ट्रंप की चली तो पेरिस समझौता 'छोड़ देगा अमरीका'

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अमरीका को पर्यावरण के मुद्दे पर हुए पेरिस समझौते से बाहर ले जा सकते हैं.
अमरीकी मीडिया ने ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के हवाले से ये ख़बर दी है.
2015 में हुए पेरिस समझौते के तहत पहली बार दुनिया के बड़े देश जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए एकजुट हुए थे.
इस समझौते पर संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन समूह के 197 देशों में से 195 देशों ने हस्ताक्षर किए थे. सीरिया और निकारागुआ अनुपस्थित रहे थे.
बुधवार को किए गए एक ट्वीट में ट्रंप ने कहा था है कि वो अपना फ़ैसला अगले कुछ दिनों में सार्वजनिक करेंगे.
पेरिस समझौते में क्या हुआ था
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का मतलब है उद्योगों और कृषि कार्यों से उत्सर्जित होने वाली गैसों से पर्यावरण पर होने वाले नकारात्मक और नुक़सानदेह असर.
पेरिस समझौते का मक़सद गैसों का उत्सर्जन कम कर दुनियाभर में बढ़ रहे तापमान को रोकना था.

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देशों ने निम्न बिंदुओं पर समझौता किया था
- वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और कोशिश करना कि वो 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न बढ़े.
- मानवीय कार्यों से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को इस स्तर पर लाना की पेड़, मिट्टी और समुद्र उसे प्राकृतिक रूप से सोख लें. इसकी शुरुआत 2050 से 2100 के बीच करना.
- हर पांच साल में गैस उत्सर्जन में कटौती में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करना.
- विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष देना और भविष्य में इसे बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्धता.
अभी तक 197 में से 147 देश इस समझौते में शामिल हो चुके हैं. इनमें अमरीका भी शामिल है जहां ये समझौता बीते साल नवंबर में प्रभाव में आ गया था.

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ट्रंप इसका विरोध क्यों करते हैं
ट्रंप कह चुके हैं कि जलवायु परिवर्तन एक झूठी धारणा है जिसके पीछे चीन सरकार है. उन्होंने अपने चुनाव अभियान के दौरान पेरिस समझौते से अमरीका को बाहर करने का वादा किया था. उनका तर्क था कि इससे अमरीकी उद्योग जगत को नुक़सान होगा क्योंकि ये विदेशी अधिकारियों को अमरीका की ईंधन खपत को नियंत्रित करने की अनुमति देता है.
ऊर्जा अमरीकी अर्थव्यवस्था का अहम क्षेत्र है. ट्रंप के बहुत से समर्थकों का मानना है कि ये समझौता अमरीका के अपने ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल को सीमित करता है.
हालांकि समझौते की शर्तों के तहत देश गैस उत्सर्जन की अपनी सीमा स्वयं निर्धारित करते हैं न कि कोई बाहरी पैनल.
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