पैलेडियम में ऐसा क्या कि क़ीमत थम नहीं रही

पैलेडियम, गाड़ियां

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    • Author, स्टेफानिया गोज़र
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड

पैलेडियम-एक ऐसा मेटल है जिसकी मांग लगातार बढ़ रही है. इसकी वजह है दुनिया का एक बड़ा स्कैंडल.

पिछले एक साल में इस दुर्लभ मेटल की कीमत में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और ये अब प्लैटिनम से भी ज़्यादा महंगा हो गया है. 2001 के बाद ये पहली बार हुआ है.

दुनिया के सबसे बड़े मेटल मार्केट लंदन मेटल एक्सचेंज के मुताबिक़ पिछले शुक्रवार को एक औंस पैलेडियम 1008 अमरीकी डॉलर में मिल रहा था. एक साल पहले इसकी कीमत 681 अमरीकी डॉलर थी.

इसकी कीमत बढ़ने की पीछे डीज़ल कारों को लेकर दो साल से चल रहा एक विवाद है.

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भरोसे की कमी

जर्मनी की कंपनी फोक्सवैगन ने साल 2015 में ये माना था कि प्रदूषण के मानकों को पास करने के लिए कंपनी ने एक सॉफ्टफेयर का इस्तेमाल किया था. करीब 10 लाख गाड़ियो में इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था.

कंपनी के अध्यक्ष मार्टिन विंटरकॉन को इस विवाद के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ था. कंपनी को उसके बाद कई तरह की जांच से गुज़रना पड़ा. कंपनी पर कई केस भी चले और लाखों रुपए का जुर्माना भरना पड़ा.

इंजन से छेड़छाड़ के आरोपों में दूसरी कंपनियां भी जांच के घेरे में आ गईं. फ़्रांस और जर्मनी ने कंपनियों पर जांच के आदेश दिए हैं.

इस विवाद के कारण डीज़ल गाड़ियों की इमेज को काफ़ी नुक़सान हुआ, लोगों का भरोसा इन गाड़ियों से उठने लगा. धातुओं के जानकार मार्कस गार्वी ने बीबीसी मुंडो को बताया कि ख़ासतौर पर यूरोप में ये बदलाव देखने को मिला है.

पैलेडियम से इसका क्या लेनादेना है?

यूरोपियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चर्स असोसिएशन (ACEA) के मुताबिक साल 2009 में पहली बार पेट्रोल गाड़ियों की बिक्री डीज़ल गाड़ियों के मुकाबले बढ़ गई और पैलेडियम पेट्रोल गाड़ियों के एक्ज़ॉस्ट में इस्तेमाल होने वाले कैटेलिस्ट बनाने के लिए होता है.

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गार्वी के मुताबिक, "डीज़ल गाड़ियां यूरोप में ज़्यादा इस्तेमाल हो रही थीं, लेकिन पिछले कुछ सालों की घटनाओं का इस पर असर हुआ है"

चीन और भारत में पहले से ही पेट्रोल गाड़ियों की डिमांड ज़्यादा है. इन सभी कारणों ने चलते पैलेडियम की डिमांड बढ़ गई है.

ACEA के डेटा के हिसाब से साल 2017 के पहले 6 महीनों में सिर्फ़ डीज़ल गाड़ियों की बिक्री घटी है. यूरोप में हाइब्रिड, बिजली या नेचुरल गैस से चलने वाली गाड़ियों की बिक्री बढ़ी है.

ACEA के जेनरल सेक्रेटरी एरिक जोनार्ट के मुताबिक,"पेट्रोल से डीज़ल की तरफ इस शिफ्ट से कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा और बढ़ सकती है, काफ़ी कम लोग वैकल्पिक ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं"

इस साल जनवरी से जून के बीच डीज़ल गाड़ियों की बिक्री चार प्रतिशत घटी हैं, पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों की बिक्री 10 प्रतिशत बढ़ी हैं.

ICBC स्टैंडर्ड बैंक के डेटा के मुताबिक़ इस साल खदानों से निकाले जाने वाले 75 से 80 फ़ीसदी पैलेडियम का इस्तेमाल कैटेलिस्ट कनवर्टर बनाने के लिए होगा.

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ये कनवर्टर कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे हानिकारक गैसों को वॉटर वेपर में बदल देता है. गार्वी का मानना है कि इनकी बढ़ी हुई कीमतें सही हैं.

गार्वी के मुताबिक, "मुझे भरोसा है कि ये कीमतें और बढ़ेंगी, 1000 डॉलर प्रति औंस से महंगा ही रहेगा, जो कि प्लैटिनम से महंगा है"

गार्वी ने बताया कि कीमतें बढ़ने के बाद भी ऑटोमोबाइल कंपनियों पर ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अभी कोई और मेटल इस काम के लिए उपलब्ध नहीं है. अगर कंपनियां दूसरे मेटल का इस्तेमाल करना चाहती भी हैं तो इसमें दो से तीन साल लग जाएंगे.

एक बाइप्रोडक्ट

एक जानकार के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में पैलेडियम को प्लैटिनम के एक बाइप्रोडक्ट की तरह निकाला जाता है, रूस में ये निकल के बाइप्रोडक्ट की तरह निकाला जाता है. इन दोनों जगहों पर ही ये भारी मात्रा में पाए जाते हैं.

गार्वी के मुताबिक, "पलैटिनम की कीमतें स्थिर हैं, लेकिन पैलेडियम निकालने में काफ़ी खर्च होता है और इस खर्चे की पूर्ति नहीं हो पा रही है. इसलिए रूस में इसके प्रोडक्शन के बढ़ने की उम्मीद कम है"

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गार्वी के मुताबिक अगले दो तीन साल कर कोई भी पैलेडियम का नया खदान नहीं आएगा, लेकिन डिमांड बनी रहेगी.

गार्वी बताते हैं कि स्विट्जरलैंड पैलेडियम का सबसे बड़े मार्केट है. उनके मुताबिक अगर आयात और निर्यात की बात करें तो पिछले साल वहां का आयात के नेट बैलेंस 4.7 टन है.

लेकिन इस साल नेट निर्यात 4.2 टन है.

गार्वी के मुताबिक , "इसका मतलब है कि स्विट्जरलैंड में जितना पैलेडियम जा रहा है उससे ज़्यादा वहां से आ रहा है". उनका कहना है कि इससे ये समझ में आता है कि डिमांड अभी नहीं घटेगी.

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