म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों मारा जाता है?

बर्मा के नाम से जाना जाने वाले म्यांमार में साल 1962 से लेकर साल 2011 तक सैन्य शासन था. जिस भी जनरल ने इस देश की कमान संभाली उसने विरोधियों को कुचल दिया.
वहीं, विपक्ष की नेता और नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची को नज़रबंद रखा गया.
सैन्य शासन वाले इस देश में उदारीकरण की प्रक्रिया साल 2010 से शुरू हुई. 2016 में सरकार बदलने के बाद इस देश ने एक बड़े बदलाव को देखा.

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बर्मन लोगों का प्रभुत्व
म्यांमार में सबसे बड़े जातीय समूह बर्मन या बर्मार के लोगों का प्रभुत्व रहा है. साथ ही इस देश के कई अल्पसंख्यक समूहों का विद्रोह भी चलता रहा है. हालांकि, 2015 में शांति प्रक्रिया को लेकर सीज़फ़ायर डील का एक ड्राफ़्ट तैयार हुआ था.
म्यांमार की चर्चा केवल अब तक सैन्य शासन और आंग सान सू ची के बीच जारी संघर्षों के लेकर होती थी लेकिन देश में सत्ता हस्तांतरण के बाद म्यांमार के अल्पसंख्यक समूह रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा उठा.
जनवरी 2009 में थाइलैंड ने अपने तट पर पहुंचे सैकड़ों रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेज दिया लेकिन म्यांमार ने अपने यहां अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही नकार दिया. कई रोहिंग्या मुसलमानों को इंडोनेशिया के समुद्र तट पर नावों से बचाया गया था.

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2012 में पहली बार घातक हिंसा
म्यांमार का रखाइन प्रांत रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर हमेशा से चर्चा में रहा है क्योंकि यहीं इनकी अधिक संख्या है. साल 2012 में पश्चिमी रखाइन प्रांत में हिंसा हुई. इसके बाद मध्य म्यांमार और मांडले तक हिंसा फैल चुकी थी.
आख़िर रोहिंग्या के ख़िलाफ़ होने वाली सांप्रदायिक हिंसा की क्या वजहे हैं? सबसे पहले यौन उत्पीड़न और स्थानीय विवादों ने रोहिंग्या और दूसरे बहुसंख्यक समुदाय के बीच हिंसा की शुरुआत की थी जिसके बाद इन संघर्षों ने सांप्रदायिकता का रूप ले लिया.
सबसे बड़ी और पहली हिंसा जून 2012 में हुई थी जिसमें रखाइन के बौद्धों और मुस्लिमों के बीच दंगे हुए. यह अनुमान लगाया जाता है कि इस हिंसा के कारण 200 रोहिंग्या मुसलमानों की मौत हुई और हज़ारों को दरबदर होना पड़ा.
इस घातक घटना की शुरुआत एक युवा बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई थी.
इसके बाद मार्च 2013 में मध्य म्यांमार में एक सोने की दुकान पर विवाद के बाद सांप्रदायिक हिंसा में 40 लोग मारे गए थे.
इसी तरह से अगस्त 2013, जनवरी 2014 और जून 2014 में सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसमें कई रोहिंग्या पुरुष, महिला और बच्चे मारे गए.

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हिंसा के पीछे कैसे है धर्म?
रखाइन प्रांत मे अकसर बौद्धों और मुसलमानों के बीच तनाव रहता है. बौद्ध राज्य में बहुसंख्यक हैं. अधिकतर मुसलमान ख़ुद को रोहिंग्या कहते हैं.
यह समूह बंगाल के एक हिस्से में पैदा हुआ जो जगह अब बांग्लादेश के नाम से जानी जाती है. बांग्लादेश की सीमा से लगे शहरों में कई हिंसक घटनाएं हुई हैं जिसमें अधिक जनसंख्या मुस्लिमों की है.
एक रोहिंग्या मानवाधिकार समूह कहता है कि हिंसा की शुरुआत रोहिंग्या ने की थी. रखाइन बौद्धों ने कहा है कि रोहिंग्या मुख्य रूप से दोषी हैं.
संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या को पश्चिमी म्यांमार का धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक बताया हुआ है. सात ही संयुक्त राष्ट्र कह चुका है कि रोहिंग्या दुनिया के सबसे सताए हुए अल्पसंख्यक हैं.

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सांप्रदायिक तनाव का लंबा इतिहास
सैन्य शासन के दौरान म्यांमार में सांप्रदायिक तनाव का लंबा इतिहास रहा है जिसके कारण हिंसा की घटनाएं होती रही हैं. हालांकि, सांप्रदायिक हिंसा के लिए विभिन्न घटनाओं से सीधा संबंध नहीं माना जाता रहा है.
दशकों से अविश्वास का माहौल अब आज़ादी के नए माहौल में ख़ुलकर सामने आया है. समीक्षक मानते हैं कि हिंसा रोकने के लिए सरकार काफ़ी कुछ नहीं करती है और इसके कारण आगे की हिंसा की आशंका रहती है.
रोहिंग्या के ख़िलाफ़ हिंसा को म्यांमार के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षण के रूप में देखा जाता रहा है क्योंकि देश में लंबे सैन्य शासन के बाद 2010 में लोकतांत्रिक सरकार बनी थी. यह संघर्ष म्यांमार के लोकतंत्र की कमज़ोरी को लेकर चिंता पैदा करते हैं.
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