रोहिंग्या मुसलमान संकट की आख़िर जड़ क्या है?

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म्यांमार से अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन जारी है. जानकार इस साल अगस्त में शुरू हुए रोहिंग्या संकट को दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ता संकट भी मान रहे हैं.
म्यांमार के रोहिंग्या समंदर पार कर या फिर पैदल ही अपने घर छोड़कर भाग रहे हैं.
रास्ता आसान नहीं है. लेकिन मौत का डर छोड़ कर वो जान हथेली पर रखकर सफ़र कर रहे हैं. उनका आरोप है कि वे सेना के हमलों से परेशान होकर ऐसा कर रहे हैं.
अगस्त से लेकर अब तक पांच लाख से भी ज़्यादा रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन प्रांत से भागकर बांग्लादेश जा चुके हैं.

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संयुक्त राष्ट्र ने रखाइन में सेना की कार्रवाई को 'नस्लीय नरसंहार' का आदर्श उदाहरण बताया है.
किसी ख़ास समुदाय या जाति के लोगों को देश से बाहर निकालने, मिटाने की कोशिश को 'नस्लीय नरसंहार' कहा जाता है. कहा जाता है कि हिटलर ने यहूदियों के साथ जो किया वह इसकी एक मिसाल है.
लेकिन म्यांमार की सेना ऐसा नहीं मानती. उनका कहना है कि वे सिर्फ़ उग्रवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहे हैं. आम लोगों को निशाना नहीं बनाया जा रहा.

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कौन हैं रोहिंग्या
रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के अल्पसंख्यक समुदायों में से एक हैं. इस साल की शुरुआत तक उनकी संख्या तक़रीबन दस लाख बताई जाती थी.
म्यांमार के मुसलमानों में रोहिंग्या की संख्या सबसे ज़्यादा है. उनमें से ज़्यादातर रखाइन प्रांत में रहते हैं.
उनकी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति है. रोहिंग्या खुद को अरब से आए व्यापारियों और कुछ अन्य समूहों का वंशज बताते हैं. उनका कहना है कि वे पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं.
लेकिन बौद्ध बहुसंख्यक म्यांमार की सरकार रोहिंग्या को अपना नागरिक नहीं मानती.
म्यांमार ने रोहिंग्याओं को नागरिकता नहीं दी है और 2014 में हुई जनगणना में भी उन्हें शामिल भी नहीं किया गया था. सरकार उन्हें बांग्लादेश से आए ग़ैरक़ानूनी प्रवासी बताती है.

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रोहिंग्याओं के लिए लीस्ट वॉन्टेड (जिन्हें कोई अपनाना नहीं चाहता) और मोस्ट परसीक्यूटेड (सबसे ज़्यादा सताए गए) शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया है.
म्यांमार और बाक़ी देशों में रोहिंग्याओं की संख्या
मौजूदा संकट से पहले भी बीते कुछ सालों में हज़ारों रोहिंग्या सुरक्षाबलों के तथाकथित हमलों और संप्रदायिक हिंसा से बचने के लिए म्यांमार से पलायन करते रहे हैं.
1970 से लेकर अब तक रोहिंग्या एशिया के कई देशों में जाकर बसे हैं. उनकी असल आबादी आधिकारिक संख्या से कहीं ज़्यादा बताई जाती है.

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क्यों भाग रहे हैं रोहिंग्या
हालिया पलायन तब शुरू हुआ जब 25 अगस्त को रोहिंग्या के एआरएसए (अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी) विद्रोहियों ने कथित तौर पर म्यांमार की 30 से ज़्यादा पुलिस चौकियों पर हमला कर दिया.
म्यांमार से भागकर बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार ज़िले में पहुंचे रोहिंग्या शरणार्थियों ने बताया कि सुरक्षाबलों ने जवाबी हमले में उनके गांव जला दिए और आम लोगों पर हमले किए और उन्हें मारना शुरू कर दिया. शरणार्थियों के मुताबिक़ सेना को इसमें स्थानीय बौद्ध समुदाय के लोगों का भी समर्थन हासिल था.

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एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है म्यांमार की सेना ने सैकड़ों रोहिंग्या लोगों को मार दिया और महिलाओं और बच्चियों को यौन हिंसा का शिकार बनाया.
हालांकि सरकार का दावा है कि उनका "सफ़ाई अभियान" पांच सितंबर को ख़त्म हो गया. लेकिन बीबीसी के संवाददाताओं ने इस बात के सबूत देखे कि सेना की कार्रवाई उसके बाद भी चलती रही.

