'मुसलमानों को गोश्तखोरी से कोई नहीं रोक सकता'

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- Author, साजिद इक़बाल
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
जबसे योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया है, तबसे लगता है पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों को भारत के ख़िलाफ़ जज़्बात उभारने को एक नई दलील मिल गई है और वो भारत में होने वाले हर वाक़ये को योगी के व्यक्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं.
चाहे कोई वाकया यूपी में हुआ हो, गुजरात में या किसी दूसरी रियासत में, उस पर बात करते हुए पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों की तान योगी पर ही टूटती है.
कुछ इस तरह का मामला नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के दौरान भी हुआ था, लेकिन बाद में अख़बारों के संपादकीयों में ये ख़बर गुम हो गई थी.
इस सिलसिले में मुल्ला मसूद अज़हर के ग्रुप का हामी अख़बार 'डेली इस्लाम', जमात-ए-इस्लामी का रोज़नामा 'उम्मत' और नज़रिए-ए-पाकिस्तान का आलमबरदार अख़बार 'नावा-ए-वक़्त' ख़ास तौर पर काबिलेज़िक्र हैं.

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'योगी का जंगल राज'
26 मार्च को 'डेली इस्लाम' में पत्रकार नाज़िश हुमा कासमी ने यूपी पर 'यूपी में योगी का जंगल राज' के नाम से एक लेख लिखा है जिसमें उन्होंने योगी के चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव और बीजेपी के मिशन 2020 हिंदू राष्ट्र से जोड़ा है.
हुमा का कहना है, "योगी के मुख्यमंत्री बनते ही यूपी में खौफ़ और डर का माहौल कायम है और ज़म्हूरियत दम तोड़ती नज़र आ रही है. अल्पसंख्यक मुसलमानों की रोज़ी और रोज़गार के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है."
उसके दो रोज़ बाद ही 'डेली इस्लाम' में 'भारत, मुस्लिम समुदाय के लोगों की मुश्किलों में इज़ाफ़ा' शीर्षक से एक संपादकीय लिखा गया है जिसमें रियासत गुजरात के ज़िला पाटन में हुई हिंसा का ज़िक्र है जिसमें एक शख़्स की मौत हुई थी और 14 लोग घायल हुए थे.
लेख के मुताबिक इस हिंसा की असली वजह योगी का मुख्यमंत्री बनना ही था.
'मोदी योगी गठजोड़'
'डेली इस्लाम' कहता है, "हम समझते हैं कि दुनिया को भारतीय हुकुमत को इक इंतिहा पंसद शख़्स को वज़ीर-ए-आला के मनसब पर बैठाने के फ़ैसले का नोटिस लेना चाहिए और मोदी पर ज़ोर डालना चाहिए कि वो मुल्क में अल्पसंख्यक मुसलमानों के जान और माल के साथ मज़हबी और समाजी गरिमा को तवज्जो दें."
उसी रोज़ डॉक्टर उमर फारुख़ अहरार ने 'मोदी योगी गठजोड़ और पाकिस्तान' नाम से एक स्तंभ लिखा. उनका कहना था कि यूपी में बीजेपी ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ जिस तरह का सलूक किया है वो उसकी नीतियों का आईना दिखाती है.
उनके मुताबिक मोदी, योगी और अमित शाह ने भारत में नफ़रत की जो फिज़ा कायम की है उसमें भारत के मुसलमानों को ख़तरा पैदा हो चुका है. उन्होंने पाकिस्तान के उदारवादी ताक़तों को भी निशाना बनाया और कहा कि मोमबत्ती पसंद करने वाली सिविल सोसायटी के लब सिले हुए हैं क्योंकि भारत के मुसलमान उनके एजेंडे में शामिल ही नहीं हैं.

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'ये है आज का भारत'
जमात-ए-इस्लाम नवाज़ अख़बार 'उम्मत' ने 28 मार्च के अंक में एक संपादकीय प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- 'ये है आज का भारत.'
इसमें गुजरात के ज़िला पाटन में हुई हिंसा का हवाला देते हुए लिखा है कि जब से यूपी में योगी मुख्यमंत्री बने हैं तबसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा में बढ़ोत्तरी देखने को मिली है.
अख़बार के मुताबिक आलमी बिरादरी मोदी की चापलूसी और सरपरस्ती में लगी हुई है जबकि चंद साल पहले तक उनके लिए कई मुल्कों के दरवाजे बंद थे.
नवा-ए-वक्त ने 28 मार्च को अपने संपादकीय में आलमी बिरादरी से अपील की है वो भारत के मुसलमानों के साथ होने वाली ज्यादतियों को रोके.
अख़बार ने लिखा है कि वज़ीर-ए-आजम मोदी की ज़ैर-ए-असर गुजरात में एक बार फिर हिंदू उन्मादियों ने मुसलमानों की खून से होनी खेलनी शुरू कर दी है.
अख़बार ने लिखा है, "ख़ास तौर पर मुस्लिम और अरब देशों को बताने की ज़रूरत है जिनके साथ भारत आजकल प्यार और दोस्ती का नाटक रचा रहा है. उन देशों को भारत का असल चेहरा दिखाए जाने की ज़रूरत है."
'नवा वक्त' में सरे राही शीर्षक से रोज़ाना प्रकाशित होने वाले कॉमेंट्स में गुजरात में गाय की हत्या पर पाबंदी के बारे में भी लिखा गया है.
"मुसलमानों को गोश्तखोरी से कोई नहीं रोक सकता, कोई ना कोई मुर्ग या बटेर हाथ आ ही जाएगा. लेकिन इस पाबंदी से दलितों और गोश्त के कारोबार में जुटे लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. मगर ये जो गाय माता मर जाती हैं, उनका हिंदू क्या करेंगे. क्या उन्हें अपने घरों में सजाएंगे?"
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