आख़िर म्यांमार की शाही रूबी किसने चुराई?

- Author, एलेक्स बेसकॉबी
- पदनाम, ब्रिटिश फ़िल्मकार, बीबीसी के लिए
हमारा पड़ोसी देश म्यांमार इस वक़्त सुर्ख़ियों में है. वजह है वहां से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन. इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं चल रही हैं.
लेकिन इसी देश का एक नागरिक बरसों पहले खोई एक चीज़ को तलाशने ब्रिटेन पहुंचा.
लेकिन न तो ये कोई आम नागरिक है और न ही वो चीज़ आम है जिसे तलाशने वो ब्रिटेन पहुंचा. वो शख़्स हैं यू सोई विन, जो म्यांमार के आख़िरी राजा थिबा के वंशज हैं. वो तलाश रहे हैं अपने ख़ानदान का एक माणिक्य या रूबी.
कहने को तो ये रूबी बहुत छोटी सी है, लेकिन है बहुत क़ीमती. इतनी क़ीमती कि आज तक कोई इसकी असली क़ीमत का अंदाज़ा नहीं लगा पाया. सालों पहले किसी को इसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी. लेकिन उसे ग़ायब कर दिया गया.
म्यांमार के शाही ख़ानदान की रूबी को 'नागामाउक रूबी' कहते हैं. ये रूबी सदियों से म्यांमार के शाही ख़ानदान की शान थी.

क्या है पूरी कहानी?
म्यांमार को पहले बर्मा कहा जाता था. कभी यहां शाही राज-पाट चलता था. 1885 में जब अंग्रेज़ों ने बर्मा पर कब्ज़ा किया तो यहां के शाही घराने को चंद घंटों में सब कुछ छोड़कर चले जाने को कह दिया गया.
उनका ख़ज़ाना और तमाम क़ीमती साज़ो-सामान अंग्रेज़ी फ़ौज ने अपने कब्ज़े में ले लिया और उसे ब्रिटेन भेज दिया. ये तमाम क़ीमती चीज़ें आज भी ब्रिटेन के विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम में मौजूद हैं.
इस सामान के साथ बहुत से दस्तावेज़ भी हैं. जो उस दौर के हालात और कुछ गहरे राज़ से पर्दा उठाते हैं.

बर्मा के शाही ख़ानदान को खदेड़ने की ज़िम्मेदारी कर्नल एडवर्ड स्लेडेन को दी गई थी. कहा जाता है कि बर्मा के आख़िरी राजा थिबा के पास एक बड़ा सा रूबी था.
देश छोड़ते समय राजा को रूबी के खो जाने का डर था. लिहाज़ा उन्हों ने कर्नल स्लेडेन को इसे हिफ़ाज़त से रखने की ज़िम्मेदारी दे दी. कर्नल स्लेडेन ने भी राजा से वादा किया था कि जब सारा सामान उन्हें वापस दिया जाएगा तो ये रूबी भी लौटा दिया जाएगा.
जितना भी सामान कर्नल स्लेडेन की फ़ौज ने अपने कब्ज़े में लिया था, उसकी बाक़ायदा एक फ़ेहरिस्त बनाई गई थी. इस लिस्ट में रूबी नागामाउक का नाम भी शामिल है.

