रोहिंग्या मुस्लिम संघर्ष: फ़र्ज़ी तस्वीरें, आग में घी

तस्वीर

इमेज स्रोत, BETTMANN/GETTY

इमेज कैप्शन, ये तस्वीर 1971 में बांग्लादेश में ली गई थी लेकिन सोशल मीडिया पर म्यांमार के रोहिंग्या मुस्लिमों से जोड़कर शेयर की जा रही है
    • Author, जोनाथन हेड
    • पदनाम, दक्षिण पूर्व एशिया संवाददाता, बीबीसी

म्यांमार के उत्तरी रखाइन प्रांत में हाल ही में बढ़ी हिंसा के साथ साथ सोशल मीडिया पर भ्रमित करने वाली तस्वीरों की भी भरमार है.

इनमें से बहुत सारी तस्वीरें वीभत्स और भड़काऊ हैं. कई वीडियो और तस्वीरें ग़लत भी हैं.

रोहिंग्या मुस्लिमों और बहुसंख्यक बौद्ध लोगों के बीच गहरे अविश्वास के कारण रखाइन प्रांत में पहले भी कई बार खूनी संघर्ष हो चुका है.

म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को नागरिकता नहीं दी गई है और कई दशकों से इस अल्पसंख्यक समुदाय का उत्पीड़न होता रहा है.

रखाइन प्रांत में पत्रकारों की पहुंच सीमित है और वहां से मिलने वाली जानकारी कम है.

जो पत्रकार रखाइन प्रांत में पहुंच पाए हैं, उनके मुताबिक बेहद विस्फोटक स्थिति और रोहिंग्या मुस्लिमों के प्रति गहरी नफ़रत के कारण जानकारी जुटाना बहुत मुश्किल हो जाता है.

रखाइन में क्या हो रहा है? वो बातें जो हमें पता हैं :-

  • कई महीनों तक तनाव के बाद पिछले हफ्ते, ख़ुद को अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी कहने वाले एक गुट ने कम से कम 25 पुलिस पोस्ट पर हमला कर दिया था.
  • कई इलाकों से संघर्ष की ख़बरें आईं. कई बार रोहिंग्या गांव वाले भी म्यांमार की सेना से लड़ाई में चरमपंथियों का साथ देते हैं.
  • रिपोर्टों के मुताबिक़ कई मामलों में सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुस्लिमों के गांवों को जला दिया है. इसमें कई बार सेना को बौद्ध नागरिकों का समर्थन भी मिलता है.
  • बौद्ध समुदाय पर भी कई हमले हुए हैं और बौद्ध समुदाय के कई सदस्यों की मौत की ख़बरें हैं.
  • संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक 40,000 रोहिंग्या मुस्लिम सीमा पार कर बांग्लादेश पहुंचे हैं. रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार की कई कहानियां सामने आईं हैं.

फर्ज़ी तस्वीरें ट्वीट कर निशाने पर आए

ट्वीट

इमेज स्रोत, Twitter

इमेज कैप्शन, बीबीसी ने तस्वीरों के कुछ हिस्सों को धुंधला कर दिया है क्योंकि ये बहुत परेशान करने वाली हैं

29 अगस्त को तुर्की के उप प्रधानमंत्री मेहमत सिमसेक ने चार तस्वीरें ट्वीट कीं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रोहिंग्या मुस्लिमों के जातीय नरसंहार को रोकने की अपील की थी.

ट्विटर पर उनके पोस्ट को 1,600 बार रिट्वीट किया गया और 1,200 यूज़र्स ने इसे लाइक किया.

लेकिन इन तस्वीरों की प्रामाणिकता पर सवाल करते हुए उनकी आलोचना भी हुई.

उनके ट्वीट के तीन दिन बाद, कई लोगों ने इन तस्वीरों के सही होने पर सवाल उठाए और सिमसेक को इस पोस्ट को हटाना (डिलीट) करना पड़ा.

फूले हुए शवों वाली पहली तस्वीर के बारे में इंटरनेट पर पता करना सबसे मुश्किल है.

सिमसेक को चुनौती देने वाले म्यांमार में कई लोगों का कहना है ये तस्वीर साल 2008 में आए चक्रवात नरगिस से हुई तबाही की है.

जबकि कई लोगों का मानना है कि तस्वीर में नज़र आ रहे शव म्यांमार में हुए नाव हादसों में मारे गए लोगों के हैं.

