फ़िदेल कास्त्रो: वो कम्युनिस्ट सिपाही जो अमरीका से डरा नहीं

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कम्युनिस्ट नेता फ़िदेल कास्त्रो ने करीब 50 साल तक क्यूबा में एकछत्र राज किया. इस दौरान क्यूबा में कोई दूसरी पार्टी नहीं थी, जो उनकी दावेदारी को चुनौती दे पाती.
यह वो दौर भी था, जब दुनिया भर में कम्युनिस्ट शासन ढहते जा रहे थे. लेकिन फ़िदेल कास्त्रो अपने सबसे बड़े दुश्मन संयुक्त राज्य अमरीका की खुलकर आलोचना करते रहे और लाल झंडे को कभी झुकने नहीं दिया.
कास्त्रो के समर्थक उन्हें समाजवाद का सूरमा बताते हैं और एक ऐसा सैन्य राजनीतिज्ञ मानते हैं, जिसने अपने लोगों के लिए क्यूबा को आज़ाद कराया.
लेकिन उनपर यह आरोप भी लगते रहे कि उन्होंने क्रूर तरीकों से अपने विपक्षियों को दबाया. साथ ही ख़राब आर्थिक नीतियों की वजह से क्यूबा की अर्थव्यवस्था को अपंग बना दिया.

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फ़िदेल अलज़ांद्रो कास्त्रो रुज़ का जन्म 13 अगस्त 1926 को एक धनी किसान के घर हुआ था. उनकी मां का नाम लीना रुज़ था, जो उनके पिता की सेविका थीं. लेकिन कास्त्रो के जन्म के बाद उनके पिता ने लीना से शादी कर ली.
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सैंटियागो के कैथोलिक स्कूलों में कास्त्रो ने अपनी स्कूली पढ़ाई की. इसके बाद की पढ़ाई करने के लिए वो हवाना चले गए.
1940 के दशक के मध्य में हवाना विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई करते वक्त ही कास्त्रो राजनीतिक कार्यकर्ता बने. उन्होंने जल्द ही सार्वजनिक वक्ता के रूप में अपनी पहचान बना ली थी और लोग उन्हें सुनना पसंद करने लगे थे.
मार्क्सवाद और अमरीका से टकराव
सक्रिय राजनीति में आने के बाद कास्त्रो ने क्यूबा सरकार को अपने निशाने पर लिया. इस दौर में राष्ट्रपति रेमन की सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे और कास्त्रो अपने भाषणों में सरकार को घेरने लगे थे.
यह क्यूबा में हिंसक विरोध प्रदर्शनों का दौर था, जिसके चलते पुलिस ने कास्त्रो को निशाना बनाना शुरू कर दिया.
कास्त्रो डोमिनिकन गणराज्य के दक्षिणपंथी नेताओं के ख़िलाफ थे. उन्होंने दक्षिणपंथी नेता राफेल ट्रूजिलो की सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया. लेकिन अमरिकी हस्तक्षेप के बाद यह प्रयास नाकाम रहा.

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1948 में कास्त्रो ने क्यूबा के एक धनी नेता की बेटी मिर्ता डियाज़ बालार्ट से शादी की. उस वक्त क्यूबा में यह चर्चा चली थी कि इस शादी के बाद कास्त्रो देश के कुलीन वर्ग में शामिल हो जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि शादी के बाद कास्त्रो तेज़ी से मार्क्सवाद की ओर बढ़े.
कास्त्रो का मानना था कि क्यूबा की आर्थिक समस्याओं का महज़ एक ही कारण है. और वो है बेलगाम पूंजीवाद. कास्त्रो कहते थे कि पूंजीवाद का इलाज सिर्फ़ जन-क्रांति द्वारा ही किया जा सकता है.
स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कास्त्रो ने बतौर वकील काम करने का प्रयास किया. लेकिन इसमें वो सफ़ल नहीं हो पाए और उनके सिर पर लोगों का कर्ज़ बढ़ने लगा. इस दौरान भी उन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाए रखी. वो सभी हिंसक प्रदर्शनों में शामिल हुआ करते थे.
साल 1952 में क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता ने देश में सैन्य विद्रोह करवाया और क्यूबा के राष्ट्रपति कार्लोस प्रियो को सत्ता छोड़नी पड़ी.
आक्रमण की तैयारी
फुलखेंशियो बतीस्ता के संयुक्त राज्य अमरीका से घनिष्ठ संबंध थे. उन्होंने समाजवादी संगठनों का दमन करना शुरू कर दिया था. यह स्थिति कास्त्रो की मौलिक राजनीतिक मान्यताओं के ठीक विपरीत थीं.
वीडियो देखें: इंदिरा गांधी से कास्त्रो की वो मुलाक़ात
इसे चुनौती देने के लिए कास्त्रो ने एक संस्था बनाई, जिसका नाम था 'द मूवमेंट'. इस संस्था ने भूमिगत रहकर काम शुरू किया, ताकि बतीस्ता की सत्ता को पलटा जा सके.
इसी सिलसिले में जुलाई, 1953 में कास्त्रो ने सैंटियागो से सटी मोंकाडा की सैन्य बैरकों पर सशस्त्र हमला किया. इस विद्रोह का मकसद हथियारों को जब्त करना था. लेकिन यह योजना विफ़ल हो गई और कई क्रांतिकारी इसमें मारे गए.