चालाकी से किया ग़ायब
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम से जो दस्तावेज़ मौजूद हैं, उनमें एक पेंटिंग भी मिली है. इस पेंटिंग में साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है कि राजा थिबा अपने सिंहासन पर बैठे हैं. उनके सामने ख़ाकी लिबास में एक सिपाही खड़ा है. राजा थिबा उसे कुछ दे रहे हैं.
इस पेंटिंग को देखने के बाद इस बात पर तो मुहर लगती है कि बर्मा के आख़िरी राजा थिबा ने अपनी रूबी कर्नल स्लेडेन के हवाले की थी. और कर्नल स्लेडेन ने या तो चालाकी में इसे ग़ायब कर दिया. या फिर लापरवाही में उसे गंवा बैठे.
अंग्रेज़ों ने बर्मा के राजा का राज-पाट छीनकर उन्हें महाराष्ट्र के रत्नागिरि में क़ैद करके रखा था. यहां आने के बाद 1886 में राजा थिबा ने ब्रिटिश वायसराय को एक ख़त लिखकर रूबी लौटाने को कहा. राजा थिबा की इल्तिजा को अनसुना कर दिया गया. लेकिन उन्हों ने हार नहीं मानी. 1911 में उन्होंने ब्रिटेन के नए राजा जॉर्ज पंचम को सीधे मुख़ातिब करते हुए ख़त लिखा. लेकिन इस बार भी इनकी फ़रयाद अनसुनी रह गई.
30 साल की जिलावतनी की ज़िंदगी बसर करने के बाद 1916 में किंग थिबा की मौत हो गई.

रूबी को तलाश रहे
राजा थिबा की कोशिश के इस सिलसिले को पहले उनकी बेटी ने आगे बढ़ाया. अब उनके परपोते यू सोई विन ने रूबी को तलाशने की ज़िम्मेदारी उठाई है. वो पिछले कई सालों से ब्रिटेन में इस हीरे की तलाश कर रहे हैं. इसी सिलसिले में वो विक्टोरिया एंड अलबर्ट म्यूज़ियम भी गए. जहां उन्होंने उस दौर के कई अहम दस्तावेज़ खंगाले.
हालांकि सोई विन से पहले उनकी दादी, और दादी के बाद चाचा ने भी 'नागामाउक रूबी' की तलाश में बहुत हाथ पैर-मारे थे. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.
नागामाउक रूबी को लेकर तरह-तरह के क़िस्से मशहूर हैं.
कहा जाता है कि ब्रिटिश साम्राज्य ने रूबी का नामोनिशान मिटाने के लिए बहुत से तरीक़े अपनाए. कई तरह की थ्योरी भी पेश कीं. लेकिन लंदन में इसकी मौजूदगी के निशान आज भी बाक़ी है. इंटरनेट पर ब्रिटेन की महारानी के ताज की जो तस्वीरें हैं, उनमें ये रूबी उसमें लगा दिखता है.
हालांकि ये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ये बर्मा से ले जाया गया रूबी है, या फिर भारत से ले जाया गया कोहेनूर हीरा है.
यू सोई विन इस हीरे की तलाश में टावर ऑफ लंदन भी गए. वहां पर शाही ख़ानदान के ज़ेवरों के बारे में जानकारी मिलती है. लेकिन वहां से भी उन्हें कोई माक़ूल जवाब नहीं मिला. यू सोई विन को लगता है कि सच्चाई उनसे छिपाई जा रही है. 'नागामाउक रूबी' ब्रिटेन में ही मौजूद है लेकिन उसे जान-बूझ कर छुपाया जा रहा है.
तलाश की मुहिम पर विराम
29 नवंबर 1885 को बर्मा के आख़िरी राजा थिबा राजा की जिलावतनी के दिन क्या हुआ सही तौर पर कह पाना मुश्किल है. लेकिन ब्रिटेन के अख़बार टाइम्स का एक रिपोर्टर, उस वक़्त वहां मौजूद था. इस रिपोर्टर ने कर्नल स्लेडेन और राजा थिबा के बीच हुई बातचीत को अपनी रिपोर्ट का हिस्सा बनाया था.
इस रिपोर्ट से भी पता चलता है कि कर्नल स्लेडेन ने राजा को रूबी हिफ़ाज़त से रखने का यक़ीन दिलाया था. यहां तक कि बाद में राजा ने रूबी वापस लेने के लिए ब्रिटिश सरकार को जो ख़त लिखे थे, वो भी टाइम्स अख़बार में छपे थे.

