क्या आज भी टैंकों के सहारे युद्ध जीता जा सकता है?

आज से 70 साल पहले हुआ था इतिहास का सबसे बड़ा टैंक युद्ध. कुर्स्क में हुए इस सबसे बड़े टैंक युद्ध ने आज के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है.
सवाल ये है कि क्या आज <link type="page"><caption> ऐसा युद्ध</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/01/130121_battle_against_sexist_fantasy_book_pn.shtml" platform="highweb"/></link> संभव है? ऐसा युद्ध जिसमें दोनों पक्षों की तरफ से हज़ारों की संख्या में टैंक या बख़्तरबंद गाड़ियां शामिल हों.
पाँच जुलाई 1943 का वह वक्त. बस भोर होने ही वाली थी. अचानक रूस का आसमान विस्फोटों की गूँज से दहल उठा. जमीन भयंकर बमबारी से कांप उठी.
सूरज जैसे ही उगा, सूरजमुखी और गेहूं के खेत में <link type="page"><caption> जर्मनी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130611_germany_sleep_dp.shtml" platform="highweb"/></link> की बख्तरबंद गाड़ियों का काफिला हमले के लिए तैयार खड़ा था. इतिहास के सबसे बड़े टैंक युद्ध की भूमिका तैयार हो रही थी..
कुर्स्क संघर्ष
कुर्स्क के इस संघर्ष में जर्मनी के 3000 से ज्यादा टैंकों का मुकाबला दो गुनी संख्या से भी ज्यादा की गिनती में मौजूद <link type="page"><caption> सोवियत रूस</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130619_us_russia_sm.shtml" platform="highweb"/></link> की भारी भरकम बख़्तरबंद गाड़ियों से था.
<link type="page"><caption> हिटलर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130313_hitler_assassination_plotter_dies_pk.shtml" platform="highweb"/></link> ने अपने आक्रामक ऑपरेशन 'सिटाडल' को शुरू करने में देरी की. वे नए 'पैंथर' के आने का इंतजार कर रहे थे.
इस ऑपरेशन में हुई देरी से रूसी सेना को अपनी बख़्तरबंद यूनिट तैयार करने और सुरक्षा व्यवस्था पुख़्ता करने का पर्याप्त मौका मिल गया.
“अंधाधुंध युद्ध”

‘द सेकेंड वर्ल्ड वॉर’ के लेखक एंटोनी बीवर इस युद्ध को “अंधाधुंध युद्ध” का नाम देते हैं.
हालांकि जर्मन टैंक गिनती में कम थे मगर गोलीबारी और आत्मसुरक्षा की उनकी क्षमता बेजोड़ थी. विस्फोट करने के लिए सबसे पहले 'टाइगर' और दैत्याकार टैंक ‘फ़र्डिनांड’ भेजे गए.
बीवर बताते हैं, “एसएस टैंक के एक कमांडर ने एक घंटे में सोवियत संघ के 22 टैंक नष्ट कर दिए. मगर रूसी सैनिक लगभग 'आत्मघाती बहादुरी' दिखाते हुए उन टैंकों के काफ़ी पास पहुँच गए और उनके रास्ते में बारूदी बम फेंकते हुए अपने बचाव की कोशिश में लग गए.”
आठ दिन तक घमासान संघर्ष के बाद जर्मन आक्रमण का दम निकलने लगा. स्टालिन ने बदले की कार्रवाई शुरु करते हुए अगले छह हफ्तों में ऐसा आक्रमण किया कि जर्मन फ़ौजों को करारी हार का सामना करना पड़ा.
आसान निशाने
बीवर बताते हैं कि टैंकों के लिए कुर्स्क युद्ध महत्वपूर्ण था. ऐसा पहली बार हुआ था कि रूस की वायु सेना एकजुट होकर काम कर रही थी. उसकी हवाई ताकत बेहद प्रभावी कारक के रूप में उभर रही थी. आने वाले सालों में यह बात ज़ाहिर हो गई.
'मित्र देशों' की हवाई ताकत का ही परिणाम था कि जर्मनी के टैंकों को दिन में जंगल में घंटों छिपना पड़ता था. अगर टैंकों को हवाई आक्रमण से मदद न मिले तो वे आसान निशाना बन गए थे.
अगर ‘बैटलशिप’ की बात छोड़ दी जाए तो टैंक अब भी अधिकतर सेनाओं का एक अभिन्न अंग हैं. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ के अनुसार दुनिया भर में अब भी 60,000 टैंक हैं जो सक्रिय हैं.
शीत युद्ध के दौरान, ऊत्तरी यूरोप के मैदानी इलाके में संभावित आक्रमण या आत्मरक्षा हेतु पश्चिमी और पूर्वी जर्मनी के नजदीक हजारों टैंकों को तैनात किया गया था.
बढ-चढ़ कर इस्तेमाल

'रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट' में सैन्य विज्ञान विभाग के निदेशक माइकल कोडनर का कहना है, “इसमें कोई शक नहीं कि आक्रमण या रक्षा के मामले में टैंक बेहद महत्वपूर्ण ज़रिया रहे हैं."
1956 में सोवियत संघ ने हंगरी के विद्रोह को कुचलने के लिए बुडापेस्ट में सैंकड़ों की संख्या में टैंक भेजे थे.
1973 में जब मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर हमला किया तो उस संघर्ष में करीब 3000 से ज्यादा टैंक शामिल किए गए.
1991 में कुवैत को आजाद कराने और 2003 में इराक पर आक्रमण करने के लिए <link type="page"><caption> अमरीका और ब्रिटेन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130331_us_iraq_war_bush_sp.shtml" platform="highweb"/></link> ने ऐसे ही ताकतवर टैंकों का इस्तेमाल किया.
मगर टैंकों से आक्रमण केवल रेगिस्तान या मैदान जैसे समतल इलाकों में ही संभव है. वियतनाम के जंगलों और अफगानिस्तान की पहाड़ियों में टैंक कारगर नहीं हैं. वहां तो युद्ध का सबसे कारगर जरिया हेलिकॉप्टर ही रहे हैं.
'जेन्स आर्मर्ड फ़ाइटिंग वेहिकल्स' के संपादक क्रिस्टोफ़र फ़ॉस का कहना है कि यूरोप के बाहर टैंकों की तादाद बढ़ रही है. मध्य पूर्व तथा सऊदी अरब जैसे देश अमरीका में बने एम1 टैंकों की संख्या में इजाफा कर रहे हैं. कतर के पास लियोपार्ड 2 है. चीन भी अपने टैंकों को बदल रहा है. दक्षिण कोरिया इस मामले में आत्मनिर्भर है. भारत और पाकिस्तान की बात की जाए तो यहां भी टैंक बड़ी संख्या में मौजूद हैं.
सवाल
‘कुर्स्क’ पर आ रही नई किताब के लेखक और पूर्व अमरीकी टैंक अफसर राबर्ट फोर्स्जिक मानते हैं कि, “यदि इनका पैदल सेना, इंजीनियर और वायु सेना सही तरीके से इस्तेमाल करे तो यह आज भी एक देश की सैन्य क्षमता का अटूट हिस्सा है.”
मगर सवाल यह है कि कुर्स्क युद्ध के 70 साल बीत जाने के बाद क्या आज भी वैसे टैंक युद्ध संभव हैं?
जवाब में फोर्स्जिक कहते हैं, “बेशक. अतीत में जिन देशों में युद्ध हुए हैं वहां टैंक भारी संख्या में मौजूद रहे हैं. भारत के पास 3,250 और पाकिस्तान के पास 2,400 टैंक हैं. मध्य पू्र्व में मिस्र में 2,500 और सीरिया में 3,000 टैंक मौजूद हैं. जबकि अपने 500 टैंकों का इस्तेमाल इसराइल ने हाल के संघर्षों मे खूब किया है.”
कोडनर का कहना है कि सैन्य प्रौद्योगिकी आज उस मुकाम पर पहुंच गई है जहां मानव रहित टैंक नई संभावना हैं.
( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












