डोनल्ड ट्रंप के दिमाग़ में आख़िर क्या है?

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- Author, गेविन हेविट
- पदनाम, प्रमुख संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
आधुनिक युग के किसी भी राष्ट्रपति पर इतना विश्लेषण नहीं हुआ जितना डोनल्ड ट्रंप का हो रहा है. दूसरे नेता उन्हें जानते नहीं हैं और उन्हें समझ नहीं पा रहे. वह कुछ ऐसा कर देते हैं जो कई बार विरोधाभासों से भरा होता है. वे लोकप्रियता की लालसा रखते हैं, लेकिन दूसरों को दुश्मन भी मानते हैं. ट्रंप अपनी सहज प्रवृत्तियों पर भरोसा करते हैं और अनिश्चितता उनकी खूबी है.
राजनयिक, विदेशी नेता और बिज़नेस प्रमुख सभी अमरीका के 45वें राष्ट्रपति को समझने की कोशिश कर रहे हैं. डोनल्ड ट्रंप के पहले दो हफ़्तों में ताक़त, दृढ़ता, शक्ति के शोर, स्थापित मूल्यों का विध्वंस, ग़लत जगह टांग अड़ाने और अनिश्चितता का माहौल रहा.

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ट्रंप के पहले कोई राष्ट्रपति विदेशी ताकतों, पुराने सहयोगियों, बड़े कॉरपोरेशनों और वॉशिंगटन के सरकारी कर्मचारियों को धमकाने के लिए इतना आतुर नहीं रहा.
ट्रंप के दिमाग़ में आख़िर क्या है?
कॉन्फ्रेंस, संगोष्ठियों, राजनयिकों के कार्यक्रमों और विदेशों के मंत्रियों के बीच मैंने इसी तरह की चर्चा सुनी कि आख़िर ट्रंप के दिमाग़ में क्या है? यह कोई छुपा हुआ सवाल नहीं है: डोनल्ड ट्रंप अब क्या हैरान करने वाले हैं - ये सबकी जिज्ञासा की वजह बना हुआ है.
कुछ लोग कह रहे हैं कि वो निभा नहीं पाएंगे या फिर अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर लेंगे. कई लोग तो उनके ख़ुद ही बर्बाद होने का इंतज़ार कर रहे हैं. दुनिया के सबसे ताक़तवर शख़्स के शुरुआती उतावले भरे दिनों को ऐसे ही देखा जा रहा है.
डोनल्ड ट्रंप ने अपने कैंपेन में जो वादा किया था, उसे ही पूरा कर रहे हैं. मैंने उनके 15 से ज़्यादा चुनाव प्रचार कार्यक्रमों को देखा और उन्हें ये संकल्प दोहराते हुए सुना-
- नौकरियों को वापस अमरीका लाना है
- मेक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी होगी
- बड़े व्यापार समझौतों की जगह द्विपक्षीय व्यापार समझौते होंगे
- ईरान को सबक सिखाना है
- प्रवासियों पर लगाम कसनी है

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ट्रंप पर उनके मतदाताओं को भरोसा
वह वादे करने के बाद इस बात को कहना नहीं भूलते थे कि 'मेरे ऊपर भरोसा कीजिए'. अब वह अपने वादे पूरे कर रहे हैं. दूसरी बात यह कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने समर्थकों की तरफ देख रहे हैं. ट्रंप को पेंसिलवेनिया, ओहायो, मिशिगन और उत्तरी कैरोलाइना के मतदाताओं ने व्हाइट हाउस तक पहुंचाया है.
ट्रंप की नीति के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारी शहरों में और हवाई अड्डों पर अपना विरोध जता रहे हैं. ये प्रदर्शनकारी सात मुस्लिम देशों के नागरिकों को अमरीका आने पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का विरोध कर रहे हैं. पोल से पता चलता है कि मध्य अमरीका में दो में से एक अमरीकी का उन्हें समर्थन हासिल है. 49 प्रतिशत लोग ट्रंप की नीतियों से सहमत हैं.

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ट्रंप की नीति को लेकर हो रहे विरोध में उसे विभाजनकारी और असंगत बताया जा रहा है. विरोधियों का कहना है कि इस नीति से चरमपंथ को बढ़ावा मिलेगा. ट्रंप के इनर सर्किल के लोग भी इस बात से प्रभावित नज़र नहीं आते कि अगर ये नीति पहले से लागू रहती तो अमरीका में हाल में हुए चरमपंथी हमलों को रोका जा सकता था.
ट्रंप अपने लोगों को जानते हैं और उनके ट्वीट सीधे और सरल उनके लिए संदेश की तरह होते हैं. अपने कैंपेन में भी वह ऐसा ही करते थे. उन्होंने ट्वीट किया था, ''यह ट्रैवेल बैन किसी धर्म के लिए नहीं है. यह अमरीका को सुरक्षित रखने के लिए और आतंक के ख़िलाफ़ है. कुछ लोगों ने उन्हें वोट ग़लतफ़हमी में दे दिया होगा, लेकिन ज़्यादातर लोगों ने ऐसा नहीं किया है.

