रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर मलाला ने आंग सान सू ची से पूछे सवाल

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म्यांमार में जारी हिंसा और रोहिंग्या मुसलमानों के मारे जाने की ख़बरों के बीच नोबल पुरस्कार विजेता मलाला युसुफ़जई ने देश की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची से इस मुद्दे पर दख़ल की अपील की.
उन्होंने ट्विटर पर अपना एक बयान जारी करके हिंसा की निंदा की और कहा, "म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो हो रहा है उससे मैं दुखी हूं."
उन्होंने लिखा, "बीते कई सालों में मैंने इस दुखद और शर्मनाक व्यवहार की निंदा की है. मैं इंतज़ार कर रही हूं कि नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची भी इसका विरोध करें. पूरी दुनिया और रोहिंग्या मुसलमान इंतज़ार कर रहे हैं."

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मलाला के सवाल
मलाला ने रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हो रही हिंसा रोकनी की अपील करते हुए कुछ सवाल भी किए हैं.
उन्होंने कहा, "हिंसा बंद करो. आज मैंने तस्वीरें देखीं जिनमें म्यांमार के सुरक्षाबल बच्चों की हत्या कर रहे हैं. इन बच्चों ने किसी पर हमला नहीं किया लेकिन फिर उनके घर जला दिए गए."
मलाला ने सवाल किया, "अगर उनका घर म्यांमार में नहीं है तो उनकी पीढ़ियां कहां रह रही थीं? उनका मूल कहां है?" उन्होंने कहा, "रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार की नागरिकता दी जाए. वह देश जहां वे पैदा हुए हैं."
पाकिस्तान का ज़िक्र करते हुए मालाला ने कहा, "दूसरे देशों, जिनमें मेरा अपना देश पाकिस्तान शामिल है, उन्हें बांग्लादेश का उदाहरण अपनाना चाहिए और हिंसा व आतंक से भाग रहे रोहिंग्या परिवारों को खाना, शरण और शिक्षा दें."
हिंसा के बीच...
बता दें कि म्यांमार में जारी नस्लीय हिंसा की वजह से बड़ी रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी देश बांग्लादेश भाग रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र ओर से जारी अनुमान के मुताबिक़ कुछ हफ़्तों पहले म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में जारी हिंसा के बीच अब तक क़रीब 60 हजार शरणार्थी बांग्लादेश की सीमा पार कर चुके हैं.
अपना सबकुछ छोड़कर बांग्लादेश भाग रहे शरणार्थियों ने आरोप लगाया कि म्यांमार के सुरक्षाबल और बौद्धों की भीड़ उनके गांव जला रही है.
उधर, म्यांमार सरकार का कहना है कि सुरक्षाबल उन हमलों के ख़िलाफ एक्शन ले रहे हैं जिनमें 20 से ज़्यादा पुलिस थानों को कथित तौर पर रोहिंग्या विद्रोहियों ने निशाना बनाया था.

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ख़तरे में रोहिंग्या शरणार्थी
नस्लीय हिंसा की वजह से रोहिंग्या मुसलमानों के अलावा हिंदू और कुछ जगहों से बौद्ध भी पलायन कर रहे हैं.
अंदाजा लगाया जा रहा है कि क़रीब 20000 रोहिंग्या नाफ़ नदी के किनारे फंसे हैं जहां से बांग्लादेश की सीमा शुरू होती है.
मदद करने वाली एजेंसियों का कहना है कि उन लोगों के डूबने, बीमारी से गस्त होने और ज़हरीले सांपों के काटने तक का ख़तरा है.
हाल ही में एक मानवाधिकार समूह ने म्यांमार की सैटेलाइट तस्वीर में एक रोहिंग्या गांव के 700 से ज़्यादा घरों को जलाए जाने की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की थीं.

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रोहिंग्या के घर तबाह
ह्यूमन राइट्स वॉच के डिप्टी एशिया डायरेक्टर फ़िल रॉबर्टसन ने बीबीसी को बताया, "25 अगस्त को हिंसा शुरू होने के बाद ही तोड़फोड़ शुरू हुई. उस गांव में लगभग 99 फ़ीसदी घरों को नष्ट कर दिया गया है."
म्यांमार के सबसे ग़रीब प्रांत रख़ाइन में 10 लाख से ज़्यादा रोहिंग्या रहते हैं.
बौद्ध बहुल देश में कई दशक से रोहिंग्या मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है और उन्हें वहां का नागरिक नहीं माना जा रहा.
हाल ही के वर्षों में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ बड़े स्तर पर हिंसा की घटनाएं हुई हैं.
हालिया नस्लीय हिंसा की शुरुआत अक्टूबर 2016 में तब हुई थी बॉर्डर पोस्ट पर तैनात 9 पुलिसवालों को हमलों में मार दिया गया था. इसके बाद इसी साल 25 अगस्त को एक साथ कई थानों पर हमला हुआ.
इन दोनों हमलों की ज़िम्मेदारी अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना (ARSA) नाम के संगठन ने ली है. संगठन का कहना है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है.
संयुक्त राष्ट्र अब इस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रहा है. हालांकि बर्मा की सेना ने किसी भी तरह की ज़्यादती से इनकार किया है.
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