ब्रिटिश लाइब्रेरी में इन रिपोर्ट के दस्तावेज़ मौजूद हैं. उस वक़्त के भारत के वायसराय ने रूबी तलाशने के लिए अपने अधिकारियों को आदेश भी दिए. कर्नल स्लेडेन से भी इस बारे में पूछताछ हुई. लेकिन उसने ये कहा कि उसने तो सारे जवाहरात शाही ख़ज़ाने में जमा करा दिए थे.
रूबी को लेकर वायसराय और राजा थिबा के दरमियान बहुत बार ख़तो-क़िताबत हुई. लेकिन जब वायसराय को भी लगा कि अब रूबी मिल पाना मुश्किल है तो उन्होंने भी रूबी ब्रिटेन में ना होने की बात लिखते हुए इसकी तलाश की मुहिम पर पूर्ण विराम लगा दिया.

छिपाने की साज़िश
यू सोई विन को तलाश के दौरान एक डायरी हाथ लगी, जिसमें वो ख़त मौजूद हैं जो स्लेडेन ने राजा के समर्पण के बाद वायसराय को लिखे थे. हैरान करने वाली बात ये है कि एक ख़त में बीच की कुछ लाइनें स्याही से साफ़ कर दी गई हैं. जो शक को गहरा करती हैं कि कुछ छिपाने की साज़िश की गई है.
यू सोई विन हैम्पशायर में रह रहे कर्नल स्लेडेन के परपोते से मिलने गए. लेकिन वहां से भी तसल्लीबख़्श जवाब नहीं मिला. उसका कहना था कि अगर स्लेडेन को ये रूबी मिला भी होगा, तो यक़ीनन उन्हों ने ब्रिटेन की रानी को दे दिया होगा. ये शक करने की कोई वजह नहीं कि स्लेडेन ने कि वो रूबी अपने पास रखा हो या फिर रिकॉर्ड से उसका ज़िक्र हटाया हो.
साल 2003 में माइकल नैश ने एक आर्टिकल लिखा था. इसमें ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के ज़ेवरात का ज़िक्र था. इन ज़ेवरात में जिस रूबी की बात कही गई है, उसकी तमाम ख़ासियतें 'नागामाउक रूबी' से मिलती हैं. लिहाज़ा संभावना बनती है कि स्लेडेन ने ये रूबी रानी को दिया हो, और उन्होंने इसे अपने शाही ज़ेवरात में जड़वा लिया हो.

ताज में जड़ा था रूबी
एक दलील ये भी है कि राजा थिबा के पिता ने ब्रिटेन में बर्मा का एक राजदूत भेजा था. हो सकता है कि उस राजदूत ने ही ब्रिटेन की महारानी को ये रूबी तोहफ़े में दे दिया हो. राजा थिबा के पास 'नागामाउक रूबी' के बजाए कोई और रूबी हो जो उन्होंने स्लेडेन को रखने के लिए दिया हो.
ये भी कहा जाता है कि जब 1911 में दिल्ली में शाही दरबार लगा था, तो उस वक़्त ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने जो ताज पहना था, उसमें ये रूबी जड़ा हुआ था.
एक थ्योरी ये भी है कि बर्मा की इस शाही रूबी को चार टुकड़ों में काट कर शाही ताज में लगा दिया गया था.

बहरहाल खोए हुए इस रूबी के साथ बर्मा के लोगों के जज़्बात जुड़े हैं. वो मानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने ना सिर्फ़ उनके राजा को दर-बदर किया बल्कि उनके साथ बेईमानी और नाइंसाफ़ी भी की. उन्हें लगता है कि ब्रिटिश सरकार ने उनके इतिहास को ही मिटा दिया है.
बर्मा के शाही ख़ानदान के वारिस यू सोई विन का कहना है कि वो फिर से बर्मा पर राज करने के ख़्वाहिशमंद नहीं हैं. न ही वो सियासत में आना चाहते हैं. वो तो बस इतना चाहते हैं कि आने वाली नस्लों को पता रहे कि उनके पूर्वज कौन थे. ये रूबी उनकी ख़ानदानी पहचान है. इसीलिए वो इसे इतनी शिद्दत से तलाश रहे हैं. और जब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाते उनकी तलाश जारी रहेगी.
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