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ट्रंप की शैली से उनके मतदाता सहमत
ट्रंप को वोट देने वाले उनकी टकराने वाली शैली को पसंद करते हैं. जजों और स्टेट डिपार्टमेंट के अधिकारियों से शुरुआती संघर्ष इस बात के सबूत हैं कि ट्रंप अपने वादे पूरे करने को लेकर दृढ़ हैं. जब एक फ़ेडरल जज ने ट्रैवेल बैन को रोक दिया तो ट्रंप ने ट्वीट किया, ''इस तथाकथित जज का फ़ैसला...बक़वास है और इसे बदला जाएगा.''
ट्रंप के आलोचकों ने कहा कि वह संविधान की इज़्ज़त नहीं कर रहे हैं. ट्रंप ने अपने लोगों से कहा, ''बुरे और ख़तरनाक लोग देश को संकट में डाल सकते हैं. ''राष्ट्रपति ट्रंप अब भी कैंपेन मोड से बाहर नहीं निकल पाए हैं. सिर चकरा देने वाली ट्रंप की घोषणाएं और कार्यकारी आदेश उनकी रणनीतिक योजनाओं का हिस्सा हैं.

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वादों पर कितने खरे उतरेंगे ट्रंप
उनकी रणनीति है कि वह अपने कार्यकाल के पहले 100 दिनों में एक ऊर्जावान नेता की छवि पेश करें. वह पुराने फ़ैसलों को रद्द करने में पूरे मिज़ाज से लगे हैं. वह इस मामले में भाग्यशाली हैं कि उन्हें विरासत में एक मजबूत अर्थव्यवस्था मिली है. हालांकि उन्होंने वादा इससे भी ज़्यादा का कर दिया है.
नियमों में ढील, कॉरपोरेट और पर्सनल टैक्सों में छूट, आधारभूत ढांचे में निवेश बढ़ाना ये सभी तीन प्रतिशत से ऊपर की विकास दर हासिल करने के लिए है. यदि ट्रंप इसे हासिल कर लेते हैं तो ज़्यादातकर अमरीकी उन्हें बर्दाश्त कर लेंगे. कैंपेन के दौरान ट्रंप ने सोशल मीडिया पर जैसे सीधी बात की थी, उसी तरह वह अपने मतदाताओं से सीधी बात कर रहे हैं.

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ट्विट को बनाया हथियार
लोगों की एक समझ यह थी कि व्हाइट हाउस में दस्तक देने के बाद ट्रंप ट्विटर पर सीधी बात नहीं करेंगे, लेकिन ट्रंप जानते हैं कि उनका हर ट्वीट ख़बर का रूप अख़्तियार करेगा और इसे हथियार बनाकर वह न्यूज़ एजेंडे को मैनेज कर सकेंगे.
मुख्यधारा की मीडिया इस बात का माकूल जवाब नहीं ढूंढ पा रही कि ट्रंप आखिर उन्हें बाइपास कर अपने संदेश ट्विटर पर क्यों जारी कर रहे हैं.
मुख्यधारा की मीडिया उन्हें अब भी आसानी से आमने-सामने नहीं प्रस्तुत कर पा रही है. उन्होंने साफ़ कर दिया है कि उनकी लड़ाई प्रेस से भी है. उनके मुख्य रणनीतिक सलाहकार ने दो टूक कहा कि मीडिया उनके लिए मुख्य विपक्षी पार्टी है.
ट्रंप लगभग एलान कर रहे हैं कि प्रेस के साथ उनके छत्तीस के आंकड़े जैसे संबंध हैं.
उनके मुख्य रणनीतिकार मानते हैं कि मीडिय ट्रंप की विपक्षी पार्टी की भूमिका में है.

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असहमति पसंद नहीं
ट्रंप से असहमति रखना मुश्किल है. वह प्रेस को ख़लनायक की तरह पेश कर रहे हैं. उनकी रणनीति केवल अमरीका को बदलने की ही नहीं है बल्कि वह पब्लिक स्पेस पर भी अपना दबदबा बनाना चाहते हैं.
ट्रंप का नारा है अमरीका फर्स्ट. वह सभी हमलों का बचाव इसी से करेंगे. शुरुआत के दिनों में यह जान पाना मुश्किल है कि ट्रंप कितने क्रांतिकारी साबित होंगे. ट्रंप के मुख्य रणनीतिकार स्टीफन बैनन एक स्वयंभू आर्थिक राष्ट्रवादी हैं.

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ट्रंप को लेकर कई सवाल
मेक्सिको की दीवार के बारे में ट्रंप की घोषणा का इरादा सुर्खियां बटोरना था या वह मेक्सिको के पैसे से दीवार बनाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं? क्या वह वाकई आयात शुल्क लगाएंगे? क्या वह चीन के साथ ट्रेड और करेंसी युद्ध का जोखिम उठाएंगे? क्या वह इसराइल में अमरीकी दूतावास येरुशलम शिफ़्ट करेंगे? क्या वह यूरोप में स्थापित भावानाओं के ख़िलाफ़ काम करेंगे? ऐसे कई सवाल हैं, लेकिन इनके जवाब अभी समझ में नहीं आ रहे.
दो साल बाद जब मध्यावधि चुनाव होंगे तो अमरीकी जनता ट्रंप की नीतियों पर अपना मत ज़ाहिर करेगी.
और सबसे महत्वपूर्ण ये कि उनकी रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप के साथ खड़ी होगी या फिर उनकी नीतियों को लेकर उनकी राजनीति का विरोध करेगी.
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