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गुरिल्ला युद्ध की रणनीति
कास्त्रो को 15 साल की सज़ा सुनाई गई. लेकिन 19 महीने की सज़ा के बाद कास्त्रो को रिहा कर दिया गया.
जेल में अपनी सज़ा के दौरान कास्त्रो ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था और वो दिन-रात मार्क्सवादी साहित्य में डूबे रहते थे.
यह वो दौर था जब फुलखेंशियो बतीस्ता अपने विद्रोहियों को निपटा रहा था. ऐसे में गिरफ़्तारी से बचने के लिए कास्त्रो क्यूबा छोड़ मेक्सिको चले गए. यहीं उनकी मुलाक़ात नामी क्रांतिकारी चे ग्वेरा से हुई.
नवंबर 1956 में कास्त्रो 81 सशस्त्र साथियों के साथ क्यूबा लौटे और साल 1959 में क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता को सत्ता से हटाकर फ़िदेल कास्त्रो ने क्यूबा में कम्युनिस्ट सत्ता कायम की.
विचारधारा
कास्त्रो के संचालन में बनी क्यूबा की नई सरकार ने ग़रीबों से वायदा किया कि लोगों को उनकी ज़मीनें लौटा दी जाएंगी और ग़रीबों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी.
लेकिन सरकार ने जल्द ही देश में एक पार्टी सिस्टम लागू कर दिया. सैंकड़ों राजनीतिक लोगों को कैद कर लिया गया. कुछ को जेल भेजा गया, तो कुछ को श्रम शिविरों में नज़रबंद कर दिया गया. वहीं हजारों की संख्या में मध्यम वर्गीय क्यूबाई नागरिकों को निर्वासन के लिए मजबूर किया गया.

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उन्होंने कई बार अपने भाषणों में कहा कि देश में साम्यवाद या मार्क्सवाद नहीं है, बल्कि एक ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें सभी को प्रतिनिधित्व की आज़ादी है.
1960 में फ़िदेल कास्त्रो ने अमरीकी स्वामित्व वाले सभी व्यवसायों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. जवाब में, वाशिंगटन ने क्यूबा पर कई व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए.
आक्रमणकारियों के लिए
क्यूबा इस दौर में एक शीत युद्ध का मैदान बन गया था. कास्त्रो दावा करते थे कि सोवियत संघ और उसके नेता निकिता ख्रुश्चेव ने उनसे समझौते का प्रस्ताव रखा था. इसके बाद ही दोनों के बीच संधि हुई और उन्हें सोवियत संघ का समर्थन मिला.
दूसरी ओर अमरीका कास्त्रो की सरकार का तख़्ता पलट करवाने के लिए क्यूबा के राजनीतिक कैदियों के साथ मिलकर एक निजी सेना बना रहा था.

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एक विचित्र घटना...
कास्त्रो अमरीका के लिए सबसे बड़े दुश्मन बन चुके थे. सीआई के नेतृत्व में एक टीम भी बनाई गई, जिसका मक़सद कास्त्रो की हत्या करना था. इसके लिए कास्त्रो के सिगार में विस्फोटक लगाकर उन्हें मारने का तरीका चुना गया. कई ऐसे विचित्र तरीकों की जानकारी सार्वजनिक हुई, जिनके ज़रिए कास्त्रो की हत्या प्लान की जा रही थी.
इस बीच कास्त्रो को और क्यूबा को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए सोवियत संघ ने क्यूबा में पैसा लगाना शुरू किया.
क्यूबा का घाटा
कमज़ोर आर्थिक स्थिति के बावजूद कास्त्रो ने अफ्रीका में अपने सैनिकों को भेजा और अंगोला समेत मोजाम्बिक के मार्क्सवादी छापामार लड़ाकों का समर्थन किया.

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लेकिन 1980 के मध्य तक वैश्विक राजनीति में भारी बदलाव हो गया. यह दौर कास्त्रो की क्रांति के लिए घातक साबित हुआ. इस दौर में मास्को के लिए भी कास्त्रो को प्रभावी ढंग से मदद दे पाना मुश्किल हो गया था और इसके साथ ही क्यूबा की एक बड़ी उम्मीद भी टूट गई.

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कैरेबियन साम्यवाद
इसके बावजूद 1990 के मध्य तक क्यूबा ने कई प्रभावशाली घरेलू उपलब्धियों को हासिल किया. देश में अच्छी चिकित्सा व्यवस्था को लोगों को मुफ़्त मुहैया कराया गया. इसने क्यूबा की शिशु मृत्यु दर को पृथ्वी पर कुछ बड़े विकसित देशों के बराबर ला दिया.
बाद के वर्षों में कास्त्रो का रुख विनम्र हो गया.
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