जबकि इन हादसों के बारे में पता करने पर ऐसी तस्वीर नहीं मिल पाती.

लेकिन कई वेबसाइट पर पिछले साल की तारीख़ के साथ ये तस्वीर मिलती है. (विचलित करने वाली तस्वीरों के कारण उन वेबसाइट के लिंक हम यहां नहीं दे रहे हैं).

इससे ये समझा जा सकता है कि ये तस्वीर रखाइन प्रांत में हाल ही में हुई हिंसा की नहीं है.

बीबीसी ने दूसरी तस्वीर के बारे में पता लगाने की कोशिश की जिसमें एक पेड़ पर बंधे शव के पास रो रही महिला नज़र आ रही है. बीबीसी की छानबीन में पता चलता है कि ये तस्वीर समाचार एजेंसी रॉयटर्स के एक फ़ोटोग्राफर ने जून 2003 में इंडोनेशिया के आचेह में ली थी.

तीसरी तस्वीर में दो नन्हे बच्चे अपनी मां के शव के पास रोते नज़र आ रहे हैं, ये तस्वीर जुलाई 1994 में रवांडा में ली गई थी.

ये तस्वीर सिपा के लिए अलबर्ट फ़ाकेली ने ली थी और वर्ल्ड प्रेस अवॉर्ड जीतने वाली तस्वीरों में से एक है.

चौथी तस्वीर के बारे में जानकारी हासिल करना भी मुश्किल है. एक नहर में खड़े लोगों की ये तस्वीर नेपाल में हाल ही में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए मदद मांगने वाली एक वेबसाइट पर देखी गई.

फ़र्ज़ी तस्वीरें?

ट्वीट

इमेज स्रोत, Report

रोहिंग्या मुस्लिमों के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर जैसे जंग छिड़ी हुई है और दोनों पक्षों पर एक दूसरे को जवाब देने वाली कहानियां पोस्ट करने की होड़ है.

मेरे पास भी कई ऐसी तस्वीरें आईं हैं जो इस नरसंहार का शिकार हुए लोगों की हालत दिखाती हैं लेकिन इनकी प्रामाणिकता की पुष्टि आसान नहीं है.

लेकिन ये साफ़ है कि कई तस्वीरें बिल्कुल ग़लत है.

तस्वीर जो मुझे भेजी गई थी, कथित तौर पर रोहिंग्या मुस्लिमों को राइफ़ल के साथ दिए जा रहे प्रशिक्षण की है, लेकिन ये तस्वीर 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ले रहे बांग्लादेशियों की है.

इसी साल संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने रखाइन प्रांत में कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर शोध किया, इस आयोग ने ऐसी किसी तस्वीर या वीडियो का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जो उसने खुद न लिया हो क्योंकि इस तरह की तस्वीरों और वीडियो की सच्चाई जानना एक बड़ी समस्या है.

ये रिपोर्ट आयोग की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तृत जानकारी देती है.

इस रिपोर्ट में रोहिंग्या समुदाय के साथ हो रही क्रूरता और मानवता के खिलाफ़ अपराध जैसी कार्रवाई के बारे में बताया गया था. म्यांमार की सरकार ने इस रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया और फ़ैक्ट फ़ाइडिंग मिशन के सदस्यों को रखाइन प्रांत का वीज़ा देने से इनकार कर दिया.

यहां जो जानकारी हम दे रहे हैं वो अलग अलग स्रोतों से जुटाकर ली गई है, इससे रखाइन प्रांत में गंभीर संघर्ष और बड़े पैमाने पर हो रही मौतों की तस्वीर साफ़ होती है.

ऐसा लगता है कि दोनों तरफ़ से हमले किए जा रहे हैं लेकिन सुरक्षा बल और हथियारबंद स्थानीय नागरिकों के लगातार हमलों से रोहिंग्या मुस्लिमों की हालत ज़्यादा ख़राब हो गई है.

रखाइन प्रांत में तटस्थ पर्यवेक्षकों की सीमित पहुंच के कारण यहां की तस्वीर तो पूरी तरह साफ़ होने में वक्त लगेगा.

लेकिन सोशल मीडिया पर अपुष्ट फर्ज़ी तस्वीरों और वीडियो के कारण दोनों पक्षों में कड़वाहट भी बढ़ेगी और संभव है कि हिंसक संघर्ष और गहराता जाएगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)