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ह्यूमन राइट्स वॉच की सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से सामने आया कि अगस्त 2017 के बाद से म्यांमार में कम से कम 288 गांव पूरे या थोड़े जला दिए गए.
इन तस्वीरों में ऐसे कई इलाक़े नज़र आते हैं जिनमें रोहिग्याओं के गांव मलबे में तब्दील कर दिए गए हैं, लेकिन पड़ोस में बने दूसरे समुदाय के गांव को हाथ भी नहीं लगाया गया.

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मौंगडॉ इलाक़े में भारी तबाही
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़ 25 अगस्त से 25 सितंबर के बीच सबसे ज़्यादा नुकसान मौंगडॉ कस्बे में हुआ.
इस कस्बे में कई गांवों को 5 सितंबर के बाद तबाह किया या था, जबकि म्यांमार की नेता आंग सान सू ची के अनुसार सुरक्षाबलों का अभियान 5 सितंबर को ख़त्म हो गया था.
कितना बड़ा है यह संकट
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि रोहिंग्या संकट "दुनिया का सबसे तेज़ी से बढ़ रहा शरणार्थी संकट है".
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक़ अगस्त से पहले से 3,07,500 रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थी कैंपों में या अस्थायी झुग्गियों में रह रहे थे.

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बांग्लादेश पहुंच रहे ज़्यादातर रोहिंग्या, जिनमें महिला, पुरूष, और बच्चे शामिल हैं, बग़ैर किसी संसाधन के वहां पहुंचे हैं.
उन्होंने यहां शरण ली, मुश्किल हालात में जहां भी हो सका उन्होंने कैंप बनाए. उनके पास मदद ना के बराबर है, पीने का साफ पानी, खाना या चिकित्सा सुविधाएं कम ही पहुंच पाती हैं.
अगस्त के बाद आए 5,37,000 शरणार्थियों में से 58 फ़ीसदी बच्चे हैं. वयस्कों में से 60 फीसदी महिलाएं हैं.

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बांग्लादेश में कहां रह रहे हैं रोहिंग्या
बांग्लादेश का सबसे बड़ा शरणार्थी कैंप कुटापलोंग में है लेकिन यहां आनेवालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और जगह सीमित है इसलिए आसपास के इलाक़ों जैसे बालूखली में भी कैंप बन गए हैं.
अगस्त के बाद कुटापलोंग शरणार्थी कैंप में रहने वालों की संख्या 13,901 से बढ़कर 20,000 हो गई है. जबकि आसपास के अस्थाई इंतज़ामों में रहने वालों की गिनती 99,495 से बढ़कर 3,11,225 हो गई है.

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मदद की दरक़ार
- यूनिसेफ़ के मुताबिक़ 7,20,000 बच्चों को मानवीय आधार पर मदद चाहिए.
- संयुक्त राष्ट्र को अगले 6 महीने के राहत काम के लिए 28 अरब से भी ज़्यादा रुपये की ज़रूरत है.
- हैजे के 9,00,000 से भी ज़्यादा टीके चाहिए.
- बांग्लादेश की सेना को 250,000 लोगों के लिए दस हज़ार से भी ज़्यादा शौचालय बनाने की ज़रूरत है.
- पांच बार में हवा के रास्ते 500 टन मदद पहुंचाई गई है.

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बड़े पैमाने पर म्यांमार सरकार की कार्रवाई की आलोचना की गई है लेकिन उनके ख़िलाफ़ कोई प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं.
बाक़ी देश क्या कर रहे हैं
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने म्यांमार में हिंसा रोकने की अपील की है लेकिन कोई प्रतिबंध नहीं लगाए.
- अमरीका ने म्यांमार से गुज़ारिश की है कि "वो क़ानून का सम्मान करे", हिंसा रोक दे और सभी समुदायों के आम नागरिकों का पलायन रोके.
- चीन का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को म्यांमार की मदद करनी चाहिए ताकि "वो विकास कर सके और स्थिरता ला सके".

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- बांग्लादेश कॉक्स बाज़ार में और शरणार्थी कैंप बनाने की योजना कर रहा है लेकिन वह शरणार्थियों को आसपास के इलाक़ों में जाने से रोकना चाहता है.
- म्यांमार ने बेघर हुए लोगों से रखाइन में बनाए गए कैंपों में जाने की अपील की लेकिन साथ ही यह भी साफ़ कर दिया कि म्यांमार बांग्लादेश गए लोगों को वापस आने की इजाज़त नहीं देगा.
- यूके डिज़ास्टर्स एमर्जेंसी कमिटी ने शरणार्थियों और उनके होस्ट समुदायों के लिए दान की अपील की है. प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने कहा कि रखाइन में चल रही सैन्य कार्रवाई रुकनी चाहिए. यूके ने म्यांमार की सेना के लिए चलाए जा रहे ट्रेनिंग कार्यक्रम पर भी रोक लगा दी है.

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