'आईएस' के चंगुल से बचकर लौटी दो औरतों की आप-बीती
इराक़ के बशीर गांव में उन दो महिलाओं का बसेरा है, जिन्होंने चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के चंगुल से ख़ुद को आज़ाद कराने का दावा किया था.
बीबीसी फ़ोटोग्राफ़र एबी ट्रेलर-स्मिथ एक ग़ैर सरकारी संस्था 'ऑक्सफ़ैम' के साथ इन दोनों महिलाओं की आप-बीती सुनने बशीर गांव पहुंचे.
यहां मुलाक़ात के दौरान युस्निता मोहम्मद ने बीबीसी को बताया, "मौजूदा संकट शुरू होने के पहले हम बड़े आराम से रह रहे थे, कोई परेशानी नहीं थी. हमारे पास दो मंजिला मकान था, दुकान थी और हम पशु पालते थे."

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युस्निता बताती हैं, "हमें इस्लामिक स्टेट को लेकर कोई चिेंता नहीं थी, क्योंकि हम सेना और पुलिस से घिरे हुए थे. हम इन चरमपंथियों को लेकर बेफ़िक्र थे. कभी सोचा ही नहीं था कि वे बशीर भी पंहुच सकते हैं."
उन्होंने बताया कि जब आईएस के चरमपंथी उनके गांव में आए, तो उनके पति कहीं दूर बिजली का कोई काम कराने गए थे.
उस दिन को याद करते हुए वो कहती हैं, "हमारे यहां यह परंपरा है कि पुरुष ही घर का मुखिया होता है और औरतें उनकी इजाज़त के बग़ैर अमूमन कुछ नहीं करती हैं. लेकिन मैंने उन्हें बुलवा लिया. इमाम माइक से कह रहे थे कि कोई शख़्स गांव छोड़ कर न भागे, जो ऐसा करेगा, क़ायर माना जाएगा. और तमाम लोग वहीं रुक गए."
युस्निता मोहम्मद की बेटी यह समझ गई थी कि मामला गड़बड़ है. चरमपंथियों के गांव में दाखिल होने को लेकर वह डरी हुई थी. उसने कहा कि चरमपंथी गोलीबारी कर रहे हैं, लिहाजा हमें निकल जाना चाहिए. लेकिन युस्निता ने अपनी बेटी को समझा बुझा कर शांत कर लिया और भरोसा दिलाया कि जल्द ही उसके पिता आ जाएंगे और सब संभाल लेंगे.
चरमपंथी बम फेंक रहे थे. गोलियां बरसा रहे थे. इसी बीच युस्निता अपने बच्चों को लेकर पास के शहर ताज़ा चली गई.
युस्निता कहती हैं, "हमें लग रहा था कि हमारा अंत आ चुका है. हम आगे बढ़ते रहे और ताज़ा से दूर चले गए. बाद मे एक मस्जिद में हम सात महीने रहे. फिर हमने एक स्कूल में दो महीने बिताए."

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स्कूल खुल गया तो युस्निता को वहां से चले जाने को कहा गया. इसके बाद कुछ समय उन्होंने लेलान के एक तबेले में बिताया, जहां मवेशी रखे जाते थे.
युस्निता के बच्चे का स्कूल छूट गया. उसका एक साल बर्बाद हो गया.
जब बशीर आज़ाद कराया गया, युस्निता रोज़ा में थीं. फिर भी वो अपने गांव लौट आईं.

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युस्निता आगे कहती हैं, "मैंने पहली बार अपना घर देखा तो फूट-फूट कर रो पड़ी. मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ गया. मैं बीमार हो गई तो मेरे पति मुझे वहां से दूर ले गए. मैं एक महीने बाद घर लौटी तो पाया कि मकान के हर तरफ लाल टेप लगे हुए हैं और हमें बताया गया कि इसके परे जम़ीनी सुरंगें बिछी हुई हैं.
मैंने किसी की नहीं सुनी और टेप काटकर अंदर घुस गई. मैं अंदर घुसी ही थी कि घर के बाहर एक सुरंग फट पड़ी. मेरे पति नाई थे, लेकिन इस्लामिक स्टेट ने उनकी दुकान तोड़ दी थी और अब उनके पास कोई काम नहीं था.
हमने पड़ोसियों की मदद से किसी तरह मकान बनाना शुरू कर दिया. अभी यह बन कर तैयार नहीं हुआ है. पर मैं अपने बच्चों को लेकर वहीं रहने लगी."
युस्निता कहती हैं कि अपने घर लौटकर वो खुश हैं. जीवन चलाने के लिए उन्हें ब्रेड खाकर गुज़ारा करना पड़े, तो भी वो खुश रहेंगी.
समाइरा की कहानी भी युस्निता की कहानी से जुदा नहीं है.

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समाइरा कहती हैं, "मैं बेहद घबरा गई थी. हम अपनी गाड़ी से निकल गए. उसके दो घंटे बाद ही इस्लामिक स्टेट ने गांव पर क़ब्ज़ा कर लिया. हम पास के शहर ताज़ा गए, पर आईएस के लड़ाके जल्द ही वहां भी पंहुच गए. ताज़ा में लोगों को सूझ ही नहीं रहा था कि क्या किया जाए. चरमपंथियों ने ज़बरदस्त हमला किया. उस लड़ाई में उन्होंने एक दिन में ही 75 लोगों को मार डाला."
इस हमले में समाइरा के दो बेटे और दो भतीजे भी मारे गए.

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फिर हमने किरकुक की ओर रुख किया. विस्थापित होने के बाद हमारे ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. मेरे दो बच्चे कुपोषण से मर गए. यह बताते हुए समाइरा रो पड़ती हैं.
वो कहती हैं, "हम सड़कों पर थे, बेबस थे और दर-दर की ठोकरें खा रहे थे. हमने सोचा शायद हमने ज़िंदगी में कुछ बुरा किया होगा, जिसका दंड हमें दिया जा रहा है."
गांव लौटने के बाद सबसे पहले लोगों ने समाइरा के परिवार को वह जगह दिखाई, जहां उनके बेटों को मारा गया था. उस जगह को देख वो बीमार पड़ गई और सात दिनों तक बेहोश रहीं.
समाइरा कहती हैं कि वो अब एक जगह बस गई हैं. उनके पास एक दुकान थी. वो चाहती हैं कि ऑक्सफ़ैम उस दुकान को फिर से खोलने में उनकी मदद करे.
सभी फ़ोटोग्राफ-एबी ट्रेलर-स्मिथ/ऑक्सफ़ैम















