षण रोकने के बाद अब वह एक शक्तिशाली समाजवादी अर्थव्यवस्था बनाने के काम पर लगेंगे जिसमें लोगों के जीवनस्तर को सुधारने पर काम किया जाएगा.
अमरीका से शिखर वार्ता है इनाम
उत्तर कोरिया की ओर से ये रियायत अमरीका और दक्षिण कोरिया के साथ होने वाली बैठकों से ठीक पहले बरती गई है.

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कोई भी ये जानकर हैरान होगा कि किम जोंग उन ने पहले ही ये सब क्यों छोड़ दिया जब वह अमरीकी राष्ट्रपति से मिलने के लिए तैयारी कर रहे हैं.
इस सवाल का जवाब आसान है. अमरीकी राष्ट्रपति के साथ मीटिंग ही अपने आप में एक तोहफा है. क्योंकि किम के पिता और दादा जी भी ये रुतबा हासिल नहीं कर सके हैं.
आख़िर में सवाल ये है कि उत्तर कोरिया को अपनी टेस्ट साइट ख़त्म करके और परमाणु परीक्षणों पर प्रतिबंध लगाकर क्या मिलेगा? इसका जवाब ये है कि ये सब कुछ ट्रंप के साथ बैठकर जो हासिल होगा उसके मुकाबले कुछ भी नहीं है.

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शनिवार को केसीएनए की घोषणा में परमाणु मुक्त होने का इशारा नहीं है जिसके लिए दक्षिण कोरियाई अधिकारी उत्तर कोरिया की तारीफ़ करने के लिए बेताब थे.
इसके उलट उत्तर कोरिया की घोषणा ऐसी प्रतीत होती हो कि उसने ख़ुद को परमाणु संपन्न राज्य घोषित कर लिया हो जो कि इन हथियारों को त्यागने नहीं जा रही है क्योंकि यही हथियार इस देश की उत्तरजीविता की गारंटी है.
हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने किम जोंग उन की पहल को बड़ी प्रगति बताया है और जितनी जल्दी वह किम के मुख्य उद्देश्य को समझ जाएं उतना बेहतर हैं.
(अंकित पांड्या अमरीकी वैज्ञानिकों के संघ के वरिष्ठ सदस्य और द डिप्लोमेट में वरिष्ठ संपादक हैं)
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